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UPSC Civil Services Prelims: सिविल सेवा प्रारम्भिक परीक्षा के प्रश्नों में बदलाव जरूरी, जानिए क्यों

UPSC Civil Services Prelims: सिविल सेवा प्रारम्भिक परीक्षा के प्रश्नों में बदलाव जरूरी, जानिए क्यों

UPSC Civil Services Prelims: प्री परीक्षा एक प्रकार की एन्ट्रेंस परीक्षा है, ताकि भीड़ को कम किया जा सके.

UPSC Civil Services Prelims: प्री परीक्षा एक प्रकार की एन्ट्रेंस परीक्षा है, ताकि भीड़ को कम किया जा सके.

UPSC Civil Services Prelims: क्या प्रारम्भिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा के प्राप्तांकों में कोई साम्य दिखाई नहीं देना चाहिए? यदि इनमें भारी अंतर है, तो यह भी प्रारम्भिक परीक्षा के प्रश्नों की खामियों की ओर स्पष्ट रूप से उंगली उठाता है.

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UPSC Civil Services Prelims: अभी-अभी हुई सिविल सेवा प्रारम्भिक परीक्षा के पेपर्स का चरित्र और स्तर पिछले साल जैसा ही रहा है. इसलिए इसके विशेषज्ञ एवं प्रतियोगियों का मानना है कि इसमें सफल होने के लिए न्यूनतम अंक भी पिछले वर्ष जैसे रहने की संभावना है. पिछले वर्ष सामान्य वर्ग के लिए यह 46.26 प्रतिशत था, जो इससे पहले के कई सालों, शायद दशकों तक का सबसे कम और यहाँ तक कि दयनीय स्कोर रहा है.

देश की सर्वोच्च सेवा में जाने वालों के लिए प्राप्त ये अंक, वे भी वस्तुनिष्ठ प्रणाली के द्वारा, कुछ सोचने के लिए बाध्य करते हैं. सन् 1979 में जब इस प्रारम्भिक परीक्षा की शुरूआत हुई थी, तब हांलाकि ‘कट ऑफ मार्क्स‘ की घोषणा नहीं की जाती थी. लेकिन यह किसी भी स्थिति में 60% से कम नहीं था, जो एक सम्मानजनक स्कोर माना जा सकता है. लेकिन 46%……….?

हांलाकि यह प्री परीक्षा एक प्रकार की एन्ट्रेंस परीक्षा है, ताकि भीड़ को कम किया जा सके. यह इसका मुख्य उद्देश्य भी है. लेकिन यही एकमात्र उद्देश्य नहीं होना चाहिए. इस परीक्षा में पूछे गये प्रश्नों के टॉपिक्स, उन्हें पूछने के ढंग तथा उनकी बनावट की जटिलता को देखकर यह साफ लगता है कि आयोग चाहता ही नहीं है कि प्रतियोगी अपने दिमाग का उपयोग करके सही उत्तर तक पहुँचने का प्रयास करे. यदि उसने पूछे गये प्रश्न के बारे में कहीं पढ़ा या सुना तक नहीं है, तो उसके सही विकल्प की कोशिश जुआ में पासा फेंकने जैसा होगा, क्योंकि उत्तर के गलत होने पर उसे निगेटिव मार्किंग का नुकसान उठाना पड़ेगा. विशेषकर विज्ञान एवं पर्यावरण पर पूछे गये प्रश्नों की प्रकृति प्रतियोगियों को जानबूझकर इन्हें अटेम्पट करने से वंचित रखने की होती है. सौ में से कुल लगभग 20-25 ऐसे ‘तथाकथित भंयावह‘ प्रश्न देखे जा सकते हैं. जाहिर है कि ऐसे में प्रतियोगियों के लिए 75-80 प्रश्न ही शेष रह जाते हैं. तब तो 46% का स्कोर ठीक-ठाक कहा जा सकता है.

विचार करने की एक बात यह भी है कि क्या प्रारम्भिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा के प्राप्तांकों में कोई साम्य दिखाई नहीं देना चाहिए? यदि इनमें भारी अंतर है, तो यह भी प्रारम्भिक परीक्षा के प्रश्नों की खामियों की ओर स्पष्ट रूप से उंगली उठाता है. पिछले सात वर्षों के दौरान तीन वर्षों के ऐसे ‘ऑल इंडिया रैंक वन‘ रहे हैं, जिनके प्रारम्भिक परीक्षा में स्कोर बिल्कुल बार्डर पर थे. यदि वे एक अंक से भी चूक जाते, तो मुख्य परीक्षा में ही नहीं बैठ पाते.

दरअसल, प्री के प्रश्न ऐसे होने चाहिए, जो रटे हुए फैक्ट पर आधारित न होकर विषय की अवधारणा पर आधारित हों. साथ ही ऐसे भी न हों कि वे परीक्षार्थी के सिर के ऊपर से ही गुजर जायें. ऐसी स्थिति में हम उनका सही मानसिक स्तर, समझ एवं अनुमान लगाने की क्षमता की सटिकता का परीक्षण करने के एक अवसर को खो देते हैं, जो प्रशासक का सबसे अनिवार्य गुण होता है.

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Tags: UPSC, Upsc exam

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