UPSC Exam Preparation Tips: आई. ए. एस. बनने का ढ़ंग बदलें, इस परीक्षा में तुक्का नहीं लगता

बता दें कि यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा, सिविल सर्विस एग्जाम को क्लीयर करने वाले एग्जाम का पहला स्टेप है. इसकी तैयारी के लिए ये टिप्स बहुत काम की हैं.
बता दें कि यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा, सिविल सर्विस एग्जाम को क्लीयर करने वाले एग्जाम का पहला स्टेप है. इसकी तैयारी के लिए ये टिप्स बहुत काम की हैं.

काम करना या ज्यादा से ज्यादा काम करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि तरीके से काम करना उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 3, 2020, 12:39 PM IST
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नई दिल्ली. आई.ए.एस. परीक्षा के आँकड़े बताते हैं कि पचास प्रतिशत सिलेक्टेड विद्यार्थी वे होते हैं, जिनके पास फर्स्ट क्लास की डिग्री नहीं होती. इन आँकड़ों को देखने के बाद मन में एक सवाल सहज रूप में ही उठता है कि क्या जिस आई.ए.एस. की प्रारम्भिक परीक्षा के लिए लगभग दस-बारह लाख विद्यार्थी एप्लाई करते हैं, उनमें से एक हजार विद्यार्थी भी ऐसे नहीं होते, जो टॉपर रहे हों या कम से कम फर्स्ट डिवीजन तो रहे ही हों ? निश्चित तौर पर इनकी संख्या कई हजार की होती है.

आई.ए.एस. की परीक्षा में तुक्का नहीं लगता
तो फिर ऐसा क्यों होता है कि ये टॉपर और पीएचडी होल्डर्स लिस्ट से बाहर हो जाते हैं और उस लिस्ट में सैकेण्ड एवं थर्ड डिवीजनर्स तक को जगह मिल जाती है ? ऐसा नहीं है कि यह इत्तेफाकन ही हो जाता है, जिसे आप ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना‘ कह सकें. आई.ए.एस. की परीक्षा में तुक्का नहीं लगता, और चलिए मान लेते हैं कि कभी-कभी लग भी जाता है, तो वह पचास प्रतिशत पर तो नहीं ही लगेगा.

अपने-आपको प्रतियोगी परीक्षा के अनुकूल ढालें
यह इस तथ्य को साफतौर पर प्रमाणित करता है कि ये सैकेण्ड और थर्ड डिवीजनर्स विद्यार्थी वे विद्यार्थी थे, जिन्होंने अपने-आपको प्रतियोगी परीक्षा के अनुकूल ढाल लिया. जो टॉपर और फर्स्ट डिवीजनर्स इसमें नहीं आ पाए, वे वे विद्यार्थी थे, जो विश्वविद्यालयीन परीक्षा के पैटर्न पर ही आई.ए.एस. की परीक्षा देते रहे और लिस्ट से बाहर हो गए.



उत्तर लिखने की शैली में बदलाव लाएं
विद्यार्थियों को आई.ए.एस. की तैयारी कराते समय मुझे जो सबसे बड़ी दिक्कत आती है, वह यही है कि उन्होंने अपने-आपको ठोस पदार्थ से ऐसे द्रव पदार्थ में बदलने से इंकार कर दिया, जिससे वे आई.ए.एस. के साँचे में फिट हो सकें. मेरी स्वयं की सीमा यह रही कि मैं उन्हें समझा तो सका, लेकिन बदल नहीं सका. और मेरी इतनी कुव्वत नहीं है कि मैं यू.पी.एस.सी. को बदल सकूँ. अतः नुकसान विद्यार्थियों को ही उठाना पड़ा. वे अपने कॉलेज के पढ़ने के ढंग तथा उत्तर लिखने की शैली में कोई बदलाव नहीं ला सके.

 एक ही विषय पर कई-कई लेखकों की किताबें पढ़ें
हाँ, एक बदलाव वे जरूर लाए, और वह बदलाव था - एक ही विषय पर कई-कई लेखकों की किताबें पढ़ना और यहाँ तक कि अच्छे-अच्छे लेखकों की किताबें पढ़ना. पढ़ना ही नहीं, बल्कि उन्हें रट भी डालना. लेकिन सिविल सर्विस को इन दोनों में से किसी की जरूरत नहीं होती. और जिस तीसरी चीज की जरूरत होती है, वह इनके पास होती नहीं. इस प्रकार दोनों में तालमेल नहीं बैठ पाता. और नतीजा बिना विवाह के ही तलाक का हो जाता है- ‘तू तेरी रहा, मै मेरी राह.‘

आई.ए.एस. की तैयारी के लिए केवल पढ़ना ही पर्याप्त नहीं
यह मेरा एक बहुत कड़वा एवं दुःखद अनुभव रहा है. पता नहीं विद्यार्थियों को ऐसा क्यों लगता है कि आई.ए.एस. की तैयारी के लिए केवल पढ़ना ही पर्याप्त है. यदि आप उन्हें तैयारी के लिए कुछ दूसरी महत्वपूर्ण बातें बताने लगें, तो थोड़ी ही देर में उन्हें जम्हाइयाँ आने लगती हैं और आप उन्हें इधर-उधर ताकते हुए आसानी से देख सकते हैं. वे सोचते हैं कि भला इसका हमारे आई.ए.एस. की तैयारी से क्या लेना-देना है.

अब्राहम लिंकन की ये बात बहुत काम की है
अमेरिका के महान राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने इस बारे में एक बहुत जोरदार बात कही थी, जिसे मैं यहाँ आप लोगों को बताना चाहूँगा. उन्होंने कहा था कि “यदि मुझे कोई लकड़ी काटने के लिए छह घंटे दे, तो मैं उसमें से चार घंटे अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाऊँगा.” यह बहुत महत्वपूर्ण कथन है और इसे आपको समझने की कोशिश करनी चाहिए.

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तरीके से काम करना ज्यादा महत्वपूर्ण
अब्राहम लिंकन कहना यही चाह रहे हैं कि काम करना या ज्यादा से ज्यादा काम करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि तरीके से काम करना उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. यदि आप अपनी कुल्हाड़ी की धार को बहुत तेज कर लेते हैं, तो दो घंटे में ही आप उससे अधिक लकड़ियाँ काट लेंगे, जितना आप लगातार छह घंटे में काटते. यानी कि पढ़ने के परे भी कुछ ऐसी बातें होती हैं, जो पढ़ने से भी अधिक महत्वपूर्ण होतीं हैं. (लेखक पूर्व सिविल सर्वेंट तथा afeias के संस्थापक है.)
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