• Home
  • »
  • News
  • »
  • career
  • »
  • UPSC Exams: यूपीएससी पर उठते सवालों पर जानिए पूर्व सिविल सर्वेंट की राय

UPSC Exams: यूपीएससी पर उठते सवालों पर जानिए पूर्व सिविल सर्वेंट की राय

परीक्षा में शामिल होने के लिए कुल अवसरों की संख्या अधिकतम 6 तय की गई है.

परीक्षा में शामिल होने के लिए कुल अवसरों की संख्या अधिकतम 6 तय की गई है.

फिलहाल लोग राजनीतिक हस्तक्षेपों के कारण निर्मित अविश्वास के जिस वातावरण में रह रहे हैं, वहां इस प्रकार की आशंकायें व्यक्त की जानी स्वभाविक बातें हैं.

  • Share this:

नई दिल्ली. किसी भी संस्था की वास्तविक शक्ति उसके प्रति लोगों के विश्वास में निहित होती है. और यदि यह संस्था संवैधानिक हुई, तब तो विश्वसनीयता उसकी अनिवार्यता बन जाती है. फिलहाल मैं यह बात संघ लोक सेवा आयोग को ध्यान में रखकर कह रहा हूँ.

संदेह के पीछे दो प्रमुख कारण
आयोग द्वारा जारी दूसरी सूची में अंजलि बिड़ला का नाम आई.ए.एस. के लिए घोषित होना लोगों के दिमाग में तरह-तरह के संदेह पैदा कर रहा है. इस संदेह के पीछे दो प्रमुख कारण हैं. इनमें पहला और सबसे प्रमुख कारण है, अंजलि के पिता का लोकसभा अध्यक्ष होना. दूसरा कारण है, नाम की घोषणा दूसरी सूची में किया जाना.

भाषा के आधार पर उनके साथ भेद भाव
आयोग पर इससे पहले भी इस तरह के संदेह व्यक्त किये गये हैं. गैर अंग्रेजीभाषी उम्मीद्वारों का कहना है कि भाषा के आधार पर उनके साथ भेद भाव किया जाता है. इस परीक्षा पर अब पूरी तरह से अंग्रेजी वालो का अधिकार स्थापित करा दिया गया है. अन्य आधारों पर तो नही, लेकिन आयोग अपने प्रश्न पत्रों में अनुवाद के रूप में जिस हिन्दी का उपयोग कर रहा है, उसे देखते हुए इस आरोप से एकदम से इंकार करना जरा कठिन है.

आरोप की शुरूआत दस साल पहले हुई
इस आरोप की शुरूआत दस साल पहले तब हुई थी, जब सन् 2011 की प्रारंभिक परीक्षा में एप्टीट्यूड संबंधी पेपर डाला गया था. इसके कुल 80 प्रश्नों में 8-10 प्रश्न विशुद्ध रूप से अंग्रेजी भाषा के सूक्ष्म ज्ञान से जुड़े हुए होते थे. इन थोड़े से प्रश्नों ने लाखों गैर अंग्रेजीभाषियों को इस मुकाबले के पहले दौर में बाहर करने का एक घोर अलोकतांत्रिक कार्य किया.

संसद में किये गये सवाल-जवाब के बाद आयोग की नींद टूटी
लेकिन हर वर्ष के परीक्षा परिणाम के विभिन्न आँकड़ों पर बड़ी सूक्ष्मता से ध्यान देने वाले आयोग के चेहरे पर इसको लेकर कोई सिकुड़न तक नहीं आई. लम्बे आंदोलनों, धरनों और अंत में संसद में किये गये सवाल-जवाब के बाद कहीं जाकर आयोग की नींद टूटी और उसने सी-सेट के पेपर से अंग्रेजी के प्रश्नों को हटाने का निर्णय लिया.

प्रश्न अभी अंजलि बिड़ला के चयन को लेकर
सच यह है कि सन् 2011 की इस घटना के बाद से आयोग की विश्वनीयता पर उन तथ्यों को लेकर भी सवाल खड़े किये जाने लगे, जहाँ अविश्वास किये जाने का कोई आधार दिखाई नहीं देता. इसी तरह का एक प्रश्न अभी अंजलि बिड़ला के चयन को लेकर उठाया जा रहा है.

राज्य का कैडर उनके बेटे को मिला
मुझे याद है कि कुछ इसी तरह की स्थिति सन् 1983 में भी आई थी. मेरे बैच में जिन्हें चौथा स्थान मिला था, संयोग से उनके पिता इस समय केन्द्र में गृह राज्य मंत्री थे, जो कुछ दिनों बाद उसी राज्य के राज्यपाल बनाये गये, जिस राज्य का कैडर उनके बेटे को मिला था. बात केवल इतनी ही नहीं थी. इन राजनेता की बहु का भी इसी परीक्षा में सेलेक्शन हुआ.

राजनीतिक हस्तक्षेपों के कारण निर्मित अविश्वास 
फिलहाल लोग राजनीतिक हस्तक्षेपों के कारण निर्मित अविश्वास के जिस वातावरण में रह रहे हैं, वहां इस प्रकार की आशंकायें व्यक्त की जानी स्वभाविक बातें हैं.

लेकिन यहाँ मैं एक बात अवश्य कहना चाहूंगा. ये दोनों सिविल सर्वेंट मेरे अच्छे मित्र रहे हैं. इन दोनों के चयन को लेकर कोई कुछ भी क्यों न कहे, लेकिन इन दोनों की योग्यताओं को लेकर कोई जरा भी उंगली नहीं उठा सकता. वैसे भी आयोग की जिस प्रकार की कार्यप्रणाली है, उसको देखते हुए मन यह मानने को तैयार नहीं है कि अंजलि के चयन के बारे में कुछ गलत हुआ होगा.

व्यर्थ के संदेहों पर यकीन करके आत्मविश्वास को कमजोर पड़ने नहीं दें
फिलहाल मैं आयोग की परीक्षा में बैठने वालों से यह कहना चाहूंगा कि जब तक प्रमाण सामने नहीं आ जाते, तब तक व्यर्थ के संदेहों पर यकीन करके आपको अपने आत्मविश्वास को कमजोर पड़ने नहीं देना चाहिए. (इस लेख के लेखक डॉ॰ विजय अग्रवाल हैं, वे पूर्व सिविल सर्वेंट और afeias के संस्थापक हैं.)

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज