IAS की परीक्षा में सफल होने के लिए है ज़रूरी, निरुत्साहित न हों परीक्षार्थी

यूपीएससी सिविल सेवा में इस वर्ष 712 और भारतीय वन सेवा परीक्षा में 110 वैकेंसी है.

यूपीएससी सिविल सेवा में इस वर्ष 712 और भारतीय वन सेवा परीक्षा में 110 वैकेंसी है.

सरकार अब केन्‍द्र के निदेशक एवं संयुक्‍त सचिव के पद पर बाहर के विशेषज्ञों की सीधी भरती करने लगी है. सामान्‍यत: इन पदों पर सिविल सेवा परीक्षा में चयनित अधिकारी ही न्‍यूनतम अपने पन्‍द्रह साल की सर्विस पूरी करने के बाद ही पहुँच पाते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 27, 2021, 11:55 AM IST
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नई दिल्ली. 27 जून को होने वाली सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा के फार्म लगभग-लगभग भरे जा चुके हैं. इस परीक्षा की तैयारी के बारे में जब स्‍टूडेन्‍टस् से मेरी बात होती है, तो मुझे उनकी आवाज में उस गर्मजोशी का अहसास नहीं हो पाता, जो इस परीक्षा में सफल होने के लिए ज़रूरी है. आखिर ऐसा क्‍यों है? इस बारे में परीक्षार्थियों को कुछ जरूरी बातें बताना मैं अपना धर्म समझता हूँ.

परीक्षा देनी चाहिए या नहीं की दुविधा

फिलहाल दो ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिन्‍हें लेकर परीक्षार्थी दुविधा की स्थिति में फंसे जान पड़ रहे हैं. यह दुविधा इस बात को लेकर उतनी नहीं है कि उन्‍हें परीक्षा देनी चाहिए या नहीं, बल्कि इससे कहीं अधिक इस बात को लेकर है कि उन्‍हें आय.ए.एस. बनना चाहिए या नहीं. जाहिर है कि यदि मन में अपने उद्देश्‍य के ही प्रति इस तरह की दुविधा का भाव होगा, तो सफलता संदिग्‍ध ही रहेगी.

आई.ए.एस. अधिकारियों के प्रति संसद में कहे गए शब्‍द 
दरअसल, पिछले एक महीने में दो ऐसी घटनाएं घटी हैं, जिनके कारण इस परीक्षा में बैठने वाले नौजवान स्‍वयं को हतोत्‍साहित पा रहे हैं. इसमें पहली घटना प्रधानमंत्री जी का आई.ए.एस. अधिकारियों के प्रति संसद में कहे गए शब्‍द हैं . उन्‍होंने इस तरह की बात कही थी, जिससे आय.ए.एस. अधिकारियों के प्रति राजनेताओं एवं समाज का नकारात्‍मक भाव स्‍पष्‍ट होता है. इसका संबंध एक प्रकार से उनकी योग्‍यता पर स्‍पष्‍टत: प्रश्‍नचिन्‍ह लगाना था.

संयुक्‍त सचिव के पद पर बाहर के विशेषज्ञों की सीधी भरती

दूसरी घटना इस बात से जुड़ी है कि सरकार अब केन्‍द्र के निदेशक एवं संयुक्‍त सचिव के पद पर बाहर के विशेषज्ञों की सीधी भरती करने लगी है. सामान्‍यत: इन पदों पर सिविल सेवा परीक्षा में चयनित अधिकारी ही न्‍यूनतम अपने पन्‍द्रह साल की सर्विस पूरी करने के बाद ही पहुँच पाते हैं. इन भर्तियों के कारण युवाओं को लग रहा है कि इससे उनका कैरियर बाधित होगा.



कई राजनेताओं ने आई.ए.एस. अधिकारियों की योग्‍यता पर सवाल खड़े किए

जहाँ तक प्रधानमंत्री के वक्‍तव्‍य का प्रश्‍न है, मैं बताना चाहूँगा कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. कई बार कई राजनेताओं ने आई.ए.एस. अधिकारियों की योग्‍यता पर सवाल खड़े किए हैं. यहाँ तक कि उन्‍हें सार्वजनिक रूप से भी आलोचना एवं अपमान का सामना करना पड़ा था. इसमें प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा विदेश सचिव के साथ प्रेस कांफ्रेंस में किया गया दुर्व्‍यवहार अभी भी लोगों के दिमाग में ताजा है.

‘ब्‍यूरोक्रेसी’ का यह वर्ग दुनिया भर में आलोचना का शिकार 

आई.ए.एस. अधिकारी नौकरशाही तंत्र के शिखर पर होते हैं. ‘ब्‍यूरोक्रेसी’ का यह वर्ग भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में आलोचना का शिकार रहा है, और वह भी अभी से नहीं, बल्कि तब से ही, जब से नौकरशाही का एक व्‍यवस्थित तंत्र स्‍थापित हुआ है. जर्मनी के मेक्‍स वेबर और ब्रिटेन के कार्लमार्क्‍स के नौकरशाही के बारे में विचारों को इस बार में पढ़ा जा सकता है. हाल ही में अमेरीका के पूर्व राष्‍ट्रपति ट्रम्‍प और संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के पूर्व महासचिव ने नौकरशाही के समक्ष अपनी असहायता को व्‍यक्‍त करते हुए साफ तौर पर इन्हे ‘’संस्‍था की जड़ता’’के लिए जिम्‍मेदार ठहराया था.

ऐसी कौन-सी सेवा है, जहां आलोचना का शिकार न होना पड़े

यहाँ मेरा उद्देश्‍य केवल यह बताना भर है कि इस तरह की घटनाएं हर उस तंत्र के बारे में होती ही है, जिनके हाथ में सत्ता होती हैं. क्‍या स्‍वयं प्रधानमंत्री इस तरह की आलोचनाओं से परे होते हैं? यहाँ तक कि ऐसी कौन-सी सेवा है, या सार्वजनिक सेवा में लगा वह व्‍यक्ति है, जिसे अंतत: लोगों की आलोचना का शिकार न होना पड़ा हो. वैसे भी एक सिविल सर्वेन्‍ट में अपनी आलोचना सुनने की क्षमता होनी भी चाहिए. यह उसका एक अनिवार्य गुण होता है.

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‘लेटरल एंट्री’

जहाँ तक ‘लेटरल एंट्री’ का सवाल है, पहली बात तो यह कि इसकी संख्‍या ऊँट के मुँह में जीरे के बराबर है. दूसरे यह कि ये भर्तियां मध्‍यम स्तर पर हो रही हैं. यानी कि नीचे के स्‍तर पर अधिकारियों की जरूरत पहले जितनी ही बनी रहेगी. इसका अर्थ यह हुआ कि भर्तियों की कुल वार्षिक संख्‍या पर इस लेटरल एन्‍ट्री की संख्‍या का प्रभाव बिल्‍कुल भी नहीं होगा.

इसलिए आई.ए.एस. बनने का सपना लेकर तैयारी करने वाले मेरे सभी युवा साथियों को मेरी यह बिन मांगी सलाह है कि वे इन घटनाओं से ऊपर उठकर पूरी ऊर्जा और उत्‍साह के साथ अपनी तैयारी में लगे रहें. इन छोटे-छोटे कारणों से अपने मन को निरुत्‍साहित न करें. साथ ही आप यह भी देखें कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका मन इस तरह की घटनाओं का इस्‍तेमाल परीक्षा के युद्ध-क्षेत्र में लड़ने से बचने के लिए एक ढाल की तरह तो नहीं कर रहा है. यह एक मनोवैज्ञानिक षड़यंत्र होता है, जिसे आपको समझना होगा.

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