UPSC Preparation Tips: IAS की तैयारी नहीं होती बेकार, सफल न होने पर भी ऐसे मिलता है फायदा

अगर आईएएस में चयन नहीं भी हो पाता तो भी तैयारी का फायदा जरूर मिलता  है.

अगर आईएएस में चयन नहीं भी हो पाता तो भी तैयारी का फायदा जरूर मिलता है.

UPSC Preparation Tips: अक्सर ऐसा लगता है कि अगर आईएएस में सेलेक्शन नहीं हुआ तो पूरी की पूरी तैयारी व्यर्थ हो गई. लेकिन ऐसा नहीं है. देखने में आया है कि राज्य सिविल सेवा परीक्षा में सफल होने वाले अभ्यर्थियों में 80 से 85 फीसदी कैंडीडेट्स आईएएस की तैयारी करने वाले होते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 11, 2021, 10:41 AM IST
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नई दिल्ली. ज्यादातर युवा आई.ए.एस. बनना चाहते हैं. क्यों नहीं, बनना भी चाहिए. इसमें हर्ज़ ही क्या है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि बनने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है. यदि आप आई.ए.एस. की परीक्षा क्वालीफाई नहीं कर पाते, तो चाहे आप इन्टरव्यू तक ही क्यों नहीं पहुंच गए हों, इसके दम पर आपको कोई भी नौकरी नहीं मिलेगी. आपकी मुख्य परीक्षा की मार्कशीट की कोई वेल्यू नहीं होगी और आप फिर से वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से आपने इस यात्रा की शुरुआत की थी.

यदि आप अपनी आई.ए.एस. की तैयारी की पूरी जद्दोजहद को केवल आई.ए.एस. तक ही सीमित करके देखते हैं, तब तो मेरी यह बात शत-प्रतिशत सही है, अन्यथा यह अर्धसत्य से अधिक बिल्कुल नहीं है. वैसे सच यही है कि यह अर्धसत्य ही है. ज्ञान चाहे कोई भी क्यों न हो, कभी व्यर्थ नहीं जाता- बशर्ते कि आप उसे व्यर्थ जाने न दें. इसके लिए मुझे भोपाल के शायर बशीर बद्र जी की दो पंक्तियां बहुत अच्छी लगती हैं -

कोई भी कोशिश कभी नाकाम यूं जाती नहीं,

मंज़िलें न भी मिलीं तो, फासले घट जाएंगे.
घट जाने वाला यह फासला किस मंजिल का फासला है ? यदि आप इस उत्तर की खोज करें, तो अंततः इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि ‘मेरी आई.ए.एस. की तैयारी बेकार नहीं जाएगी, यदि मैं इसे बेकार नहीं जाने दूं, तो. ‘यह बात मैं किसी भावना के आवेश में आकार नहीं कह रहा हूं. उपदेश की शैली में भी नहीं कह रहा हूं, बल्कि पूरी सामाजिक सच्चाई के साथ कह रहा हूं. यह सामाजिक सच्चाई क्या है ? पिछले लगभग 15-20 सालों से मुझे प्रतियोगी परीक्षाओं का एक अन्य फिनोमिना देखने को मिल रहा है. आई.ए.एस. की तर्ज पर ही प्रत्येक राज्य अपने यहां की सिविल सेवा परीक्षाएं आयोजित करता है. इसके अंतर्गत डिप्टी कलेक्टर, डिप्टी पुसिल अधीक्षक तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति होती है.

मुझे एक अद्भुत बात यह देखने को मिली कि राज्य की इन सेवाओं में 80-85 प्रतिशत सफल विद्यार्थी वे होते हैं, जिन्होंने इससे पहले आई.ए.एस. की परीक्षा की तैयारी की हुई होती है. यानी कि वे तैयारी तो आई.ए.एस. की कर रहे होते हैं, लेकिन राज्य की परीक्षाओं में भी बैठते रहते हैं. वहां सफल नहीं हो पाते, तो यहां सफल हो जाते हैं.

यहां तक देखने में आया है कि बहुत से युवा आई.ए.एस. की परीक्षा में मनपसन्द नौकरी न मिलने पर उसे छोड़कर राज्य सिविल सेवा ज्वॉइन कर लेते हैं. यह उनकी व्यक्तिगत जरूरत और रुचि का मामला है. कहा जाता है कि हाथी के पांव में सबके पांव समा जाते हैं. आई.ए.एस. की परीक्षा की तैयारी अपने-आप में हाथी के पांव की तरह इतनी व्यापक और गहरी तैयारी होती है कि उसको करने के बाद आपको अन्य परीक्षाओं की बहुत अधिक तैयारी करने की जरूरत नहीं रह जाती.



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राज्य की परीक्षाओं के न केवल पाठ्यक्रम ही सिविल सेवा से कम होते हैं, बल्कि उनका स्तर भी कम होता है. ऐसी स्थिति में आई.ए.एस. की तैयारी करने वाले विद्यार्थी उनकी तुलना में बाजी मार ले जाते हैं, जो केवल राज्य परीक्षा की तैयारी करते हैं. यानी कि अब कुछ ऐसा हो गया है कि यदि किसी को राज्य सिविल सेवा में जाना है, तो उसे आई.ए.एस. की परीक्षा की तैयारी करनी पड़ेगी.

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