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UPSC Preparation Tips: IAS और PCS की परीक्षा में है अंतर, पास करने के अलग हैं तरीके

आई.ए.एस. परीक्षा की तो बात ही बिल्कुल अलग है. पूरे देश के विद्यार्थी, और वह भी वे विद्यार्थी; जो कहीं न कहीं स्वयं को अच्छा विद्यार्थी मानते हैं, इस परीक्षा में बैठते हैं. यहां राज्य इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि राज्यों में होने वाली पढ़ाई.

आई.ए.एस. परीक्षा की तो बात ही बिल्कुल अलग है. पूरे देश के विद्यार्थी, और वह भी वे विद्यार्थी; जो कहीं न कहीं स्वयं को अच्छा विद्यार्थी मानते हैं, इस परीक्षा में बैठते हैं. यहां राज्य इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि राज्यों में होने वाली पढ़ाई.

आई.ए.एस. परीक्षा की तो बात ही बिल्कुल अलग है. पूरे देश के विद्यार्थी, और वह भी वे विद्यार्थी; जो कहीं न कहीं स्वयं को अच्छा विद्यार्थी मानते हैं, इस परीक्षा में बैठते हैं. यहां राज्य इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि राज्यों में होने वाली पढ़ाई.

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IAS Preparation Tips: राज्य की सिविल सेवा परीक्षाएं (Civil Services Exam) इस मायने में थोड़ी राहत देने वाली होती हैं. हालांकि दूसरे राज्य के विद्यार्थी भी आप के राज्य की सिविल सेवा परीक्षा में बैठ सकते हैं, फिर भी इनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं होती. लेकिन आई.ए.एस. परीक्षा की तो बात ही बिल्कुल अलग है. पूरे देश के विद्यार्थी, और वह भी वे विद्यार्थी; जो कहीं न कहीं स्वयं को अच्छा विद्यार्थी मानते हैं, इस परीक्षा में बैठते हैं. यहां राज्य इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि राज्यों में होने वाली पढ़ाई. अलग-अलग राज्यों में पढ़ाई का स्तर अलग-अलग है, शिक्षा का माध्यम अलग-अलग है और एक्सपोजर भी अलग-अलग है.

निश्चित रूप से कुछ राज्य इस मायने में काफी अच्छे माने जाते हैं, तो कुछ काफी पिछड़े. राज्यों के अपने-अपने एजुकेशन बोर्ड हैं और उन बोर्ड्स का अपना-अपना पाठ्यक्रम है. हालांकि राज्यों में चलने वाले निजी स्कूलों को यह छूट है कि यदि वे चाहें तो अपने यहां सी.बी.एस.ई. की पढ़ाई करा सकते हैं. बहुत से स्कूल अब कराने भी लगे हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि अभी भी अधिकांश राज्यों के बोर्ड के पाठ्यक्रम एवं परीक्षा का स्तर सी.बी.एस.ई. की तुलना में कमतर है. बोर्ड से पढ़कर निकले विद्यार्थियों को थोड़ा-सा नुकसान इस बात का भी उठाना पड़ता है कि आई.ए.एस. का पाठ्यक्रम, उसका स्तर तथा प्रश्न पूछने की पद्धति काफी कुछ सी.बी.एस.ई. के पैटर्न पर होती है.

कुछ इसी तरह का अंतर विश्वविद्यालयों में भी होता है. कुछ विश्वविद्यालय और महाविद्यालय बहुत अच्छे माने जाते हैं, जिनमें दाखिला पाना गौरव की बात होती है. विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम भी अलग-अलग होते हैं और पेपर्स में आने वाले प्रश्न भी. उदाहरण के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम और प्रश्न-पत्रों को देखा जा सकता है, जो काफी कुछ आई.ए.एस. के पाठ्यक्रम से मिलते-जुलते हैं. जाहिर है कि जिस विद्यार्थी ने यहां से ग्रेज्युएशन किया है, वह पहले से ही लाभ की स्थिति में रहता है.

स्थान भेद के रूप में गांव, नगर और महानगरों के भेद को भी लिया जाना चाहिए. ग्रामीण पृष्ठभूमि का विद्यार्थी न केवल जीवन के आधुनिक संदर्भों, अनुभवों और भाषा-शैली से ही अपरिचित रहता है, बल्कि उसकी बॉडी र्लैंग्वेज भी अलग होती है. उसके पास पढ़ने की सामग्री, उचित निर्देशन तथा डिस्कशन के लिए स्तरीय मित्रों का अभाव रहता है. जबकि महानगर में रहने वाले विद्यार्थियों को इसके लिए अलग से कुछ भी नहीं करना पड़ता, बशर्ते कि वे सजग हों.

इस प्रकार कई ऐसी स्थितियां होती हैं, जो स्थान के कारण या तो विद्यार्थी की शक्ति बन जाती हैं या फिर उसकी कमजोरी. लेकिन यू.पी.एस.सी. का इससे कुछ लेना-देना नहीं होता कि आप किस राज्य के हैं, कि आप किस विश्वविद्यालय से पढ़े हुए हैं, कि आप गांव से हैं या शहर से. उसे तो अपना वह मैटल चाहिए, जो वह चाहता है. अब आप समझ सकते हैं कि यह स्थिति आपके सामने एक बड़ा संकट खड़ा करती है, जिससे आपको जूझना होता है.
(लेखक पूर्व सिविल सर्वेंट एवं afeias के संस्थापक हैं.)

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