आई.ए.एस. की परीक्षा में अब भी क्या है हिन्दी की स्थिति, पढ़ें डिटेल

4 अक्टूबर को सिविल सेवा की प्रारम्भिक परीक्षा हुई. (तस्वीर- pixabay)
4 अक्टूबर को सिविल सेवा की प्रारम्भिक परीक्षा हुई. (तस्वीर- pixabay)

परीक्षार्थी हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी पढ़कर यह सुनिश्चित हो ले कि अनुवाद सही है या नहीं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 13, 2020, 9:44 AM IST
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नई दिल्ली. एक सांविधिक संस्था होने के नाते संघ लोक सेवा आयोग पर संविधान की आत्मा की रक्षा करने का विशेष दायित्व आता है. सन् 1978 में कोठारी आयोग की सिफारिशों के अनुसार कुछ भारतीय भाषाओं को सिविल सेवा परीक्षा का माध्यम बनाकर इसने उस दिशा में पहला और सर्वाधिक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया था. इससे सही मायानों में भारतीय नागरिको को देश की सर्वोच्च सेवा में प्रवेश करने का अवसर मिला था.

अनुवाद सन् 1979 से हो रहा है
लेकिन दुर्भाग्य से सन् 2011 के बाद से भाषाई संबंधी इस समानता के अधिकार का अप्रत्यक्ष रूप से हनन किया जा रहा है. यह धारदार कुल्हाड़ी अंग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद की कुल्हाड़ी है. अनुवाद सन् 1979 से हो रहा है. लेकिन विशेष रूप से पिछले एक दशक के अनुवाद जितने भ्रष्ट, बेढंग, शर्मनाक और यहाँ तक कि गलत हैं, उन्हें पढ़कर किसी भी हिन्दी के जानकार का गुस्सा आना लाजिमी है.

4 अक्टूबर को सिविल सेवा की प्रारम्भिक परीक्षा हुई है. इसके अनुवाद के कुछ नमूने देखें.
-सिविल डिस्आबिडियंस मुवमेन्ट का हिन्दी अनुवाद है - ”असहयोग आन्दोलन”.


-पेस्टिसाइड का अनुवाद पीडकनाशक
-कंटेन्स (contains) - अंतर्विष्ट आदि

गलत अनुवाद एवं अबूझ अनुवाद
इस हिन्दी अनुवाद के दो सबसे आपत्तिजनक रूप है - गलत अनुवाद एवं अबूझ अनुवाद. यूपीएससी की हिन्दी को पढ़ने के बाद यह अनुमान लगाना बिलकुल मुश्किल नही है कि यह गूगल महोदय की करतूत है, किसी जीवित व्यक्ति की नहीं. साथ ही यह भी कि एक बार मशीनी अनुवाद हो जाने के बाद कोई भी व्यक्ति उसकी जाँच करने की तकलीफ नहीं उठाता. क्या किसी भी इतनी उच्च स्तरीय, संविधान द्वारा स्थापित एवं संरक्षित तथा महत्वपूर्ण संस्था के द्वारा की जाने वाली इस तरह की लापरवाही किसी अपराध से कम है.

परीक्षार्थी हिन्दी के साथ अंग्रेजी को भी पढ़कर यह सुनिश्चित हो
अब यहाँ एक घोषित भाषाई अपराध का उदाहरण देखिए. नियम बनाया गया है कि अनुवाद में किसी प्रकार की त्रुटि होने की स्थिति में अंग्रेजी को सही माना जाएगा. क्या आपको यह नही लगता कि यह नियम स्वयं की रक्षा में उठाया गया एक बहुत ही निर्मम एवं हास्यास्पद कदम है. इसका मतलब तो यही हुआ कि परीक्षार्थी हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी पढ़कर यह सुनिश्चित हो ले कि अनुवाद सही है या नहीं.

गलत अनुवाद वाले प्रश्नों की संख्या
वैसे तो इस प्रकार की गलतियां होती ही अक्षम्य हैं, क्योंकि इससे सालों-साल मेहनत कर रहे लाखों युवाओं के सपने और श्रम जुड़े रहते हैं. लेकिन इसके स्थान पर क्या यह नियम समानता के सिद्धांत के निकट नहीं होता कि गलत अनुवाद वाले प्रश्नों की संख्या को कुल प्रश्नों की संख्या से हटा ही दिया जाये. राज्य लोक सेवा आयोगों के इस तरह के तथा प्रश्नों के गलत पूछे जाने अथवा गलत उत्तर होने पर कुछ उच्च न्यायालयों ने इसी तरह की व्यवस्था संबंधी फैसले दिये भी है.

सामान्यतया कट आफ मार्क्स 100 अंक
इस बार सिविल सेवा के लिए लगभग 800 पद विज्ञापित हैं. इसके लिए प्रारम्भिक परीक्षा के स्तर पर लगभग दस हजार परीक्षार्थियों का चयन होना है. इस चयन का मूल आधार वस्तुनिष्ठ किस्म के कुल 200 अंकों के लिए दिये गये 100 प्रश्न होते हैं. सामान्यतया कट आफ मार्क्स 100 अंक होता है. आप अनुमान लगा सकते हैं कि कुल 50% के औसत स्कोर के बीच 2 अंक कितना अधिक मायने रखता होगा.

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आयोग इस बारे में खुले एवं तटस्थ मन से विचार करे
साफ है कि आयोग को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. हाँ, यदि ऐसा कुछ फर्क अंग्रेजी वालों को पड़ रहा होता, तो आयोग निश्चित तौर पर इसे ताबडतोड़ ठीक भी करता. देश की नौकरशाही भी चुप नहीं बैठती. आयोग को चाहिए कि वह इस बारे में पूरे खुले एवं तटस्थ मन से विचार करे. (लेखक पूर्व सिविल सर्वेंट एवं afeias के संस्थापक हैं.)
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