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बाल दिवस : देश का कैसा भविष्य गढ़ रहे हम


Updated: November 14, 2019, 11:54 AM IST
बाल दिवस : देश का कैसा भविष्य गढ़ रहे हम
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है.

बच्चों का यह आरोप शुरू से रहा है कि स्कूल की पढ़ाई उबाऊ होती है, जबकि शिक्षक मानते हैं कि आज के बच्चे पढ़ने से जी चुराते हैं.

  • Last Updated: November 14, 2019, 11:54 AM IST
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जो मानते हैं कि शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य रोजगार दिला देना है या फिर अधिकार के प्रति सचेत करना भर है, वह वास्तव में शिक्षा, शिक्षक और स्कूल की ताकत और उसकी भूमिका को कम करके आंक (underestimate) रहे हैं. दरअसल, स्कूल तो एक ऐसा कारखाना होता है, जहां देश का भविष्य गढ़ा जाता है। यह अलग बात है कि इस नजरिए से विचार करने पर कई ऐसे सवाल उठ खड़े होते हैं, जिनका सामना करने से स्कूल प्रबंधन कतराता है, शिक्षक इन सवालों के पक्ष में खड़ा होना चाह कर भी खड़ा नहीं हो पाता। पर जरूरी है इन सवालों का सामना करना, इनके जवाब तलाशना और उन स्थितियों के बारे में ध्यान रखना जो हमें सवालों से मुंह चुराने को बाध्य कर रहे हैं.

बच्चों का यह आरोप शुरू से रहा है कि स्कूल की पढ़ाई उबाऊ होती है, जबकि शिक्षक मानते हैं कि आज के बच्चे पढ़ने से जी चुराते हैं, उनमें चीजों को जानने की लालसा नहीं है, वह किसी विषय को समझना नहीं चाहते. कायदे से देखें तो इन दोनों के आरोप बिलकुल सही हैं.

स्कूलों का पाठ्यक्रम जितना नीरस है, वैसी ही शुष्कता शिक्षकों के पढ़ाने के तरीके में भी है. पूरी तरह से किताबी. शिक्षण के काम में लगे हुए अधिकतर शिक्षक इसे महज अपना पेशा मानते हैं जबकि शिक्षण का काम किसी कला से कम नहीं. बढ़ती महंगाई और आपाधापी के इस दौर में ज्यादातर शिक्षक अपनी मासिक आय बढ़ाने में जुटे हैं, ट्यूशन करने में लगे हैं. उनके पास इतना वक्त नहीं कि वह शिक्षण के कलात्मक पहलुओं पर विचार कर सकें. अगले दिन अपने विषय को कैसे रोचक बना कर बच्चों के बीच रखा जा सकता है जैसे मुद्दों पर वे कोई होमवर्क करें। दूसरी तरफ, प्रबंधन की निगाह में उसका स्कूल एक ऐसा व्यवसाय है जिससे कि अधिक से अधिक पैसा कमाया जा सकता है. उनकी कोशिश होती है कि सरकारी गाइडलाइंस मोटे तौर पर पूरी कर लें ताकि इस व्यवसाय पर कोई आंच न आए. अगर 15 शिक्षकों से काम चल जा रहा है तो फिर उनकी संख्या बढ़ा कर 20 क्यों की जाए. यानी, प्रबंधन के लाभ कमाने के चक्कर में नुकसान उठाना पड़ रहा है बच्चों को.

यह तो वह स्थूल बात है जो घर-घर की कहानी की तरह हर स्कूल की है, हर बच्चे की है. इसे तो हम और आप मिल कर जिस दिन ठान लें दुरुस्त कर सकते हैं. बस जरूरत है ईमानदार इच्छाशक्ति की.

असल बात है उस बेईमान राजनीति और नौकरशाही की, जो नहीं चाहती कि स्कूल के कारखाने से देश का धारदार भविष्य पैदा हो. वह चाहती है कि बच्चे सवाल करना न सीखें, उनके भीतर अपने विचार न पनपें, बल्कि जो उन्हें बताया और रटाया जाए - बस उसी लीक को पकड़ कर कोल्हू के बैल की तरह चलते रहें. इसीलिए वह गैरजरूरी हस्तक्षेप करती है. पाठ्यक्रम को नीरस बनाए रखना चाहती है. इसे सरस बनाने की कोशिशों को बुरी तरह कुचलती है और जरूरत पड़ने पर डरा-धमका कर अपने मुताबिक संशोधन करवाती है.


ताजा मामला है हिंदी और उर्दू के मशहूर लेखक कृष्ण चंदर की कहानी ‘जामुन का पेड़’ को आईसीएसई के सिलेबस से हटा लेने का. जामुन का पेड़ कहानी लाल फीताशाही पर एक जबर्दस्त व्यंग्य है. कहानी दसवीं कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम का हिस्सा थी. आईसीएसई ने यह कदम एक राज्य विशेष के अधिकारियों द्वारा की गई आपत्ति के बाद उठाया है.

आईसीएसई के नोटिस के मुताबिक, 2020 और 2021 की बोर्ड परीक्षाओं में इस कहानी से जुड़े सवाल नहीं पूछे जाएंगे. आईसीएसई ने अपने फैसले की अधिसूचना 4 नवंबर को जारी की, जिसमें कहा गया है कि छात्रों को 2020 और 2021 की परीक्षाओं की तैयारी के दौरान इस कहानी पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है. आईसीएसई के मुख्य कार्यकारी और सचिव गेरी अराथून ने कहा कि यह फैसला इस वजह से किया गया है कि यह कहानी दसवीं कक्षा के उपयुक्त नहीं थी.
देश के लगभग तमाम राज्य इस बात के गवाह हैं कि सरकार बदलते ही बहुत चुप्पे से बच्चों के विचारों पर हमला होता है. सरकारें अपनी विचारधारा बच्चों में रोपने के लिए उनके कोर्स के साहित्य में बदलाव करती हैं. इस काम के लिए मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान अक्सर चर्चा में रहे हैं. राजस्थान के स्कूली शिक्षामंत्री रहे हैं वासुदेव देवनानी. पिछले साल उनका एक बयान छपा था, उसे पढ़ने से समझ में आता है कि सरकारी अमला बच्चों की शिक्षा को लेकर कितना और कैसे सोचता है. उन्होंने कहा था, ‘कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को बाकी दुनिया के बारे में पढ़ने की क्या जरूरत? पहले उनको राजस्थान के बारे में जानना चाहिए और फिर हिंदुस्तान के बारे में. फिर आगे बड़ी कक्षाओं में वे दुनिया के बारे में पढ़ सकते हैं.’ शिक्षा मंत्री ने इसे लागू करने का एक गणितीय सूत्र भी बताया था, ‘क्लास 1 से 5 तक बच्चों को 75 प्रतिशत सामग्री राजस्थान से जुड़ी पढ़नी चाहिए. बाकी 25 फीसदी में नेशनल कल्चर, इतिहास और व्यक्तित्वों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए.’

ऐसे बयान के बाद यह सहज याद आता है कि राजस्थान के स्कूली कोर्स में हाल के दिनों में क्या चीजें बदलने की खबरें आई थीं –
- विदेशी लेखकों के नाम पर कीट्स, टॉमस हार्डी, विलियम ब्लैक, टीएस एलियट जैसे लेखकों की रचनाएं आठवीं तक की किताब से बाहर कर दी गईं.
- ‘ज्यादा उर्दू शब्दों से पैदा मुश्किलात’ ने इस्मत चुगताई, सफदर हाशमी और हरिशंकर परसाई के लिखे पाठ को बाहर का रास्ता देखने पर मजबूर किया.
- आठवीं कक्षा की समाज विज्ञान की किताब में स्वतंत्रता आन्दोलन वाले पाठ से जवाहरलाल नेहरू का नाम गायब हुआ.
- पांचवीं की किताब में ‘गौमाता’ की अपने बच्चों को लिखी चिठ्ठी शामिल की गई है.
- अब से ‘महान’ शब्द अकबर के साथ नहीं जोड़ा जाएगा, महाराणा प्रताप के नाम के साथ जोड़ा जाएगा.
ये बदलाव किसी राज्य में कोई पहली बार नहीं हुए. पहले भी होते रहे हैं. वैसी अच्छी रचनाएं हटाई जाती रही हैं, जो सरकारी तंत्र से आंख मिलाने की ताकत और उनकी खामियों को पकड़ने की समझ पैदा करती हों. याद करें अभी कुछ अर्सा पहले कुछ दलित सांसदों के दबाव और बाद में लगभग पूरी संसद के शोर में एनसीईआरटी की राजनीति विज्ञान की ग्यारहवीं की किताब हटा लेने की त्वरित घोषणा हुई थी. इस शोर में संसद ने अपने ही कई वरिष्ठ सांसदों की आवाज नहीं सुनी जो याद दिला रहे थे कि सहिष्णुता भी एक मूल्य है और किताब में प्रकाशित कार्टूनों को कहीं ज्यादा व्यापकता और गहराई से देखने की जरूरत है.

दरअसल एनसीईआरटी दुनियाभर में शिक्षा को लेकर बदलते रवैये के साथ अपनी किताबों को ढालने में लगी थी. उन्हें आधुनिक रूप दे रही थी. तब उसने ग्यारहवीं की राजनीति विज्ञान की किताब में व्यंग्य कार्टूनों का इस्तेमाल कर उसे रोचक और प्रासंगिक बनाया. इसमें शब्दों की एकरसता तोड़ती तस्वीरें थीं और ऐसे कार्टून जो राजनीति विज्ञान की सैद्धांतिकी के समानांतर उसकी व्यावहारिक और सच्ची समझ पैदा कर रहे थे. यह किताब इस नई और आधुनिक अवधारणा के बीच निकली थी कि शिक्षा ऐसी ठोस चीज नहीं है जिसे किसी किताब से उठाकर छात्रों में बांट दी जाए. वास्तविक शिक्षा लगातार विचार-विमर्श और प्रयोगों के बीच आकार लेती है, वरना रटा हुआ ज्ञान परीक्षा में एक उपयोगितावादी भूमिका निभाने के बाद खत्म हो जाता है. इसी रटे हुए ज्ञान की मार्फत हमने प्रशासक, प्रबंधक, वैज्ञानिक, नेता सब पैदा किए, लेकिन वह प्रयोगशील, साहसी और अंतर्दृष्टि से भरा मनुष्य नहीं बना पाए जो प्रशासन, विज्ञान और राजनीति को नए मूल्य, नई चेतना और नए आविष्कार का सुख देता. कांग्रेसी नेताओं ने देख लिया था कि किताब के ज्यादातर कार्टून तो उनके पुरखों पर हैं. इसलिए एक चतुर दांव खेलकर इसे कोर्स से हटा दिया गया. हमारी प्रजातांत्रिक चेतना को नए ढंग से गढ़ती यह किताब एक हल्ले के साथ प्रतिबंधित कर दी गई. इसे तैयार करने वाले पहले दलित विरोधी करार दिए गए और उसके बाद लोकतंत्र विरोधी, उन्हें खलनायक की तरह प्रस्तुत किया गया, उनके विरुद्ध कार्रवाई की मांग की गई. किसी ने यह सोचना भी जरूरी नहीं समझा कि विधाओं के पाठ के अलग-अलग तरीके होते हैं. कविता अलग तरह से पढ़ी जाती है, निबंध अलग तरह से और कार्टून अलग तरह से. किसी ने यह भी नहीं देखा कि पूरी किताब में पाठ के समानांतर चलते करीब डेढ़ सौ कार्टून हैं जो जितना प्रहार अंबेडकर पर करते हैं, उससे कहीं ज्यादा नेहरू-गांधी परिवार पर.

ग्यारहवीं-बारहवीं के बच्चे 17-18 साल के होते हैं- यानी बालिग मतदाता होने की बिल्कुल दहलीज पर. क्या हम नहीं चाहते कि वे बालिग हों? कि वे जितना संसदीय राजनीति की अपरिहार्यता को समझें उतना ही उसके अंतर्विरोधों को, ताकि वे बेहतर नागरिक और संभव हो तो नेता भी बन सकें?

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First published: November 14, 2019, 11:54 AM IST
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