International Womens Day: किसान की ये बेटी विदेशी जमीन पर भी अपने खेल का दिखा चुकी है जौहर

महज 16 साल की उम्र में खुशबू सोनकर सीमित संसाधनों के बीच बॉल बैडमिंटन खेल में देश के विभिन्न राज्यों में खेलने के बाद भारतीय बॉल बैडमिंटन टीम से विदेशी जमीन नेपाल में भी अपने खेल का जौहर दिखा चुकी है.

Santosh Kumar Sahu | News18 Chhattisgarh
Updated: March 8, 2019, 1:02 PM IST
Santosh Kumar Sahu | News18 Chhattisgarh
Updated: March 8, 2019, 1:02 PM IST
छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के छोटे से गांव नेवारीकला में रहने वाले एक किसान परिवार की बेटी आज इस गांव के साथ-साथ प्रदेश और देश का नाम विदेशों में रोशन कर रही है. महज 16 साल की उम्र में खुशबू सोनकर सीमित संसाधनों के बीच बॉल बैडमिंटन खेल में देश के विभिन्न राज्यों में खेलने के बाद भारतीय बॉल बैडमिंटन टीम से विदेशी जमीन नेपाल में भी अपने खेल का जौहर दिखा चुकी है. बालोद जिले के नेवारीकला गांव में रहने वाली खुश्बू सोनकर के माता-पिता पेशे से किसान हैं. सिर्फ 1 एकड़ की जमीन पर धान और सब्जी की फसल उगाकर अपनी आजीविका चलाते हैं. वहीं बेटी के जज्बे ने आज उसके माता-पिता को भी गौरवान्वित किया है.

खुशबू सोनकर के साथ खेलने वाले सहयोगियों की मानें तो खुशबू अपने गांव से रोजाना 3 किलोमीटर साइकिल से टेकापार गांव खेल की प्रैक्टिस करने के लिए पहुंचती है. खुशबू समेत गांव में उसके साथ खेलने वाले इन खिलाड़ियों के परिवार की भी आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा सुदृढ़ नहीं है. इस कारण उन्हें आगे खेलने में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. खिलाड़ी खेल की सुविधाएं और बाहर खेलने जाने पर उनकी व्यवस्था को लेकर शासन से गुहार भी लगा चुके हैं, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई.



ऐसे में संसाधनों की कमी के बावजूद खुशबू अपने खेल और प्रतिभा के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर तक खेल चुकी है. खुशबू के साथी भी यहीं मान रहे हैं कि खुशबू के साथ-साथ वे भी अंतरराष्ट्रीय खेल चुके हैं. वहीं खुशबू का कहना है कि वो पिछले 3 वर्षों से खेल रही है और इन्हीं 3 वर्षों में इस खेल में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपना प्रदर्शन कर चुकी है. इस बीच आर्थिक दिक्कतें भी आईं, लेकिन साथियों ने चंदा इकट्ठा कर उसे आगे खेलने के लिए भेजा.

खुशबू के पिता कहना है कि उन्हें नहीं पता कि इस खेल को कैसे खेला जाता है, लेकिन बेटी के जज्बे के चलते वे अपने छोटे से किसानी और सब्जी व्यवसाय से थोड़ी बहुत मदद बेटी को कर देते हैं. आज  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के बावजूद सरकार द्वारा अब तक उन्हें किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली है. इसका भी मलाल इस पिता को है.

माता-पिता का कहना है कि खुशबू खेल के अलावा घर के हर काम में उनका हाथ बटाती है. साथ ही अपनी पढ़ाई के लिए भी समय निकाल लेती है. लगातार अपने हुनर के चलते आज अपने परिवार का नाम देश-विदेश में रोशन करने के चलते आज उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है.

बहरहाल, आज भले ही सरकार बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा दे रही है. बेटियों के नाम पर कई तरह की योजनाएं चलाने का दावा भी करती है, लेकिन देश में आज कई खुशबू हैं जो सरकारी मदद से नहीं बल्कि अपने जज्बे से समाज में खुशबू बिखेर रही हैं.

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