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इस सड़क को बनने से रोकते रहे नक्सली, 8 जवान भी हुए शहीद

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में जिन रास्तों पर कभी नक्सलियों के खौफ से लोग दिन के उजाले में भी गुजरने से परहेज करते थे, आज वो रास्ते लोगों की आवाजाही से गुलजार हैं. बात 8 किलोमीटर की उस सड़क की हो रही है, जिसके निर्माण में अब तक 8 जवान शहीद हो चुके हैं.

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छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में जिन रास्तों पर कभी नक्सलियों के खौफ से लोग दिन के उजाले में भी गुजरने से परहेज करते थे, आज वो रास्ते लोगों की आवाजाही से गुलजार हो रहे हैं. यहां हम बात कर रहे हैं 8 किलोमीटर की उस सड़क की, जिसके निर्माण में अब तक 8 जवान शहीद हो चुके हैं. इस सड़क के निर्माण के दौरान नक्सली बार-बार अवरोध उत्पन्न करते रहे और कई दफा अर्धसैनिक बलों से आमना-सामना भी हुआ, लेकिन अब बस्तर रीजन के इस इलाके में हालात बदल रहे हैं.

किरन्दुल से पालनार तक पुलिस जवानों की सुरक्षा में बन रही सड़क का निर्माण चोलनार कैम्प तक पूरा हो चुका है. सड़क को पूरा करने और नक्सली वारदातों को रोकने के लिए सीआरपीफ कैम्प की स्थापना भी चोलनार में की गई है. एडिशनल एसपी नक्सल ऑपरेशन गोरखनाथ बघेल बताते हैं कि नक्सली इस सड़क के निर्माण का हमेशा से विरोध करते रहे, जिससे आस-पास के गांवों में उनका दबदबा बना रहे.

यही वजह रही कि कई दफा नक्सलियों ने इस सड़क का निर्माण कार्य भी बंद करवा दिया. एक समय में इस सड़क का निर्माण ही संदेह में आ गया था. हालात इस कदर तनावग्रस्त हो गए थे कि नक्सली निर्माण में लगे वाहनों को फूंक जाते थे और निर्माण में लगे मजदूरों को धमकाते थे, लेकिन बावजूद इसके जवानों की निगरानी में न केवल इस सड़क का निर्माण हुआ, बल्कि इस पर अब आवाजाही भी शुरू हो गयी है.

नक्सलियों का खौफ भी ख़त्म

सड़क के बनने से इस इलाके के ग्रामीणों को भी राहत मिली है. ग्रामीण अब अपने कृषि उत्पादों को सीधे बाजार में लाकर बेचते हैं. पालनार से किरन्दुल के बीच के गांवों में नक्सलियों का खौफ भी ख़त्म हो रहा है. सड़क के निर्माण से इलाके की स्वास्थ्य सेवाओं के दुरुस्त होने के भी विकल्प बढ़ गए हैं.

स्थानीय जनप्रतिनिधि लाला राम कुंजाम का कहना है कि पहले बीमार को किरन्दुल अस्पताल तक लाने के लिए ग्रामीण वाहन की आवाजाही न होने के चलते चारपाई पर ढोकर लाते थे, जबकि अब एम्बुलेंस सीधे गांवों तक पहुँच जा रही है. यातायात के साधनों में भी सड़क निर्माण से बढ़ोतरी हुई है.

ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि जिन रास्तों पर कभी नक्सलियों का एकाधिकार था और बंदूकों की गड़गड़ाहट आम बात थी, वहां अब विकास की नई इबारत लिखी जा रही है. अब देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन इस सड़क को कितनी जल्दी पूर्ण करता है.

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