Exclusive: जो थे कभी ‘लाल आतंक’ के नुमाइंदे, अब कर रहे हैं लोकतंत्र की पैरवी
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Exclusive: जो थे कभी ‘लाल आतंक’ के नुमाइंदे, अब कर रहे हैं लोकतंत्र की पैरवी
सरेंडर कर समाज की मुख्य धारा में शामिल हो चुके पूर्व नक्सली.

मैंने नक्सलियों का साथ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वहां मुझे कुछ नहीं मिल रहा था, ना पैसा ना कोड़ी. मैंने देखा कि हम नक्सली गरीब जनता को ही लूटकर खा रहे थे.

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छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. राज्य में पहले चरण के लिए 12 नवंबर को मतदान होगा. पहले चरण में 18 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे. ये सीटें नक्सल प्रभावित सीटें मानी जाती हैं. इसमें बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा और राजनांदगांव शामिल हैं. इनमें बस्तर की गिनती देश के सबसे बड़े नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में होती है, इसलिए इस चुनाव पर सबकी नजरें टिकी हुईं हैं. इस बीच न्यूज18 हिंदी की टीम बस्तर पुनर्वास भवन पहुंची, जहां सरेंडर कर समाज की मुख्य धारा में शामिल हो चुके पूर्व नक्सली रहते हैं. पुनर्वास भवन में न्यूज18 हिंदी की टीम ने उन लोगों से बात की जिन्होंने ‘लाल आतंक’ का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्य धारा और लोकतंत्र का रास्ता अपना लिया है.

दिनेश खडतीश (पूर्व नक्सली)

सवाल- आपने नक्सल आंदोलन कब जॉइन किया था और क्यों?
जवाब- मैं 2006 में नक्सल आंदोलन में गया था. यहां पर नक्सली आते थे और मीटिंग करते थे. नक्सली कहते थे कि अगर आपको अपना जल, जंगल और जमीन बचानी है तो आंदोलन में शामिल हों. यही बातें सुनकर मैंने नक्सल आंदोलन को जॉइन किया था.



सवाल- नक्सलियों के आंदोलन को जॉइन करने के बाद आपने क्या किया?


जवाब- मेरा काम लोगों को इकट्ठा करके मीटिंग करना था. गांव-गांव में लोगों के पास जाकर उनसे कहते थे कि सरकार का कोई भी काम हमें नहीं करना है. हमें वोट नहीं डालना है, सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं लेना है. हमें अपने जमीन के अधिकार को छीनना है. सरकार हमें कुछ नहीं दे रही है. सरकार सिर्फ बोलती है लेकिन देती नहीं है. इसलिए सरकार जो योजना लाती है उसको हमें ध्वस्त करना है.

सवाल- आपने नक्सल आंदोलन क्यों छोड़ा?
जवाब- मैंने नक्सलियों का साथ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वहां मुझे कुछ नहीं मिल रहा था, ना पैसा ना कौड़ी. मैंने देखा कि हम लोग गरीब जनता को ही लूटकर खा रहे थे. गरीब जनता को कुछ नहीं मिल रहा था और हम लोग गरीब जनता से ही सभी चीजें लेते थे. ये सब देखकर मैंने सरेंडर कर दिया. अब सरकार हमारे लिए बहुत कुछ कर रही है.

सवाल- सरेंडर करने के बाद अब आप गांव में लोगों के बीच जाते हैं?
जवाब- हम अब गांव नहीं जाते हैं क्योंकि नक्सली मारेंगे. हम यहां सरकार के लिए काम कर रहे हैं.

सवाल- अगर कोई नक्सली मिला तो आप उससे क्या कहेंगे?
जवाब- हम उससे कहेंगे कि वो भी सरेंडर कर दे. सरकार सुविधाएं दे रही है, नौकरी- पैसा दे रही है. अगर सरेंडर नहीं करेगा तो हम लोग उसको मार डालेंगे.

मडकम देवा (पूर्व नक्सली, सुकमा जिला निवासी)
सवाल-
नक्सली कब बने?
जवाब- मैंने 2009 में नक्सल आंदोलन को जॉइन किया था. मैंने उनके लिए 6 साल काम किया. गांव में नक्सली आते थे नाच-गाना करते थे. उनको देखकर मैं उनके साथ हो गया. मैंने दक्षिणी बस्तर इलाके में काम किया.

सवाल- आपको कौन कहता था कि गांव में जाकर मीटिंग करो?
जवाब- हमारा लीडर जो डीवीसी होता था. पांच एरिया मिलाकर एक डिवीजन होता है. एक एरिया में एक डीवीसी मेंबर रहता है, एसीएम (एरिया कमिटी मेंबर) रहता है. एक एरिया को चलाने के लिए एक डीवीसी और एसीएम रहता है.

सवाल- जब आप नक्सली थे तब आपने गांव वालों को वोट डालने से रोका था?
जवाब- हां, 2013 में मैंने गांव वालों को वोट डालने से रोक दिया था. गांव वालों से कहते थे कि अगर कोई नेता आए तो भगा देना, वोट नहीं देना है.

सवाल- अब चुनाव फिर हो रहा है. अब आप गांव वालों को क्या बोलेंगे?
जवाब- अब तो हम लोगों को बोलते हैं कि वोट डालना है. अब हम नौकरी कर रहे हैं. पहले नक्सली थे तब गांववालों को वोट डालने से रोकते थे.

सवाल- आपको नक्सली की जिंदगी और अभी की जिंदगी में से कौन सी अच्छी लग रही है?
जवाब- अभी की जिंदगी बहुत अच्छी है. यहां आकर हमने सरेंडर किया है. अगर हम वहां रहते तो हमें क्या मिलता, ना घर मिलता ना पैसा. वहां मर जाते तो कोई पूछने वाला भी नहीं था. यहां हम अपने परिवार के साथ रहते हैं. अगर अब हमें कुछ हो जाएगा तो घरवालों को नौकरी तो मिल जाएगी. नक्सलियों से यही जिंदगी अच्छी है.

सुनीता (पूर्व नक्सली)
सवाल- सुनीता आप अपनी जिंदगी के बारे में बताई. आप नक्सली क्यों बनी?

जवाब- नक्सली लोग गांव में आकर मीटिंग करते थे. मीटिंग में नक्सली गांव के लोगों को समझाते अगर अपने बच्चों को हमारी पार्टी में शामिल करते हैं तो आपकी जमीन बच जाएगी. इसी तरह मुझे भी नक्सली गांव से ले गए और हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी. मैं 5 साल तक उनके साथ रही.

सवाल- नक्सली कैंपों में क्या-क्या होता है. आपने सरेंडर क्यों किया?
जवाब- हम लोग पार्टी के साथ घूमते और मीटिंग करते थे. इस दौरान हम हमले की रणनीति तैयार करते थे. मैं छुट्टी पर गांव आई थी, तभी पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया. मैंने भी यही सोचा कि जेल जाने से अच्छा है कि सरेंडर कर दूं, क्योंकि मैं भी अच्छी जिंदगी जीना चाहती थी.

सवाल- नक्सलियों के साथ जीवन और अब के जीवन में क्या फर्क है?
जवाब- ये जीवन मुझे काफी अच्छा लग रहा है, क्योंकि पहले जंगल-जंगल घूमते थे और कहीं भी पुलिस की गोली से मारे जा सकते थे. अब यहां आकर सुख-शांति से जीवन व्यतीत कर रही हूं. यहां खाना-पीना भी मिलता है और पैसे भी दिए जाते हैं.

सवाल- अगर पार्टी वाले आपको बुलाएंगे तो आप दोबारा वहां जाएंगी?
जवाब- मैं उस नर्क में दोबारा नहीं जाऊंगी, नक्सली सिर्फ लोगों को मारना सिखाते हैं, जिंदगी जीना नहीं. वैसे भी वे लोग अब मुझे दुश्मन मानते हैं.

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