• Home
  • »
  • News
  • »
  • chhattisgarh
  • »
  • छत्तीसगढ़: क्या महज सत्ता तक पहुंचने की 'सीढ़ी' बनकर रह गया है नक्सलवाद?

छत्तीसगढ़: क्या महज सत्ता तक पहुंचने की 'सीढ़ी' बनकर रह गया है नक्सलवाद?

मिली जानकारी के मुताबिक माओवादी 28 जुलाई से लेकर 3 अगस्त तक प्रदेश के माओवाद प्रभावित 14 जिलों में शहीदी सप्ताह मानएंगे.  (Demo pic)

मिली जानकारी के मुताबिक माओवादी 28 जुलाई से लेकर 3 अगस्त तक प्रदेश के माओवाद प्रभावित 14 जिलों में शहीदी सप्ताह मानएंगे. (Demo pic)

राजनीतिक दल से जुड़े हुए लोग इस बात को मान रहे है कि नक्लवाद खत्म हो सकता है बशर्ते राजनीतिक दल दृढ़ इच्छाशक्ति का हथियार इस्तेमाल करें.

  • Share this:
छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में तीन दशक से भी ज्यादा समय से पनपे नक्सलवाद के खात्मे के लिए यूं तो कांग्रेस से लेकर बीजेपी सहित वामपंथी दलों द्वारा लगातार कई दावे किए जाते रहे है. कोई दल गोली से तो कोई बोली से नक्सवाद को खत्म करने की पैरवी करता रहा है. लेकिन सत्ता संभालने के बाद हर दल की बोली ही बदल जाती है. यही वजह है कि नक्सलवाद आज भी जस की तस समस्या छत्तीसगढ़ में बनी हुई है. राजनीतिक दल से जुड़े हुए लोग हो या फिर सामाजिक रूप में काम करने वाले सभी इस बात को मान रहे है कि नक्लवाद खत्म हो सकता है बशर्ते राजनीतिक दल दृढ़ इच्छाशक्ति का हथियार इस्तेमाल करें.

किए जाते है ये दावे

माओवाद प्रभावित बस्तर से इक समस्या को खत्म करने के लिए कभी जनआंदेालन तो कभी राजनीतिक दलों की हुंकार जनता को ये भरोसा दिलाने का दावा करती रही है कि एक दिन आएगा जब बस्तर में बारूदी धमाकों की जगह ढोल और मादर के संगीत गूजेगें. लेकिन समय के साथ ये बाते सिर्फ बाते या फिर यूं कहे कि राजनीति दलों के आश्वसनों का महज एक पुलिंदा बनकर रह गया है. लाल आतंक को खत्म करने के लिए कभी सल्वा जुडम चला तो कभी सल्वा जुडूम पार्ट 2 के नाम से जनसंघर्ष का बिगुल बजाया गया. लेकिन माओवाद के खिलााफ बस्तर में ऐसे जितने भी आंदोलन हुए सब राजनीति की भेंट चढ़ गए. बस्तर के आदिवासी नेता दशरथ कश्यप मानते हैं कि बस्तर में माओवाद के खिलाफ चलाए गए आंदोलन की शुरूआत तो अच्छी थी लेकिन राजनीतिक जामा पहनने के बाद ये सारे आंदोलन खत्म हो गए.

समय देखकर बदल रही राजनीति

सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दलों द्वारा नक्सलवाद के खिलाफ एक्शन प्लान बनाने के बजाए नरम रुख अख्तियार करने के पीछे राजनीतिक दल और आदिवासी नेताओं का मानना है कि समय देखकर सुर बदलने के पीछे मकसद यही है कि राजनीतिक दलों में दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी है. यही वजह है कि सत्ता में आने के पहले राजनीतिक दलों की भाषा अलग होती है और सत्ता से बाहर रहने के दौरान कुछ अलग सुर होते है. आदिवासी नेता दशरथ कश्यप मानते है कि राजनीतिक दलों के लिए सत्ता हासिल करने में नक्सलवाद एक बहुत बड़े मुद्दे के रूप में सामने होता है, जिसका फायदा समय आने पर हर राजनीतिक दल उठाता है. यही वजह है कि नक्सलवाद जैसी समस्या का अब तक कोई हल नहीं निकल पाया.

ये भी पढ़ें:

VIDEO: छत्तीसगढ़ में मानसून को लेकर मौसम विभाग ने ये संभावना जताई है 

कांग्रेस सरकार ने बदला 10 साल पुराना राज्य स्लोगन, अब 'गढ़बो नवा छत्तीसगढ़' पर राजनीति शुरू 

खेत की रखवाली कर रहे बुजुर्ग को हाथियों ने कुचला, मौत 

धोखाधड़ी: कृषि मंत्री के इलाके में ही बिना लोन लिए 'कर्जदार' हो रहे किसान!

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स    

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज