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सलवा जुडूम में गांव छोड़ आए 950 परिवारों को नहीं मिल रहा पीने का साफ पानी

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जिला मुख्यालय में स्थित नगर पालिका के शांतिनगर वार्ड के 950 मकानों रहने वाले 7500 आदिवासियों की व्यथा से इस बात का अंदा ...अधिक पढ़ें

    छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में नक्सलवाद की मुखालफत के मकसद से सलवा जुडूम का प्रादुर्भाव के बाद मची हिंसा से सैंकड़ों गांव वीरान हुए थे. जुडूम का प्रभाव दक्षिण बस्तर के बीजापुर और सुकमा पर नजर आया था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद जुडूम पर प्रतिबन्ध तो लग गया मगर हिंसा प्रतिहिंसा के भंवर में उन हज़ारों आदिवासियों का भविष्य दांव पर लग गया जो नक्सलियों के भय से गांव, घर, जमीन से बेदखल होने विवश हुए थे.

    जिला मुख्यालय में स्थित नगर पालिका के शांतिनगर वार्ड के 950 मकानों रहने वाले 7500 आदिवासियों की व्यथा से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है जो सरकार और प्रशासन की बेरूखी के कारण 15 सालों से बसे जमीन पर मालिकाना हक, और पानी जैसी मूलभूत सुविधा के लिए तरस रहे है.

    2004 में माओवादियों के खिलाफ बिगुल फूंकते हुए कुछ ग्रामीणों ने स्वस्फूर्त आन्दोलन सलवा जुडूम शुरू किया था. 15 सालों बाद इस आन्दोलन के दुष्परिणाम आज भी जिले के कई इलाकों में आसानी से देखने को मिल जाएंगे. सलवा जुडूम के शुरू होते ही सैंकड़ों गांव वीरान हुए थे. लोग माओवादियों के खौफ से अपने गांव, घर, और ज़मीन छोड़ नजदीकी राहत शिविरों में शरणार्थियों की तरह रहने लगे थे.

    दूसरे गांवों से आने वाले लोगों को प्रशासन द्वारा बीजापुर जिला मुख्यालय में एक जगह पर बसाया गया था जिसे बाद में शांतिनगर वार्ड का नाम दिया गया. इस वार्ड में साकलेर, सागमेट्टा, पिल्लूर, कोंडापर्गु, गंगालूर, बासागुडा, फरसेगढ, तालापल्ली, पेनगुंडा, मिरतुर, और तुमनार, समेत 15 से अधिक गांव के लोग 2004 से छोटे-छोटे झोपड़ीनुमा मकानों में निवासरत हैं.

    पिछले 15 सालों में इस वार्ड की कुल आबादी करीब 7500 पहुंच चुकी है. इस वार्ड में निवासरत 950 परिवारों में से अधिकांश माओवादियों के सीधे निशाने पर है. अब ये वार्डवासी किसी भी सूरत-ए-हाल में अपने गांव वापस नहीं जा सकते. यदि ये अपने गांव चले भी गये तो वहां से सुरक्षित लौट आ पाना असंभव है. क्यूोकि, माओवादी इन्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे. ऐसे में बीजापुर में ही रहकर मजदूरी या छोटा मोटा व्यापार कर किसी तरह अपनी ज़िन्दगी गुज़ारने को मजबूर है.

    यहां के लोग15 सालों से शांतिनगर वार्ड में निवास करने के बावजूद प्रशासन ने किसी भी परिवार को अब तक आबादी पट्टा वितरित नहीं किया है. छोटे झोपड़ीनुमा मकानों में ये शरणार्थी पिछले 15 सालों से निवास कर रहे है. उस ज़मीन और उन मकानों में इनका मालिकाना हक भी नही है. ऐसे में ये लोग हमेशा चिंतित रहते है कि सरकार या प्रशासन इन्हें इस वार्ड से बेदखल करती है तो ये कहां जाएंगे.

    पिछले 15 सालों से वार्डवासी पानी जैसी मूलभूत ज़रूरत के लिए भी काफी ज़द्दोज़हद करते आए है. पानी के लिए इन्हें हर दिन डेढ़ से दो किमी का पैदल सफर तय करना होता है. दिन के 24 घंटे में से 4 से 5 घंटे पानी भरने में ही निकल जाता है. तब जाकर कहीं इन्हें थोडा बहुत पानी नसीब हो पाता है. दरअसल शान्ति नगर वार्ड चट्टान के उपर बसाया गया है.

    ये पूरा इलाका ड्राई ज़ोन में आता है. इस वजह से पानी का कोई स्त्रोत इस इलाके में नहीं है. पालिका द्वारा 7500 आबादी वाले इस वार्ड में हर दो दिन में एक बार पानी का टैंकर भेजवाया जाता है. वहीं 950 परिवारों के लिए पालिका द्वारा केवल 30 नल कनेक्शन लगाया गया है. इस वार्ड के लोगों की प्यास बुझाने के लिए 10 हैंडपंप लगाए गए मगर 2 ही अभी चालू स्थिति में हैं.

    पीएचई विभाग द्वारा 2 साल पहले 1 करोड़ की लागत से ओवर हेड टैंक का निर्माण करवाया गया और पूरे वार्ड में पाइप लाइन भी बिछाई गयी. मगर लापरवाही की इन्तहा देखिए निर्माण के 2 साल बाद भी पीएचई विभाग ने ओवर हेड टैंक और पाइप लाइन की टेस्टिंग कर नगर पालिका को अब तक हैण्ड ओवर नहीं किया है. नतीजतन शांतिनगर के वार्डवासियों की प्यास बुझाने के लिए 1 करोड़ की लागत का ये ओवर हैड टैंक महज़ झुनझुना ही साबित हो रहा.

    बता दें कि नगर पालिका को ओ डी एफ का दर्ज़ा मिला है. मगर इस वार्ड के 90 फीसद लोग खुले में शौच जाने को मजबूर है. 950 घरों में से केवल 306 मकानों के लिए शौचालय बनाए गए है. नगर पालिका सीएमओ पवन कुमार मेरिया का कहना है कि शांतिनगर वार्ड सारी मूलभूत सुविधाएं मौजूद है और निर्माण कार्य भी करवाए गए है. वहीं पूरे वार्ड में केवल एक ही सीसी सड़क 5 साल पहले बनायी गयी थी जो कि अब ज़र्जर हो चली है.

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    Tags: Bijapur district, Bijapur news, Chhattisgarh news

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