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लोकसभा चुनाव में बस्तर से ग्राउंड रिपोर्ट: 'आजाद देश में आज भी गुलाम हैं आदिवासी'
Bastar News in Hindi

Mukesh Chandrakar | News18 Chhattisgarh
Updated: April 9, 2019, 4:12 PM IST
लोकसभा चुनाव में बस्तर से ग्राउंड रिपोर्ट: 'आजाद देश में आज भी गुलाम हैं आदिवासी'
बीजापुर के घोर नक्सल प्रभावित गांव की तस्वीर.

चुनावी सरगर्मी से निकलकर बीहड़ में प्रवेश करते ही एक अजीब सी खामोशी मन में घर करने के बाद वो तस्वीर बाहर आई, जिसमें आदिवासियों का एक बड़ा तबका लोकतंत्र का विरोध करने मजबूर नजर आ रहा था.

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आज़ादी के 7 दशक बाद भी देश में ऐसे इलाके हैं, जो आज भी लोकतंत्र के मायनों से अछूते हैं. 11 अप्रैल को लोकतंत्र के महापर्व यानी लोकसभा चुनाव के तहत छत्तीसगढ़ के बस्तर में पहले चरण में मतदान होना है. मगर इसी बस्तर में लोकतंत्र के मायने बीहड़ में दाखिल करते ही किस तरह बदल जाते हैं. इसका ताजा उदाहरण बस्तर संभाग के घोर नक्सल प्रभावित जिला बीजापुर का एक गांव है. 80 के दशक में तात्कालीन आंध्रप्रदेश के रास्ते जब नक्सलवाद बीजापुर आया तो किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि आगे यह इस कदर नासूर बन जाएगा कि, लोकतंत्र के लिए लालतंत्र एक बड़ी चुनौती बनेगी.

ठीक 2 दिनों यानी कि 48 घंटे के इस सफर में करीब 200 किलोमीटर की यात्रा तय करते हम दुर्गम रास्ते पहाड़ियां, जंगल से होकर उस इलाके में जा पहुंचे जहां नक्सलियों की तूती बोलती है. चुनावी सरगर्मी से निकलकर बीहड़ में प्रवेश करते ही एक अजीब सी खामोशी मन में घर करने के बाद वो तस्वीर बाहर आई, जिसमें आदिवासियों का ही एक बड़ा तबका लोकतंत्र का विरोध करने मजबूर नजर आ रहा था.

इस सफर की शुरुआत जिला मुख्यालय बीजापुर से हमने की. बीजापुर से होते हुए न्यूज़ 18 की टीम ने बासागुडा, पूसबाका, गगनपल्ली, कोंडापल्ली, दारेली, झारपल्ली, धर्माराम, कव्वरगट्टा समेत 2 दर्जन से अधिक गांवों का दौरा किया. कच्छी, पथरीली, पहाड़ी रास्तों से होते हुए हमारी टीम उन इलाकों में पहुंची जहां आपकी और हमारी चुनी हुयी सरकार नहीं बल्कि जनताना सरकार यानी कि नक्सलियों की हुकूमत चलती है.

यहां प्रवेश करने से पहले सावधान!

इस इलाके में नक्सलियों की इजाजत के बगैर दाखिला देना मतलब खुद की जान के साथ खिलवाड़ करने जैसा है. मगर लोकसभा चुनाव को लेकर नक्सलियों की हुकूमत में बस रहे हजारों बाशिंदों के मन कि बात जानने के लिए हमने ये चुनौती स्वीकार की और शुरू किया उस इलाके में चुनावी सफर जहां गणतंत्र नहीं बल्कि गनतंत्र चलता है.

बीजापुर के घोर नक्सल प्रभावित गांव में बैठक लेते नक्सली.


यहां कौन है सरकार?नक्सलियों के इस इलाके में दाखिल होते ही एक अजीब सा सन्नाटा जंगलों में पसरा मिला. सफर शुरू करने के अगले ही कुछ घंटों में जंगल खामोश और जिन्गूर की आवाज़ कानों में सुनाई पड़ रही थी. लेकिन, यहां जंगल की खामोशी के मायने कुछ और थे. हम बढ़ते चले जा रहे थे और पेड़ों पर लगी नक्सलियों की तख्तियां, पंपलेट बैनर हमें नजर आ रहे थे. इनमें किसी सरकारी विज्ञापन या योजनाओं का बखान नहीं था. एक ही नारा था. लाल सलाम जिंदाबाद. जनताना सरकार जिंदाबाद.

इस इलाके में बस रहे अधिकांश आदिवासी गोंडी भाषी हैं. कुछ ही हिंदी समझ और बोल पाते हैं. जो हिन्दी समझ और और बोल भी पाते हैं वो कैमरे के सामने बोलने से कतरा रहे थे. लम्बे सफर और बड़ी मसक्कत के बाद हमारी मुलाकत धर्माराम गांव के 50 वर्षीय नागेश से हुई, जो हिंदी बोल और समझ पाते थे. नागेश कहते हैं कि भले ही देश आजाद हो गया होगा, लेकिन हम आज भी नक्सलियों के गुलाम हैं. इस इलाके के लोगों ने आज तक कभी भी चुनाव में हिस्सा नहीं लिया और न ही वे लेना चाहते हैं. क्योंकि हम वोट करें तो किसे करें. क्योंकि हमारे लिए कोई कुछ नहीं करता. आदिवासी सालों पहले जैसे थे, वैसे आज भी हैं.

बीजापुर के घोर नक्सल प्रभावित कोंडापल्ली गांव में चुनाव बहिष्कार का फरमान देते नक्सली.


चुनाव में हिस्सा लेने से रोकता कौन है?
इस ग्रामीण ने हमे जो कुछ बताया वो बेहद ही तकलीफ पहुंचाने वाला था. साथ ही हमें यह सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी था कि क्या हमें सच में आज़ादी मिल चुकी है? खैर हमनें सफर यहीं ख़त्म नहीं किया. कोशिश करते रहे कि हमें कुछ और ऐसे मिल जाएं जो कैमरे के सामने कुछ बोल पाएं. आखिरकार हमारी मुलाक़ात एक गांव के कुछ साक्षर युवाओं से हुई. डरे सहमे इन युवाओं ने हमें नाम तो नहीं बताया, लेकिन ये जरूर कहा कि उन्होंने आज तक कभी चुनाव में वोट नही कियें हैं. इतना ही नहीं वे कभी वोट करना भी नहीं चाहते. क्योंकि उनकी (नक्सलियों की) इजाजत नहीं होती.

बीजापुर के एक गांव के बच्चे. फाइल फोटो.


नक्सलियों से सामना
इस सफर में बहुत से ऐसे लोग भी मिले जिन्हें सिर्फ तेलुगु या गोंडी ही आती थी. 35 वर्षीय एक महिला ने हमें तेलुगु में बताया कि उन्होंने नक्सलियों के खौफ के कारण कभी भी वोट ही नहीं किया. हम सफर में लगातार बढ़ ही रहे थे कि कोंडापल्ली गांव में कुछ ग्रामीणों ने हमें रोक लिया. करीब 1 घंटे की पूछताछ के बाद जब उन्हें यकीं हुआ कि हम कोई और नहीं बल्कि पत्रकार ही हैं. तब उन्होंने हमें कुछ देर उसी जगह पर रोके रखा और फिर करीब 2 घंटे बाद हमें उस जगह पर ले जाया गया. जहां नक्सली ग्रामीणों की बैठक ले रहे थे.

कोंडापल्ली गांव में नुक्कड़-नाटक.


बैठक और ग्रामीण वेशभूषा में आये नक्सलियों के इस कार्यक्रम को देख हमें इस मांजरे को समझने में ज्यादा वक़्त नहीं लगा कि नक्सली इस जगह पर लोक सभा चुनाव के बहिष्कार के लिए इस कार्यक्रम को आयोजित करवाए हैं. हमें इस कार्यक्रम को फिल्माने की इजाजत तो मिली मगर कार्यक्रम में शामिल होने आए ग्रामीणों से बात करने से मना कर दिया गया. नक्सली इस कार्यक्रम में नाच, गाने और नाटक के माध्यम से ग्रामीणों से लोक सभा चुनाव के बहिष्कार करने का फरमान जारी कर रहे थे. हमें इस बात को समझने में देरी नहीं हुई कि इस इलाके के बाशिंदों में नक्सलियों को लेकर इतना खौफ क्यों है?
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First published: April 9, 2019, 4:12 PM IST
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