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'नक्सलगढ़' में ऐसा स्कूल, जहां भविष्य ही नहीं जान भी खतरे में डालकर पढ़ाई करते हैं बच्चे

बीजापुर के उसूर में सर्व शिक्षा अभियान के तहत राजीव गांधी शिक्षा मिशन द्वारा संचालित बालक रेसीडेंसीयल स्कूल में घोर लापरवाही का मामला सामने आया है.

बीजापुर के उसूर में सर्व शिक्षा अभियान के तहत राजीव गांधी शिक्षा मिशन द्वारा संचालित बालक रेसीडेंसीयल स्कूल में घोर लापरवाही का मामला सामने आया है.

बीजापुर (Bijapur) के उसूर में सर्व शिक्षा अभियान के तहत राजीव गांधी शिक्षा मिशन द्वारा संचालित बालक रेसीडेंसीयल स्कूल म ...अधिक पढ़ें

    बीजापुर: छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) का नक्सलगढ़ कहे जाने वाले बीजापुर (Bijapur) के उसूर में सर्व शिक्षा अभियान के तहत राजीव गांधी शिक्षा मिशन (Rajiv Gandhi Education Mission) द्वारा संचालित बालक रेसीडेंसीयल स्कूल में घोर लापरवाही का मामला सामने आया है. यहां पढ़ाई कर रहे सैकड़ों आदिवासी मासूम बच्चों का भविष्य और जान, अधिकारियों की लापरवाही, अनदेखी और कमीशनखोरी की वजह से खतरे में है. केन्द्र सरकार द्वारा करोडों रुपये खर्च कर सूबे के नक्सल प्रभावित जिलों में राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत बालक और बालिका रेसीडेंसीयल स्कूल यानी की पोटा केबिन की नींव रखी गयी थी, जिनकी हालत अब बेहद खराब हो चुकी है. इतनी खराब की यहां अध्ययनरत बच्चों का न केवल भविष्य खतरे में है. बल्कि इन मासूम आदिवासी छात्रों की जान भी खतरे में है.

    सन 2004-05 में सलवा जुडूम (Salawa Judum) के प्रादूर्भाव के साथ ही नक्सलियों ने जिले के अंदरुनी इलाकों में संचालित स्कूल-आश्रम भवनों को ध्वस्त कर दिया. जिससे हजारों आदिवासी छात्र शिक्षा से वंचित हो गये. शिक्षा से वंचित होकर ये छात्र कहीं नक्सल (Naxal) पंथ से न जुड़ जायें इस डर से तत्कालीन मनमोहन सरकार ने ऐसे इलाकों में राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत रेसीडेंसीयल स्कूल बनाए गए. स्थापना के बाद से ही राजीव गांधी ​शिक्षा मिशन से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों पर भारी भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोप लगते रहे हैं. यही एक वजह है कि इस मिशन द्वारा संचालित पोटा केबिनों में अव्यवस्था का अंबार देखने को मिलता है.

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    सांकेतिक फोटो.


    तंग आ चुके हैं छात्र
    बीजापुर जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटा दूर उसूर में संचालित बालक रेसीडेंसीयल स्कूल में बदहाली का आलम है. यहां जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही और इस पोटा केबिन के अधीक्षक की गैर जिम्मेदाराना रवैयये से ये छात्र अब तंग आ चुके हैं. अर्जुन ओयम व नवीन का कहना है कि इन्हें मेन्यू चार्ट के मुताबिक पौष्टिक आहार नहीं दिया जाता. सप्ताह में सिर्फ एक बार रविवार को इन्हे नाश्ता दिया जाता. वो भी स्वादहीन. इतना ही नहीं दाल और सब्जी का स्वाद भी इतना खराब होता है कि हलक से नीचे नहीं उतरता.

    हर साल 35 लाख का राशन
    बता दें कि इन बच्चों के राशन के लिए केन्द्र सरकार हर साल करीब 35 लाख रुपये खर्च करती है. अब सवाल यह है कि ये 35 लाख रुपये जाते कहां है? ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि कहीं अधीक्षक इन बच्चों के थाली में डाका डालकर अपनी तिजोरी तो नहीं भर रहा? यहां पढ़ने वाले एक छात्र ने बताया कि भोजन कभी भी गुणवक्ता युक्त नहीं मिलता. इसकी शिकायत भी कई बार की जा चुकी है, लेकिन व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ.

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    स्कूल में पढ़ाई करने वाले छात्र.


    खेतो में करवाते हैं मजदूरी
    अपने पड़ताल के दौरान न्यूज 18 की टीम को ऐसे भी छात्र मिले, जिनसे उसूर में संचालित पोटा केबिन में पदस्थ कर्मचारी अपने खेतों में मजदूरी भी करवाते हैं. यहां अध्ययनरत 8 नाबालिग आदिवासी छात्रों ने हमें बताया कि अगस्त के महीने में इस पोटा केबिन में पदस्थ अजय झाड़ी नाम के अनुदेशक द्वारा इन्हें जबरदस्ती अपने खेत में धान का रोपा लगवाने ले जाया गया था. ये और बात है कि दिन भर की मजदूरी की एवज में इन नाबालिगों को 100-100 रुपये की मजदूरी भी दी गई.

    शौचालय है, लेकिन उपयोग नहीं
    इस पोटाकेबिन में अध्ययनरत छात्रों के लिए सबसे ज्यादा दुखद पहलू यह है कि इनके लिए परिसर के अंदर ही करीब 25 लाख रुपये की लागत से शौचालय का निर्माण करवाया गया है, मगर अनदेखी और लापरवाही की वजह से लाखों रुपये खर्च कर निर्माण करवाया गया यह शौचालय झुनझुना ही साबित हो रहा. हास्यास्पद पहलू यह है कि बिन इस्तेमाल किये ही निर्माण के बाद से शौचालय का दो बार मरम्मत कार्य भी हो चुका है. मजबूरी में ये छात्र जंगली जानवरों के अलावा सांप बिच्छू के काटने के डर के बावजूद जंगल में नाले के किनारे शौच करने को मजबूर हैं. स्कूल के अधीक्षक बाइरंडम झाडी बच्चों के आरोप से इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि कुछ कमियां जरूर हैं, लेकिन बच्चों से मजदूरी नहीं कराई जाती.

    अब तक शुरू नहीं हो सकी पढ़ाई
    छात्र अजीत माडवी, सन्तोष, जीतू सहित अन्य का कहना है कि शिक्षा सत्र शुरू हुये तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन यहां संचालित हो रही अधिकांश कक्षाओं में कई विषयों की पढ़ाई अब तक शुरू नहीं हो पाई है. इस आवासीय स्कूल में पहली से कक्षा आठवीें तक के बच्चे अध्ययनरत हैं. छात्रों ने बताया कि यहां संचालित हो रहे 8 कक्षाओें में 15 विषयों की पढाई अब तक शुरू नहीं हो पाई है.

    कलेक्टर होते हैं संचालक
    राजीव गांधी शिक्षा मिशन के मिशन संचालक जिले के कलेक्टर खुद होते हैं. ऐसे में यहां फैली अव्यवस्थाओं का जिम्मदार भी कलेक्टर ही होगा. हमने इस पूरे मामले में कलेक्टर का पक्ष लेना चाहा, जिले के कलेक्टर केडी कुंजाम ने हमें बताया कि इस मामले कि जानकारी उन्हें है और बहुत जल्द वो इस समस्या का निराकरण करेंगे.

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    Tags: Bijapur news, Chhattisgarh news, Government primary schools

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