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'नक्सलगढ़' के इन स्कूलों में रोज बगैर पुल के नदी-नाले पार कर पहुंचते हैं ये शिक्षक

नक्सल प्रभावित क्षेत्र के 11 स्कूलों के दो दर्जनभर से अधिक शिक्षक-शिक्षिकाओं ने बच्चों की पढ़ाई प्रभावित ना हो, इसलिए उ ...अधिक पढ़ें

    छत्तीसगढ़ का नक्सल प्रभावित जिला बीजापुर मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर दूर और नेशनल हाईवे से करीब तीन किलोमीटर दूर से ही नक्सलियों की समानांतर सरकार शुरू हो जाती है. यहां स्कूल तो है, मगर पहुंचने के लिए सड़क नहीं. नदी-नालों पर पुल-पुलिए नहीं हैं. दो नाले, एक उफनती नदी, कीचड़ से सना  जंगली रास्ता, तमाम मुश्किलातों और विपरीत परिस्तिथियों के बावजूद इस इलाके में संचालित 11 स्कूल के 25 शिक्षक हर दिन स्कूल पहुंचकर पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं.

    करीब तीन माह पहले बीजापुर के चिंगार बहार नाले पर पुल निर्माण के विरोध में नक्सलियों ने वाहनों में आगजनी और हत्या की घटना को अंजाम दिया था. उसके बाद पुल का काम रूक गया. करीब 15 से 20 मीटर चौड़ा यह बरसाती नाला हाल के दिनों में मूसलाधार बारिश के चलते उफान पर था, तब पेद्दाकवाली, चिन्नाकवाली स्थित स्कूल और आश्रमों में तालाबंदी के पूरे आसार थे, जो नहीं हुआ. इन्हीं स्कूल और आश्रम में पदस्थ शिक्षकों के जज्बे और जिद के आगे परिस्थितियों ने घुटने टेक दिए.

    झमाझम बारिश के बीच चिन्नाकवाली, पेद्दाकवाली, कांदुलनार, रालापाल और आदेड के 11 स्कूलों के दो दर्जनभर से अधिक शिक्षक-शिक्षिकाओं ने बच्चों की पढ़ाई प्रभावित ना हो, इसलिए उफनते नाले पर रपटा तैयार करने का फैसला किया. हालांकि यह कार्य काफी चुनौतीपूर्ण था. फिर भी वे प्रशासन से मदद की अपेक्षा ना रखते हुए खुद मैदान में उतरे. सैकड़ों बोरियों में रेत भरी और कमर से ऊपर बह रहे पानी में भी देखते ही देखते रपटा तैयार कर लिया. परेशानी यहीं हल नहीं हुई. बारिश तेज होती तो नाला और भी उफनता. रेत भरी बोरियां बह जाती. बावजूद इसके शिक्षकों की जिद आगे भी बरकरार रही.

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    नदी में रेत की बोरी से रपटा बनाते शिक्षक. फोटो क्रेडिट: रंजन दास.


    मुश्किल परिस्थितियों पर जीत हासिल कर शिक्षक बाढ़ के बीच भी बीते डेढ़ महीने तक स्कूल पहुंचते रहे.
    शिक्षकों की जिद का सिलसिला यहीं नहीं थमा. चिंगार बहार नाले के आगे चिंतावागु नदी भी पड़ती है. हालांकि गहरी नदी पर रपटा तैयार करना मुमकिन नहीं है. बावजूद इसके सिर से उपर बहते पानी में भी कई दफा हिम्मत से आगे बढ़े. शिक्षकों के इस हौसले ने बच्चों के साथ ही गांव वालों का भी दिल जीत लिया. शिक्षकों के प्रयास और पढ़ाने के जज्बे से प्रभावित होकर गांव वालों ने भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने में कोताही नहीं बरती, जिसके चलते बीते महीने अंदरूनी इलाकों में संचालित इन स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बनी रही.

    पुल निर्माण से खफा थे नक्सली
    पेद्दाकवाली, चिन्नाकवाली, आदेड, रालापाल और कान्दुलनार गांव जिला मुख्यालय से करीब 15 से 20 किमी दूर बसे हैं. नेशनल हाईवे 63 से चिन्नाकोडेपाल मार्ग पर आगे बढ़ते हुए पड़ाव में ये गांव आते हैं. यह समूचा इलाका नक्सलियों के प्रभाव में है. तीन माह पूर्व चिंगार बहार नाले के समीप दिन दहाड़े नक्सलियों ने वाहनों में आगजनी के अलावा पुल का निर्माण कार्य कर रहे ठेकेदार के मुंशी की हत्या भी कर दी थी. इसी नाले पर पुल का काम चल रहा था और नक्सली इस बात से खफा थे.

    नदी किनारे ही गुजारी रात
    शिक्षक एसके अल्लूर बताते हैं कि उनके साथ ऐसा कई दफे हुआ, जब पानी थोड़ा कम रहा और वे नदी को पार कर स्कूल पहुंच तो गए, लेकिन वापसी में अचानक पानी बढ़ा हुआ मिला. मजबूरी में पूरी रात नदी किनारे बैठकर पानी उतरने का इंतजार करना पड़ा. ये सब देख बच्चे भी प्रभावित हैं. छात्रों ने बताया कि वे न सिर्फ शिक्षकों का दिल से सम्मान करते हैं. बल्कि शिक्षकों के हौसले और जज्बे को जीवन का आदर्श मानकर चल रहे हैं.

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    बच्चों के साथ नदी पार कर स्कूल जाते शिक्षक. फोटो क्रेडिट: रंजन दास.


    बच्चों से लगाव
    घटना के बाद काम रूक गया. नतीजतन शिक्षकों के सामने स्कूल पहुंचने की बड़ी चुनौती थी. सम्मैया गुरला, उर्मिला लाकड़ा सहित अन्य शिक्षक बताते हैं कि बच्चों से लगाव उन्हें चुनौती को पार करने का हौसला देता है. कई दफा पानी कमर के उपर होता है, फिर भी तमाम मुश्किलों को पार करते हुए जैसे-तैसे स्कूल पहुंचते हैं. ताकि बच्चों की पढ़ाई किसी भी तरह प्रभावित ना हो. शिक्षकों ने बताया कि बारिश के वक्त पहाड़ी नाले में बहाव काफी तेज होता है. उस दौरान नदी, नाले को पार करना जोखिम भरा होता है. ऐसा कई बार हुआ कि नाले को पार करते वक्त बहाव में कई शिक्षक बहते-बहते बचे. बच्चे भी मुश्किलों का सामना कर ही स्कूल पहुंचते हैं.

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    Tags: Bijapur news, Chhattisgarh news, Teacher on Strike

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