डॉ. पुष्पा दीक्षित: 78 की उम्र में भी जारी है संस्कृत बचाने की मुहिम, गणितीय विधि में तैयार किया संस्कृत का फार्मूला
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डॉ. पुष्पा दीक्षित: 78 की उम्र में भी जारी है संस्कृत बचाने की मुहिम, गणितीय विधि में तैयार किया संस्कृत का फार्मूला
डॉ. पुष्पा दीक्षित.

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बिलासपुर (Bilaspur) की रहने वाली डॉ. पुष्पा दीक्षित की खासियत है कि संस्कृत के जिस व्याकरण को समझने के लिए लोग वर्षों रिसर्च करते हैं, उसे वो 10 से 12 महीने में ही आसानी से सीखा देती हैं.

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बिलासपुर. 'अगर आप से कोई पूछे कि भारत के पास अपना ऐसा क्या है, जो सिर्फ भारत का है? टेक्नोलॉजी, मेडिकल सांइस, आर्ट सबकुछ तो विश्व के हर देश में हैं. फिर हमारा अपना क्या है...? हमारे पास अपना कुछ है तो सिर्फ शास्त्र, वेद, संस्कृति और संस्कृत...लेकिन दु:ख होता है कि इसकी चिंता करने वाले बिरले ही बचे हैं.' डॉ. पुष्पा दीक्षित ने बातचीत का सिलसिला शुरू होते ही सवाल दाग दिए. सवाल उसी अंदाज में जैसे स्कूल में कोई गुरुजी पूछता है और विद्यार्थियों के मौन रहने पर खुद ही जवाब दे देता है. 78 की उम्र में भी डॉ. पुष्पा में संस्कृत को लेकर जुनून और संस्कृत को बचाने चलाई जा रही उनकी मुहिम ही उन्हें दूसरों से अलग पहचान देती है.

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बिलासपुर (Bilaspur) की रहने वाली डॉ. पुष्पा दीक्षित की खासियत है कि संस्कृत के जिस व्याकरण को समझने के लिए लोग वर्षों रिसर्च करते हैं, उसे वो 10 से 12 महीने में ही आसानी से सीखा देती हैं. इसके लिए उन्होंने खुद ही एक नया सूत्र तैयार किया है.
न्यूज 18 से बातचीत में कहती हैं- 'संस्कृतस्य रक्षणेन राष्ट्ररक्षणम् (संस्कृत की रक्षा से राष्ट्र की रक्षा होती है).
लेकिन ऐसा लगता है कि संस्कृत के लिए रोने वालों में हम अकेले ही बचे हैं. संस्कृत से जुड़े लोग भी संस्कृत का साथ नहीं देते. स्कूलों में संस्कृत की सतही शिक्षा देकर खानापूर्ति की जा रही है. शिक्षक में समर्पण का भाव होना चाहिए, लेकिन वो तो नौकर की तरह पढ़ा रहे हैं. शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चौपट है. छत्तीसगढ़ में तो एक भी वेद स्कूल नहीं है'

संस्कृत के लिए क्यों खास हैं डॉ. पुष्पा
बिलासपुर के सरकारी कॉलेज में संस्कृत पढ़ाते हुए डॉ. पुष्पा दीक्षित ने पाणिनी, सिद्धांत कौमुदी और आर्य प्रणाली से संस्कृत व्याकरण को लेकर तीन दशकों तक शोध किया. इसके बाद उन्होंने सबसे प्रचलित व कठिन माने जाने वाले पाणिनीय व्याकरण को गणितीय विधि में सूत्रबद्ध किया. इसकी मदद से 3 से 4 महीने में ही लोग ठीक-ठीक संस्कृत को जान-समझ सकते हैं. 10 से 12 महीने में ही वो कोर्स पूरा कर देती हैं. इसके एवज में वो कोई शुल्क नहीं लेती हैं.



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संस्कृत का पाठ पढ़ाती डॉ पुष्पा दीक्षित.




यहां मुफ्त में शिक्षा और भोजन
बिलासपुर के गोंडपारा में ही डॉ. पुष्पा का निवास है. अपने निवास से ही वो साल 2001 से पाणिनी शोध संस्थान का संचालन कर रही हैं. गुरुकुल की तरह संस्कृत सीखने वाले उनके घर में ही रहते और संस्कृत सीखते हैं. यहां उन्हें मुफ्त में संस्कृत की शिक्षा दी जाती है और भोजन की व्यवस्था भी नि:शुल्क ही है. डॉ. पुष्पा बताती हैं कि अब तक 1 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों को वो संस्कृत में निपुण कर चुकी हैं. इस गुरुकुल में आपसी बोलचाल की भाषा भी संस्कृत ही है.

अमेरिका, चीन समेत विश्वभर आते हैं विद्यार्थी
डॉ. पुष्पा के गुरुकुल में संस्कृत सीखने सिर्फ भारतीय ही नहीं, बल्कि अमेरिका, चीन, बांग्लादेश समेत विश्व के कई देशों से विद्यार्थी आते हैं. इनमें क्रिश्चियन और मुस्लिम भी शामिल हैं. इनके गुरुकुल में आम दिनों में एक साथ 20 से 25 विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती. जबकि गर्मी की छुट्टियों में इनकी संख्या 60 से 80 हो जाती है. बिलासपुर के ही एक सरकारी कॉलेज से रिटायर डॉ. पुष्पा 20 साल से लगातार नि:शुल्क संस्कृत की शिक्षा दे रही हैं.

संस्कृत से क्या होगा?
वर्तमान दौर में युवा ऐसी शिक्षा लेना चाहते हैं, जिससे उन्हें बेहतर रोजगार मिल सके. ऐसे में संस्कृत की क्या उपयोगिता है? संस्कृत​ भाषा को लेकर 50 से अधिक किताबें लिख चुकीं डॉ. पुष्पा इसके जवाब में कहती हैं-
'सिर्फ रोजगार से क्या होगा? वर्तमान में बच्चों को असुरी शिक्षा दी जा रही है. लोग व्यभिचारी हो रहे हैं.
करप्शन चरम पर है. हर क्षेत्र में अपराध हो रहे हैं. ऐसी शिक्षा का क्या लाभ, जो मनुष्य को मनुष्य नहीं बनाती. संस्कृत से शास्त्र का ज्ञान मिलता है. शास्त्र कभी भी गलत करने की शिक्षा नहीं देता. संस्कृत की यही महानता है.'

तकनीक को किसने रोका है?
डॉ. पुष्पा अपने चीन के विद्यार्थी चाउ यन का जिक्र करते हुए कहती हैं- यन ने मुझे बताया कि उन लोग भी विश्व की सभी नई तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अपनी मूल भाषा के साथ कभी समझौता नहीं करते. नई तकनीकों चाइनिज में नामकरण किया जाता है. दूसरे देश भी ऐसा करते हैं. तकनीक को अपनाने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए, लेकिन अपनी मूल भाषा को छोड़कर नहीं.

..तो खर्च कैसे चलता है?
डॉ. पुष्पा बताती हैं कि पाणिनी शोध संस्थान के संचालन में उन्हें किसी तरह की सरकारी मदद नहीं मिलती. पेंशन और पूर्व के छात्रों द्वारा कुछ आर्थिक मदद मिल जाती है, जिससे खर्च चल जाता है. अमेरिका से संस्कृत सीखने आए प्रवासी भारतीय वरुण खन्ना व अमेरिकी नागरिक डॉ. स्वरूप इन दिनों 5 हजार से ज्यादा लोगों को इंटरनेट के माध्यम से उनकी बनाई विधि से संस्कृत पढ़ा रहे हैं. वहां से भी कुछ दान मिल जाता है. मेडिसिन में एमडी स्वरूप इन दिनों वेद और योग की शिक्षा दे रहे हैं. देश में जेएनयू, संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी समेत कई जगहों पर उनके पढ़ाए विद्यार्थी हैं.

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