न्याय की आस में सेल्स टैक्स कर्मचारी ने तोड़ा दम, 30 साल बाद कोर्ट ने सुनाया ये फैसला

Pankaj Gupte | News18 Chhattisgarh
Updated: August 19, 2019, 4:05 PM IST
न्याय की आस में सेल्स टैक्स कर्मचारी ने तोड़ा दम, 30 साल बाद कोर्ट ने सुनाया ये फैसला
कर्मचारी की मौत के बाद परिवार वालों को लड़ी कानूनी लड़ाई. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ सेलटैक्स कर्मचारी (Salestax Employee) ने कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी, जिसके बाद अब हाईकोर्ट(Highcourt) से इस केस (Case) पर फैसला (Decision) सुना दिया है.

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अनियमितता और गड़बड़ी के आरोप में बर्खास्त (Dismissed) किए गए सेल्स टैक्स कर्मचारी (Cell tax staff) सीएस ठाकुर को आखिरकार 30 सालों बाद हाईकोर्ट से न्याय मिला. पर इसे देखने के लिए वो अब इस दुनिया में नही है. मिली जानकारी के मुताबिक कर्मचारी सीएस ठाकुर की ड्यूटी उस टोल में लगाई गई थी जिससे व्यावसायिक वाहन (commercial vehicles) का आना-जाना होता था. फिर उन पर अनाधिकृत पेनाल्टी (Unauthorized Penalty) का आरोप लगाया गया. इस मामले की विभाग ने जांच कराई. जांच अधिकारी ने भी अपने रिपोर्ट में कार्रवाई की अनुशंसा की और उन्हे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ सेल्स टैक्स कर्मचारी (Salestax Employee) ने कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी, जिसके बाद अब हाईकोर्ट(Highcourt) से इस केस (Case) पर फैसला (Decision) सुना दिया है.

ये है पूरा मामला:

दरअसल, रायपुर (Raipur)के कुशालपुर निवासी सीएस ठाकुर अविभाजित मध्यप्रदेश के सेल्स टैक्स विभाग में निम्न वर्ग लिपिक थे. उनकी ड्यूटी एक टोल बेरियर पर लगाई गई थी, जहां से व्यावसायिक वहान माल लेकर गुजरते थे. 1986 में सीएस ठाकुर पर आरोप लगाया गया था कि वे कई वाहनों पर अनाधिकृत पेनाल्टी लगाकर सीधे बिना कार्रवाई(Action) किए गाड़ियों को जाने दे रहे थे. जब यs आरोप लगाया गया तब विभाग ने चार्जशीट के साथ जांच कराई थी. जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में उन्हें बर्खास्त करने की अनुशंसा कर दी और विभाग ने ठाकुर को 1989 में बर्खास्त कर दिया गया.

अपनी बर्खास्तगी को लेकर सीएस ठाकुर ने सचिव के समक्ष अपील की पर इसे खारिज कर दिया गया. इसके बाद स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में याचिका पेश हुई, जहां से मामले को हाईकोर्ट में भेज दिया गया. मामले में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत कर कोर्ट को बताया कि इस मामले में उच्च अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध है. यहां निम्न कर्मचारी को शिकार बनाया गया है. इस बीच याचिकाकर्ता की मौत हो गई फिर भी पत्नी और बेटे ने कानूनी लड़ाई जारी रखी. मामले में जून 2019 को सुनवाई के बाद कोर्ट ने पाया कि मृत कर्मचारी इस तरह से दंडित किए जाने के पात्र नहीं थे. इसके अलावा हाईकोर्ट ने मृत कर्मचारी के 1989 से अबतक के मिलने वाले लाभ को 90 दिनों के भीतर देने का भी आदेश दिया है.

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First published: August 19, 2019, 4:05 PM IST
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