कलेक्टर अजीत जोगी ने MP के जिस जिले में बांटी जमीन, उसी ने क्यों हराया चुनाव
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कलेक्टर अजीत जोगी ने MP के जिस जिले में बांटी जमीन, उसी ने क्यों हराया चुनाव
अजीत जोगी मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुत शहडोल जिले के कलेक्टर भी रहे.

अजीत जोगी (Ajit Jogi) 1976-78 के बीच मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुत शहडोल जिले के कलेक्टर रहे. उनकी छवि तेजरर्रार और सख्त कलेक्टर की थी. अजीत जोगी ने 1999 में शहडोल से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था.

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नई दिल्ली/शहडोल. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी (Ajit Jogi) ने शुक्रवार को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. उन्होंने 74 साल की उम्र में अंतिम सांस ली. आईएएस अफसर से राजनेता बने अजीत जोगी का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा. उम्र के आखिरी पड़ाव में उनकी सियासी चालें कमजोर पड़ने लगी थीं, लेकिन उनकी लोकप्रयिता अंत तक बरकरार रही. खासकर मध्य पदेश का शहडोल (Shahdol), जहां आदिवासियों का एक समूह उन्हें आज भी भगवान की तरह पूजता है.

अजीत जोगी का नाम आने पर वैसे तो सबसे पहले छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) की छवि ही उभरती है. ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि वह इस प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रहे. सभी जानते हैं कि अजीत जोगी राजनेता बनने से पहले आईएएस अफसर रहे.  इस दौरान उनका मध्य प्रदेश के शहडोल से खास रिश्ता रहा, जो अब जिले से संभाग बन चुका है. अजीत जोगी के इस रिश्ते का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह इस जिले के कलेक्टर भी रहे और उन्होंने यहां से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा.

भगवान का दर्जा देते हैं आदिवासी
अजीत जोगी 1976-78 के बीच मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल शहडोल जिले के कलेक्टर रहे. तब इस जिले में आज के उमरिया और अनूपपुर जिले भी शामिल थे. उनकी छवि बेहद तेजरर्रार और सख्त कलेक्टर की थी. वह लोगों की शिकायतों को तेजी से निपटाते थे. जिले से 10 किलोमीटर दूर एक गांव है ऐंताझर. यहां के कई लोग आज भी अजीत जोगी को भगवान का दर्जा देते हैं और कहते हैं कि एक कलेक्टर ने उनकी जिंदगी बदल दी.



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जानें- क्यों मिला इतना सम्मान
ऐंताझर के उप सरपंच अनूप सिंह बताते हैं, ‘यह 1977 की बात होगी. अजीत जोगी स्कूल के फंक्शन में आए थे. उन्हें महुए से बनी मौहरी खिलाई गई, जो उन्हें पसंद आई. उन्होंने पूछा कि यह किससे बनी है. लोगों ने बताया कि महुए से. इस पर जोगी ने कहा कि इसे खूब खाया करो. यह पौष्टिक भी है और मीठा भी. इस पर कुछ आदिवासी बोले कि उनके पास ना तो जमीन है और ना महुए के पेड़. इस पर अजीत जोगी ने वहीं पर घोषणा कर दी कि सरकारी जमीन पर जितने भी महुए के पेड़ हैं, उन्हें उन आदिवासियों के नाम कर दिया जाए, जिनके पास जमीन नहीं है. कुछ दिनों में ही कागजी कार्रवाई भी पूरी कर दी गई.’ अजीत जोगी ने जिले की कई सरकारी जमीनें भी उन आदिवासियों के नाम कर दी थीं, जो जंगलों के आसपास थीं और जिन पर खेती की जा सकती थी.

चुनाव में नहीं दिया जनता ने साथ
अजीत जोगी जब राजनीति में आ गए तो उन्होंने 1999 में कांग्रेस की ओर से शहडोल (Shahdol Constituency) से चुनाव भी लड़ा. उनके सामने भाजपा के दलपत सिंह परस्ते थे. एक साल पहले ही मध्य प्रदेश को बांटकर छत्तीसगढ़ बनाने का निर्णय हुआ था, जिसमें अजीत जोगी की अहम भूमिका थी. शहडोल की बड़ी आबादी छत्तीसगढ़ बनने से खुश नहीं थी. इसीलिए जब चुनाव हुए तो अजीत जोगी को ‘विदेशी’ की तरह ट्रीट किया गया. तब शहडोल में एक नारा चला था, 'देश में विदेशी और जिले में परदेसी' नहीं चलेगा. यह नारा काम कर गया और जोगी चुनाव हार गए. हालांकि, उनकी हार में बड़ी वजह कांग्रेस की फूट भी रही. जोगी से पहले इस सीट से दलबीर सिंह चुनाव लड़ते थे. वह नरसिंम्हा राव सरकार में वित्त राज्य मंत्री भी रह चुके थे. दलबीर गुट का असहयोग जोगी पर भारी पड़ गया था.

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लोगों से खुद जाकर मिलते थे 
शहडोल जिला कलेक्ट्रेट में करीब 10 कलेक्टरों के साथ काम कर चुके एक व्यक्ति कहते हैं, शहडोल में कई कलेक्टर आए और गए. लेकिन जो लोकप्रियता अजीत जोगी की रही, वह कोई और कलेक्टर हासिल नहीं कर सका. वह कहते हैं कि जोगी की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह यह थी कि वह लोगों से खुद जाकर मिलते थे और उनकी शिकायतें सुनते थे. वह शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई भी करते थे.

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