Exclusive: ‘नक्सलियों के डर की वजह से ‘सलवा जुडूम’ कैंप में रहना पड़ा’

2005 में नक्सलियों के डर की वजह से हमें अपना गांव छोड़ना पड़ा था. क्योंकि जब हम पढ़ने जाते थे तो नक्सली हमें डराते और मारते थे.

News18 Chhattisgarh
Updated: November 10, 2018, 3:01 PM IST
Exclusive: ‘नक्सलियों के डर की वजह से ‘सलवा जुडूम’ कैंप में रहना पड़ा’
आदिवासी युवक नारायण लिखाम
News18 Chhattisgarh
Updated: November 10, 2018, 3:01 PM IST
छत्तीसगढ़ में सभी राजनीतिक पार्टियां सड़क पर उतरकर सत्ता पाने की कोशिश में जुटी हुई हैं. राज्य में पहले चरण के लिए 12 नवंबर को मतदान होगा. पहले चरण में 18 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे. इस बीच न्यूज18 हिंदी की टीम दंतेवाड़ा के कसौली गांव पहुंची. जहां 2005 में बड़ी संख्या में आदिवासियों को नक्सलियों से बचाने के लिए ‘सलवा जुडूम’ कैंप में रखा गया था. यहां न्यूज़18 हिंदी के संवाददाता रवि दुबे ने एक ऐसे आदिवासी युवा से बात की. जिसके परिजनों को 4 जून 2005 नक्सलियों से लड़ने के लिए स्पेशल पुलिस आफिसर यानी एसपीओ का दर्जा देकर मैदान में उतारा गया था. इस युवा का नाम नारायण लिखाम है.

सवाल- नाराण आप यहां कब से और क्यों रह रहे हैं?
जवाब- मैं यहां 2005 से रह रहा हूं, नक्सलियों के डर की वजह से हमें अपना गांव छोड़ना पड़ा था. क्योंकि जब हम पढ़ने जाते थे तो नक्सली हमें डराते और कहते कि ज्यादा नहीं पढ़ना तुम्हे हमारे साथ आना है. वो लोग हमे मारने की रोज धमकियां दिया करते थे, यही वजह है कि गांव को छोड़कर कसौली में आकर ‘सलवा जुडूम’ कैंप में रहना पड़ा.

सवाल- पहले आपकी जिंदगी कैसी थी और अब यहां रहकर कैसी है?

जवाब- यहां पर हमें मजदूरी करनी पड़ती है. उस गांव में हमारी जमीन थी, जिसपर हम खेती करके अपनी जिंदगी बसर करते थे, लेकिन नक्सली उस फसल में हिस्सा मांगने आ जाते थे. और नहीं देने पर मार दिया जाता था. इसी डर की वजह सभी गांव वाले यहां शिविर कैंपों में आकर बस गए. यहां सरकार ने हमें घर बनाकर दिए और कुछ लोगों को पुलिस में नौकरी भी दी. बाकी लोग मजदूरी करके अपना पेट भरते हैं.

सवाल-  अब आप अपनी जिंदगी में क्या सुधार चाहते हैं?
जवाब- हम अपने गांव वापस जाना चाहते हैं, अगर सरकार हमे सुरक्षा मुहैया करा देती है तो हम अपने गांव में वापस चले जाएंगे और वहां अपनी जमीन पर खेती करेंगे.
Loading...
सवाल- इस गांव में कुल कितने लोग और घर हैं?
जवाब- इस विस्थापित गांव में एक हजार से ज्यादा लोग रहते है, करीब 160 घर हैं, जो सरकार ने शिफ्ट कराये थे. हम सभी लोग नक्सलियों के डर की वजह से कसौली गांव में आकर बस गए थे, अब हम सरकार से बस यही चाहते हैं कि हमें अपने गांव में वापस बसा दिया जाए, जिससे हम अपनी जमीन पर खेती कर सकें.

ये भी पढ़ें- 

Exclusive: ‘लोकतांत्रिक चुनाव तब होगा, जब आदिवासी खुशी से वोट डालेंगे’

Exclusive: जो थे कभी ‘लाल आतंक’ के नुमाइंदे, अब कर रहे हैं लोकतंत्र की पैरवी
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर