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18 साल के बच्चों को बाल संघम में शामिल कर रहे नक्सली, दे रहे है ये खतरनाक ट्रेनिंग

छत्तीसगढ़ के घोर नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ में सुरक्षा बल के जवानों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी. (File Photo)

छत्तीसगढ़ के घोर नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ में सुरक्षा बल के जवानों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी. (File Photo)

पोटा कैबिन और आश्रम शालाओं में बच्चों की भर्ती पुलिस द्वारा कराई जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ नक्सली बच्चों का बाल संघम बना रहे है.

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छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों में नक्सली मासूम बच्चों का इस्तेमाल करने से भी नहीं चूक रहे है. 8 से 18  साल के बच्चों को बाल संघम में शामिल करते है. कहा जा रहा है कि कुछ बच्चे तो स्वेच्छा से संगठन से शामिल होते रहे है तो वहीं अधिकांश को नक्सली जबरन उठा कर ले जा रहे है और संगठन में शामिल कर अपना काम निकालते है. ये सनसनीखेज खुलासा पुलिस के सामने सरेंडर माओवादियों ने न्यूज 18 से  किया है. बता दें कि कुछ दिन पहले बच्चों की ट्रेनिंग का एक फोटो भी वायरल हुआ था. इस फोटो में नाबालिग बच्चे हाथ में बंदूक लिए और नक्सली वर्दी में दिख रहे थे. कहा जा रहा था कि फोटो नक्सली ट्रेनिंग की थी जहां बच्चों को हथियार चलाना सिखाया जा रहा था.

 बच्चों को ये खतरनाक ट्रेनिंग दे रहे नक्सली:

नक्सल प्रभावित इलाकों में जहां एक तरफ सुरक्षा बल के जवान गांवों में सर्चिंग के दौरान बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करते है तो वहीं नक्सली इन बच्चों को स्कूल जाने से रोककर उनके मौलिक आधार का हनन कर रहे है. पोटा कैबिन और आश्रम शालाओं में बच्चों की भर्ती कराई जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ नक्सली बच्चों का बाल संघम बना रहे है. बच्चों को हथियारों की ट्रेनिंग तो देते ही है अब बम प्लांट करना भी सीखा रहे है. लेकिन नक्सली बच्चों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल मुखबिरी के लिए करते है. बच्चों को पुलिस की सूचना पहुंचाने के लिए ट्रेंनिंग भी दी जा रही है.



हाल ही में दरभा डिविजन में सिविक एक्शन प्रोग्राम में तीन बच्चे मिले, जो नक्सलियों के लिए सूचना एकत्र करने का काम करते थे. इनको पुलिस ने आश्रम शाला में भर्ती कराया. बस्तर में नक्सलियों की दरभा डिविजन में ही सबसे ज्यादा बच्चों को बाल संघम में शामिल किया गया है. बाल संघम के सदस्यों से नक्सली राशन की सप्लाई का भी काम कराते है. इसमें कई बाल संघम सदस्य ऐसे है जिनके पिता कभी ना कभी नक्सलिायों के साथ थे और पुलिस मुठभेड़ में मारे गए. बच्चों के इसी आक्रोश को भुनाते हुए नक्सलियों ने बाल संघम का संचालन शुरू किया था.
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बस्तर में नक्सलियों की दरभा डिविजन में ही सबसे ज्यादा बच्चों को बाल संघम में शामिल किया गया है. (फाइल फोटो)


नक्सली बाल संघम क्यों?

लगातार गिरफ्तारी, मुठभेड़ और आत्मसमर्पण से नक्सलियों के लड़ाके कम हो रहे है. ऐसे में नक्सलियों ने अपने नए लड़ाके तैयार करने के लिए छोटे बच्चों को टारगेट कर रखा है. नक्सली स्कूली बच्चों को भी बरगलाकर अपने साथ ले जाते है और हथियार चलाने का प्रशिक्षण दे रहे है. आत्मसमर्पित नक्सलियों की मानें तो लीडर बच्चों को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे है. बच्चों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने से पहले मुखबिरी, संतरी, सप्लायर और अब तो बम इंप्लांट करने के लिए कह रहे है. इसके बाद 12 बोर बंदूक या भरमार चलाने दिया जा रहा है. बच्चों के बीच अपनी पैठ बनाने अंदरूनी इलाकों के आश्रम शालाओं में इनकी आमदरफ्त रहती है.  पुलिस अधिकारी नक्सलियों की इस चाल से चिंतित है. दंतेवाड़ा जिले में पिछले एक-डेढ़ साल में दर्जन भर स्कूली बच्चों को पुलिस ने नक्सली सहयोगी के रूप में हिरासत में लिया और काउंसिलिंग के बाद उन्हें छोड़ दिया.

इसी साल मार्च-अप्रैल में कटेकल्याण-कुआकोंडा और बारसूर थाना इलाके के कुछ बच्चों को जवानों ने जंगल में धर दबोचा था. उनके पास से टिफिन बम, पटाखे, इलेक्ट्रिक वायर जैसी सामग्री मिली थी. कटेकल्याण इलाके के एक बच्चे के पास से एंड्रायड फोन बरामद हुआ था, जिसके मेमोरी कार्ड में नक्सल साहित्य भरा था. सामान्य नक्सल गीत, सिनेमा के अलावा लीडरों का भाषण और पुलिस विरोधी वक्तव्य से कार्ड भरा था.

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लगातार गिरफ्तारी, मुठभेड़ और आत्मसमर्पण से नक्सलियों के लड़ाके कम हो रहे है. ऐसे में नक्सलियों ने अपने नए लड़ाके तैयार करने के लिए छोटे बच्चों को टारगेट कर रखा है. (File)


फोर्स के लिए चुनौती:

एसपी दंतेवाड़ा डॉ. अभिषेक पल्लव का कहना है कि नक्सल संगठन में संख्या कम होने से नक्सली अब बच्चों का उपयोग कई तरह से कर रहे है. बच्चे गीत- संगीत और मोबाइल को देखकर प्रभावित होते है. नक्सली उन्हें मोबाइल उपलब्ध करा देते है. बच्चे दवाइयां और अन्य सामान लेकर इन तक पहुंचते है. अगर फोर्स इन्हे रोकती है तो मानवाधिकार की बात सामने आती है, क्योंकि बच्चे स्कूल ड्रेस में रहते हैं. ये पुलिस के लिए बड़ी चुनौती है.

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