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ऐसा श्मशान घाट जहां सैर और मौज करने जाते हैं लोग, जानें- क्यों खास है ये मुक्तिधाम?

ऐसा श्मशान घाट जहां सैर और मौज करने जाते हैं लोग, जानें- क्यों खास है ये मुक्तिधाम?

धमतरी के सोरूद वार्ड का मुक्तिधाम अन्य श्मशान घाटों से अलग है.

धमतरी के सोरूद वार्ड का मुक्तिधाम अन्य श्मशान घाटों से अलग है.

Chhattisgarh News: आम धारणा में श्मशान घाट की अपवित्र मानी जाती है, जहां से आने के बाद शुद्ध होने के लिए नहाना आवश्यक समझा जाता है. आम तौर पर मुक्तिधाम का माहौल ही शोक वाला और उदासी भरा रहता है. लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी में एक ऐसा श्मशान घाट है, जहां पहुंचते ही आपकी धारणा बदल जाएगी.

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धमतरी. गांव और शहरों में एक ऐसा मुक्तिधाम होता है, जिसका उपयोग मृत्यु के शव के अंतिम संस्कार के लिए होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के धमतरी (Dhamtari) का आदर्श मुक्तिधाम देश-दुनिया के रीति-रिवाजों से अलग है. ये लगभग एक गार्डन जैसा है, जहां लोग सुबह सैर, योग और कसरत करने जाते हैं. मोहल्ले के लोगों के रोजाना की मेहनत ने इस मुक्तिधाम को साधना और शक्तिधाम में बदल दिया है. यहां सिर्फ अंतिम संस्कार ही नहीं बल्कि लोग मौज और मनोरंजन के लिए भी जाते हैं. इस मुक्तिधाम की चर्चा पूरे छत्तीसगढ़ में हो रही है.

सनातन धर्म मे पुनर्जन्म की अवधारणा है. साथ ही जन्मजन्मांतर के चक्र से मुक्ति पाकर प्रभु की चरण में शरण पाने के लिए जीवन मे 16 संस्कारों का पालन करना होता है. इनमें से 16वां संस्कार अंतिम संस्कार कहा जाता है, जो कि मरणोपरांत किया जाता है और इसके लिए शहर और गांवों में मुक्तिधाम बनाए जाते हैं. जहां अलग अलग रिवाजों के अनुसार लाशों को दफनाया या जलाया जाता है. इन्हें बोलचाल में श्मशान घाट भी कहते है. ये जगह अपवित्र मानी जाती है, जहां से आने के बाद शुद्ध होने के लिए नहाना आवश्यक समझा जाता है. आम तौर पर मुक्तिधाम का माहौल ही शोक वाला और उदासी भरा रहता है. यही सब कारण है लोग मुक्तिधामों में मजबूरी में ही जाते हैं, लेकिन धमतरी के सोरिद वार्ड में बने मुक्तिधाम में अगर आप जाएं तो आपकी सारी धारण अबधारणा और सोच पलट जाएगी.

इसलिए है आदर्श मुक्तिधाम
यहां अंदर जाते ही ताजी हवा, हवा में फूलों की महक, हरियाली के बीच फूलों ली क्यारियां और कोने कोने तक साफसफाई मानो ये मुक्तिधाम नही बल्कि कोई गार्डन हो. इस मुक्तिधाम को किसी सरकारी एजेंसी ने नहीं बल्कि वार्डवासियों ने अपनी मेहनत और लागत से ये रूप दिया है. वार्ड के नंदकिशोर यादव, रमेश साहू  बताते है कि पहले यहां पूरी तरह से बबूल का जंगल था, जिनके बीच लाशों के अन्तिम संस्कार करना पड़ता था. सभी तरफ कांटे होते थे, न छांव थी न बैठने की जगह, तब वार्ड के लोगो ने खुद ही इसे संवारने के बीड़ा उठाया, धीरे धीरे रोज के प्रयासों ने अब रंग लाया है. अभी भी वार्ड के युवा सुबह 5 बजे यहां आकर साफ सफाई करते हैं. पेड़ पौधों को खाद पानी देने का काम करते हैं. युवाओं ने एक टीम बना के काम को आपस मे बांट लिया है.

Tags: Chhattisgarh news, Dhamtari

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