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आदिवासी बाहुल्य सिहावा सीट पर जीत का सिलसिला जारी रखना भाजपा के लिए चुनौती

ओडिशा की सीमा से लगा छत्तीसगढ़ के धमतरी का सिहावा विधानसभा क्षेत्र जिले के कुरूद और धमतरी विधानसभा के मुकाबले विकास के मामले में काफी पिछड़ा हुआ है.

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छत्तीसगढ़ के धमतरी का सिहावा विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिये आरक्षित है. ओडिशा की सीमा से लगा ये क्षेत्र आज भी जिले के कुरूद और धमतरी विधानसभा के मुकाबले विकास के मामले में काफी पिछड़ा हुआ है. शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी और नक्सल हिंसा की समस्या इस क्षेत्र के लिये चुनौति बनी हुई है. यहां की जनता ने कई बार भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को जिताया है, कोई भी आज तक यहां का कायाकल्प नहीं कर पाया. एक बार फिर सिहावा की जनता के पास अपने वोटों से अपना नेता और अपना भविष्य चुनने का अवसर है.

धमतरी जिले सहित छत्तीसगढ़ और दिगर राज्यों के प्यास बुझाने वाली महानदी के उद्गम में बसे सिहावा विधानसभा क्षेत्र को शुरू से ही सप्तश्रृषियों का आर्शीवाद मिला है. महानदी का उद्गम स्थल होने के साथ साथ यह इलाका जुझारू आदिवासी नेताओं का क्षेत्र रहा है. यहां आदिवासी नेता भानु सोम द्वारा किए गए आदिवासी आंदोलन को आज भी भुलाया नहीं जा सकता. सिहावा विधानसभा को आदिवासी समूह के लिए आरक्षित करने की मांग को लेकर भानु सोम के नेतृत्व मे सैकड़ों आदिवासियों ने रायपुर पैदल कूच किया था, जिसकी बदौलत साल 1962 से ही यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित है.

शुरू से ही इस विधानसभा क्षेत्र के लोग मूल स्वरूप में कांग्रेसी विचारधारा के समर्थक माने जाते रहे, लेकिन साल 1962 में जनसंघ ने और 1977 में जनता पार्टी ने अपना विधायक बनाने में सफलता हासिल की. इस दौरान जनसंघ के नारायण सिंह और जनतादल के माधव लक्ष्मण विधायक चुने गए थे. हालांकि इस बीच साल 1967, 72 में कांग्रेस के पुसऊ राम ने कांग्रेस टिकट पर विजय हासिल की और लगातार 7 चुनावों में कांग्रेस का विजयी रथ को जारी रखा. इसके आलावा साल 1990, 93,98 में कांग्रेस के माधव सिंह ध्रुव विधायक चुने गये और अविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री रहे, लेकिन कांग्रेस की इस जीत के सिलसिले को भाजपा की महिला प्रत्याशी पिंकी शाह ने वर्ष 2003 में तोड़ा और उन्होंने पूर्व मंत्री माधवसिंह ध्रुव को शिकस्त दे दी.



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भाजपा के जीत के इस सिलसिले को वो जारी नहीं रख पाई. अगले ही चुनाव 2008 में उन्हें कांग्रेस की अम्बिका मरकाम से पटखनी खानी पड़ी. जबकि 2013 में भाजपा के श्रवण मरकाम ने अम्बिका मरकाम को हराकर यह सीट फिर भाजपा की झोली में डाली, लेकिन 2008 के बाद राजनीतिक समीकरण देखें तो भाजपा के लिए यह सीट बचाना चुनौती पूर्ण नजर आ रहा. क्योंकि पिछले चार चुनाव में जनता परिवर्तन करते आ रही है. ऐसे में परिवर्तन की इस कड़ी को तोड़ना आसान नहीं होता दिख रहा है.

बता दें कि भाजपा की ओर से विधायक श्रवण मरकाम और पूर्व विधायक पिंकी शिवराज शाह को प्रमुख दावेदार माना जा रहा है. वहीं कांग्रेस की ओर से पूर्व मंत्री माधवसिंह ध्रुव और पूर्व विधायक अम्बिका मरकाम सक्रियता दिखाकर अपनी दावेदारी मजबूत करने जुटे हुए हैं. दरअसल सिहावा विधानसभा सीट आदिवासी बाहुल्य है. वहीं सुदूर वनांचल होने की वजह से कई गांव विकास से पिछड़े हुए हैं तो वही कुछ गांव नक्सल प्रभावित भी हैं. मौजूदा वक्त में जहां सिहावा विधानसभा क्षेत्र में विकास ही अहम मुद्दा होगा तो वही सोंढूर जलाशय से नहर नाली का विस्तार नहीं होने से किसानों में नाराजगी है. इलाके में रोजगार भी एक बड़ी समस्या है.

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आदिवासी बाहुल्य इस सीट में पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की अच्छी संख्या है और पिछले चुनाव में पिछड़ा वर्ग मंच ने अपना एक समर्थक प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारकर भाजपा-कांग्रेस की नाक में दम कर दिया था. ऐसे में आदिवासियों के साथ पिछड़ा वर्ग को साधने भाजपा कांग्रेस को विशेष रणनीति अपनानी होगी. हालांकि इस क्षेत्र में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कोई कसर नही छोड़ रह हैं. अजीत जोगी सिहावा इलाके का लगातार दौरा कर रहे हैं.

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