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इस गांव में एक दिन बाद मनी अनोखी दिवाली, प्रसिद्ध है आतिशबाजी

छत्‍तीसगढ़ में धमतरी जिले के आखिरी छोर पर बसे गांव तिर्रा में दीपावली का पर्व एक दिन बाद मनाने का रिवाज है. उससे भी खास बात है यहां की आतिशबाजी जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं.

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छत्‍तीसगढ़ में धमतरी जिले के आखिरी छोर पर बसे गांव तिर्रा में दीपावली का पर्व एक दिन बाद मनाने का रिवाज है. उससे भी खास बात है यहां की आतिशबाजी जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. इसे देखने के लिए यहां आने वाले सभी मेहमानों के स्‍वागत के लिए गांव के हर आंगन में लोग तत्पर रहते हैं. ऐसा कब से है और क्यों है, यह कोई ठीक से नहीं जानता.

धमतरी जिले में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर परम्पराओं में विविधता देखने मिल जाती है और यही बात दिलचस्पी पैदा करती है. जिले का एक गांव है सेमरा जहां दीपावली 7 दिन पहले मनाने का रिवाज है, लेकिन तिर्रा में यही पर्व एक दिन बाद मनाने का रिवाज है. वहीं सिहावा में दशहरा-एकादशी को अनूठे ढंग से मनाया जाता है.

तिर्रा में प्रथा के मुताबिक एक दिन बाद यानी शुक्रवार को दीप पर्व मनाया गया, बिलकुल उसी तरह जैसे अन्‍य स्‍थानों पर मनाया गया, लेकिन यहां की कुछ बाते अलग हैं. त्योहार मानने के लिए सारा गांव इकट्ठा होता है. फिर होती है शानदार आतिशबाजी. आसपास के गांव वाले और कई लोग तो दूरदराज से यहां इसे देखने आते हैं.



एक बार जो तिर्रा की दीवाली देख लेता है, वो अगली बार इसका लुत्फ लेने से चूकना नहीं चाहता. यही वजह है कि हर साल यहां दीवाली एक पर्यटन पर्व जैसी हो जाती है और ये गांव अपने मेहमानों की खातिरदारी के लिए आंखें बिछाए तैयार रहता है. यहां कोई होटल, लॉज या ढाबा नहीं है. इसलिए तो गांव के लोग अपना दरवाजा खोल देते हैं और सभी रुकने वाले मेहमानों को पूरे सम्मान के साथ रखा जाता है.
सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर तिर्रा में ये अनोखी परंपरा क्यों है, तो इसका जवाब कोई नहीं जानता. लेकिन लोग बताते हैं कि ये आजकल की बात नहीं है बल्कि सदियों से ऐसा ही चला आ रहा है.
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