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...तो क्या कांग्रेस की 'चुनावी प्लानिंग' से पंचायत चुनाव में हुई BJP की करारी हार?

...तो क्या कांग्रेस की 'चुनावी प्लानिंग' से पंचायत चुनाव में हुई BJP की करारी हार?

आखिर क्यों हार गई बीजेपी?

आखिर क्यों हार गई बीजेपी?

भाजपा ने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ना तो दूर अपने प्रतिनिधि तक क्यों नहीं खड़े किए.

गरियाबंद. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के गरियाबंद (Gariyabandh) में जिला पंचायत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव (Panchayat Election) तो खत्म हो गए मगर कई ऐसे सावल खड़े हो गये जिनका जबाव भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता सहित जिले के आम नागरिक भी जानने को उत्सुक है. पहला और सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि कांग्रेस जीत हासिक करने में कैसे कामयाब हुई और भाजपा 4 से कैसे 3 पर आ गई. भाजपा ने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ना तो दूर अपने प्रतिनिधि तक क्यों नहीं खड़े किए, दूसरा और अहम सवाल भाजपा (BJP) और कांग्रेस (Congress) दोनों में से किस पार्टी के संगठन ने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में क्या भूमिका निभाई.


कांग्रेस की खास रणनीति!


जिला पंचायत में कुल 11 सीटे होने के कारण बहुमत के लिए 6 का जादुई आंकड़ा बहुत जरूरी था. कांग्रेस समर्थित 3 प्रत्याशी जीते और तीनों ही अध्यक्ष की दौड़ में शामिल हो गए. संजय नेताम ने संगठन का आदेश मानते हुए अपनी अध्यक्ष की दावेदारी छोड़ दी. मगर स्मृति नीरज ठाकुर और लक्ष्मी साहू डटी रहीं. दोनों के बीच चुनाव हुआ तो स्मृति ठाकुर ने लक्ष्मी साहू को एक वोट से हरा दिया. स्मृति ने भाजपा के एक, गौंडवाना गंणतंत्र पार्टी के एक, दो निर्दलीय और अपनी पार्टी के संजय नेताम को एकजुट कर लिया और 6 का जादुई आंकडा हासिल करके अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया. उन्हीं की पार्टी के संजय नेताम उपाध्यक्ष बन गये, भाजपा के कांग्रेस से एक ज्यादा 4 सदस्य जीते, मगर उसके बावजूद भी भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा. यहां तक की पार्टी का एक सदस्य कांग्रेस के पाले में चला गया.


क्या रही पार्टियों के संगठन की भूमिका    


वैसे तो स्थानीय चुनाव का हवाला देकर पार्टियों ने इन चुनावों को पार्टी रहित चुनाव का दावा किया है, उसके बावजूद भी चुनावों में पार्टियों की पूरी तरह दखलअंदाजी रही. कांग्रेस द्वारा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनाव के लिए बकायदा प्रभारी नियुक्त किए गए. भाजपा द्वारा ऐसा तो नहीं हुआ फिर भी जिले के बड़े नेता चुनावों में पूरी तरह शामिल रहे. जहां तक भूमिका की बात की जाए तो कांग्रेस की और से बनाए गए पर्यवेक्षक पार्टी में ही अंतरविरोध पैदा करने का काम करते नजर आए.


6 का आंकडा स्मृति के पास होने के बाद भी पर्यवेक्षकों की मंशा कुछ दूसरी रही. अपनी मंशा को पूरा करने के लिए स्मृति के 6 में से तीन सदस्यों पर दबाव भी डाला गया. मगर सफल नहीं हो सके. वैसे तो कांग्रेस ने पर्यवेक्षकों को समन्वय बनाने के लिए भेजा था लेकिन गरियाबंद में पर्यवेक्षक समन्वय तो स्थापित नहीं कर पाए, उल्टा पार्टी में अंतरविरोध पैदा करने की जरूर कौशिश की. यदि पर्वेक्षक चाहते तो अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध संपन्न हो सकता था. वहीं भाजपा की बात कि जाए तो भाजपा के 4 विजयी प्रत्याशी जिले के चार अलग-अलग बड़े नेताओं के गुट के सदस्य है. इनमें भी आपसी सामंजस्य नहीं होने के कारण अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की दौड़ में पिछड़ गए.


पार्टियों का दावा


कांग्रेस जिलाध्यक्ष बैशाखुराम साहू का दावा है कि सामंजस्य बिठाने की कोशिश की गई लेकिन उसमें सफल नहीं हो सके. अब दोनो में से जो भी जीतेगा वो हमारा ही होगा. वहीं भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश साहू ने दावा की उनका एक प्रत्याशी कांग्रेस में चले जाने से उनकी पार्टी का मोरल डाउन हो गया और उसके बाद समय रहते वे दूसरे प्रत्यासियो से सम्पर्क नहीं साध पाए.


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Tags: Chhattisgarh news

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