किडनी प्रभावित सुपेबेड़ा बना राजनीति का अखाड़ा
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किडनी प्रभावित सुपेबेड़ा बना राजनीति का अखाड़ा
किडनी प्रभावित सुपेबेड़ा बना राजनीति का अखाड़ा

प्रदेश की ऐसी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है जिसने सुपेबेड़ा के लिए बहुत कुछ करने का दावा न किया हो, हालांकि ये बात अलग है कि इन नेताओं के दावे अब तक हकीकत में नहीं बदल पाए हैं.

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छत्तीसगढ़ में गरियाबंद जिले का किडनी प्रभावित सुपेबेड़ा गांव इन दिनों राजनीति का अखाड़ा बन गया है. आए दिन या तो किसी न किसी पार्टी का कोई न कोई नेता गांव पहुंच रहा है या फिर सुपेबेड़ा पर बयानबाजी कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में लगा है. प्रदेश की ऐसी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है जिसने सुपेबेड़ा के लिए बहुत कुछ करने का दावा न किया हो, हालांकि ये बात अलग है कि इन नेताओं के दावे अब तक हकीकत में नहीं बदल पाए हैं.

कुछ ही सालों में 64 मौतें, करीब हर घर में किडनी का एक मरीज होना, मतलब महीने में 1 मौत और 15 दिन में एक नया किडनी मरीज का सामने आना अपने आप में बहुत दुखद है. कुछ ऐसी ही तस्वीर सुपेबेड़ा की है. इसी तस्वीर को बदलने के लिए अब तक तमाम पार्टियों के नेता दावे कर चुके हैं. दूसरी पार्टियों को इस हालात के लिए जिम्मेदार ठहराना और खुद की पार्टी को सुपेबेड़ा वासियों का हितैषी बताने में किसी भी पार्टी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है.

अब जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं. नेताओं के लिए सुपेबेड़ा राजनीति का आखाड़ा बनता जा रहा है. इसमें हर पार्टी ने अपनी जोर आजमाइश कर सुपेबड़ा के बहाने न केवल गरियाबंद बल्कि पूरे प्रदेश में अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में लग गई है. कोई सुपेबेड़ा को राजकीय आपदा घोषित करने की मांग कर रहा है, तो कोई पीड़ितों का इलाज दिल्ली में कराने की मांग कर रहा है.



नेताओं के दौरे और बयानबाजी से सुपेबेड़ा के लोगों को अब तक कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि वो पहले भी दूषित पानी पी रहे थे और आज भी वही दूषित पानी पीने को मजदूर हैं. इलाज के लिए पहले भी दर दर की ठोकरें खा रहे थे आज भी बिना इलाज के ही दम तोड़ रहे हैं. गांव के हालात जो पहले थे आज भी उसमें कोई बदलाव नहीं आया है बल्कि हालात बद से बदतर जरूर हो गए है.
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