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माता के सात रूपों की पूजा के लिए यहां होती है महुए के पेड़ की पूजा

माता के सात रूपों की पूजा के लिए यहां होती है महुए के पेड़ की पूजा

नवरात्र में शक्ति के नौ देवियों की पूजा हो रही है, लेकिन बिलासपुर में एक ऐसा अनूठा मंदिर है। जहां पर देवी के सात रूपों की पूजा के लिए महुए के पेड़ों की पूजा होती है। काफी वर्षों से यह पूजा आज भी जारी है।

नवरात्र में शक्ति के नौ देवियों की पूजा हो रही है, लेकिन बिलासपुर में एक ऐसा अनूठा मंदिर है। जहां पर देवी के सात रूपों की पूजा के लिए महुए के पेड़ों की पूजा होती है। काफी वर्षों से यह पूजा आज भी जारी है।

नवरात्र में शक्ति के नौ देवियों की पूजा हो रही है, लेकिन बिलासपुर में एक ऐसा अनूठा मंदिर है। जहां पर देवी के सात रूपों की पूजा के लिए महुए के पेड़ों की पूजा होती है। काफी वर्षों से यह पूजा आज भी जारी है।

नवरात्र में शक्ति के नौ देवियों की पूजा हो रही है, लेकिन बिलासपुर में एक ऐसा अनूठा मंदिर है। जहां पर देवी के सात रूपों की पूजा के लिए महुए के पेड़ों की पूजा होती है। काफी वर्षों से यह पूजा आज भी जारी है।

बताया जाता है कि बिलासपुर में कभी जंगल थे और यहां पर रहने वाली आदिवासी बस्ती नवरात्र में देवी के सात रूपों की पूजा करते थे, जिसके लिए यहां पर महुए के सात पेड़ों को देवी का रूप मानकर पूजा किया करते थे, जो आज भी जारी है।

इसमें महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, कौमारी देवी, माहेश्वरी देवी, शीतला, मां दुर्गा के रूपों की पूजा की जाती है। सुबह और शाम बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। यहां के पुजारी ने बताया कि मंदिर की ऐसी मान्यता है कि वर्षों पूर्व यहां जंगल था। जहां पर आदिवासी बस्ती थी और यहां पर महुए के पेड़ थे, लेकिन किसी आदिवासी महिला को स्वप्न आने पर यहां पर पूजा पाठ शुरू किया गया और लोगों की मनोकामना पूर्ण होने पर यहां पर लोगों की आस्था बढ़ती गई।

आज जब बिलासपुर प्रदेश का दूसरा बड़ा शहर है तो भी इस मंदिर में महुए के पेड़ों की पूजा देवी के सात रूपों के रूप में हो रही है, जो लोगों के लिए श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है।

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