अपना शहर चुनें

States

यहां दूर से ही मत्था टेकती है महिलाएं, मंदिर के गर्भगृह में आने की नहीं है इजाज़त

कवर्धा का मां राजोदाई मंदिर
कवर्धा का मां राजोदाई मंदिर

ये परम्परा कोई पांच-दस साल से नहीं बल्कि पिछले 150 साल से भी अधिक समय से चली आ रही है जो अब भी कायम है. यहां महिलाएं दर्शन के लिए तो जरूर आती है पर वे दूर से दर्शन कर लौंट जाती है. उन्हें गर्भगृह तक जाने की अनुमति नहीं है.

  • Share this:
छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में एक ऐसा देवि मंदिर है जहां महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा हुआ है. कवर्धा जिला मुख्यालय से करीब तीस किमी दुर ग्राम सुरजपूरा में फोंक नदी के किनारे है मां राजोदाई मंदिर, जहां ये परम्परा चल रही है. ये परम्परा कोई पांच-दस साल से नहीं बल्कि पिछले 150 साल से भी अधिक समय से चली आ रही है जो अब भी कायम है. यहां महिलाएं दर्शन के लिए तो जरूर आती है पर वे दूर से दर्शन कर लौंट जाती है. उन्हें गर्भगृह तक जाने की अनुमति नहीं है.

महिलाओं ने भी अब तक इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई है. लिहाजा प्रशासन भी कोई हस्ताक्षेप नहीं कर रहा है. महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को लेकर मान्यता है कि मां राजोदाई कुंवारी है. इसलिए शादीशुदा महिलाओं का यहां आना मना है. हांलाकि इससे जुड़ी घटना के संबंध कोई सही-सही जानकारी ग्रामीणों के पास भी नहीं है. लेकिन सभी इस नियम का पालन जरूर कर रहे है.​

मंदिर में केवल पुरूषों को ही प्रवेश का अधिकार



कवर्धा जिला मुख्यालय से 30 किमी दुर फोंक नदी के किनारे है मंदिर मां राजोदाई का. इस मंदिर की खासियत ये है कि यहां केवल पुरूषों को ही प्रवेश करने का अधिकार है. मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा है. नियम के मुताबिक कोई महिला इस मंदिर के गर्भगृह में जाकर पूजा नहीं कर सकती है. ये परम्परा पिछले कई सालों से चल रही है जो अब भी कायम है. मां राजोदाई मंदिर समिति के अध्यक्ष उत्तम जायसवाल का कहना है कि महिलाओं ने कभी इस नियम का विरोध नहीं किया है.
 

मंदिर में ये भी है परंपरा

ग्राम सुरजपूरा फोंक नदी के किनारे बसा है. ग्रामीण चंदा एकत्र कर मंदिर का निर्माण करा रहे है. मंदिर का आधा काम हो चुका है. दुर-दुर से लोग दर्शन के लिए आते है. नवरात्रि में यहां विशेष आयोजन होता है, जहां श्रद्धालुओं की भीड़ अधिक रहती है. ग्रामीणों ने बताया कि मंदिर में बलि प्रथा की भी परम्परा है. मनोकामना पूरी होने वाले श्रद्धालु यहां बकरी की बलि देते है. मंदिर परिसर में ही इसकी व्यवस्था है. किसी भी जाति धर्म के लोग यहां आकर बलि दे सकते है. इसके लिए कोई प्रतिबंध या विरोध नहीं है. बलि के लिए विशेष रूप से सोमवार और गुरूवार का दिन निर्धारित किया गया. केवल नवरात्रि में बलि पर प्रतिबंध रहता है

 

मां राजोदाई से जुड़ी है ये मान्यता

मंदिर समिति के अध्यक्ष उत्तम जायसवाल ने बताया कि करीब डेढ़ से दो साल पहले गांव के बुजुर्ग को माता ने स्वपन दिया था वे नदी में बहकर उनके गांव के बाहर पहुंची है. जिसके बाद उसने देवी को उठाकर उंचे स्थान पर विराजीत कर मंदिर के रूप में पूजा शुरू की गई. मां राजोदाई सभी की रक्षा करती है. पहले जब गांवों में महामारी फैल जाती थी,तो आस-पास के गांव के लोग गांव की सीमा में आकर रहने लगते थे, जिससे उनकी पूरी बिमारी तरह से ठीक हो जाती थी.

ये भी पढ़ें:

रायपुर पहुंची राष्ट्रीय गरिमा यात्रा, यौन अपराधों के खिलाफ खुलकर सामने आ रहीं महिलाएं

बेटे की मौत के बाद इंसाफ की गुहार लगा रहा है बीएसएफ जवान का ये पिता 

जांजगीर: विद्युत विभाग का कर्मचारी बनकर लोगों से ठगी करने वाले दो युवक गिरफ्तार 

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स      

 
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज