बस्तर का अनोखा मेला, आम के पत्ते से मिलता है निमंत्रण, कील ठोककर होती है सुरक्षा

गांव वालों ने इस परंपरा को सालों पुराना बताया है.
गांव वालों ने इस परंपरा को सालों पुराना बताया है.

तीन मार्च से शुरू होने वाले इस मेले में लोगों को शामिल होने के लिए पत्ते लगे आम की टहनी के जरिए निमंत्रण दिया जाता है.

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कोण्डागांव. आज डिजिटल (Digital) के ज़माना में लोग अपना मेसेज (Message) देने की लिए सोशल मीडिया (Social Media) या फिर महंगे निमंत्रण कार्ड (Invitation Card) का इस्तेमाल करते है. वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी है जो अपनी संस्कृति को नहीं भूले है. आज भी कोंडागांव (Kondagaon) के लोग वार्षिक मेले में आने के लिए आम के पत्ते से निमंत्रण देते हैं और कील ठोककर लोगों की सुरक्षा करते है. दरअसल, जिले में हर साल फागुन महीने में वार्षिक मेले का आयोजन होता है. इस मेले में शामिल होने के लिए साप्ताहिक बाजार में आए व्यापारियों को आम की टहनी लेकर निमंत्रण दिया जाता है या यूं कहा जाए कि मेले में लोगों को बुलाने के लिए आम की टहनी निमंत्रण पत्र का काम करती है. तीन मार्च  से शुरू होने वाले इस मेले में लोगों को शामिल होने के लिए पत्ते लगे आम की टहनी के जरिए निमंत्रण दिया जाता है.

गांव के कोटवार हाथ में आम की टहनी लेकर मेला समिति के सदस्यों के साथ साप्ताहिक बाजार में घूमते हुए लोगों को मेले में आने का निमंत्रण देते है. मेला समिति के सचिव नरपति ने निमंत्रण पत्र और मेले के रस्म को बताते हुए कहा कि आम की टहनी से निमंत्रण देने का रिवाज सात सौ (700) साल पुराना है जो लगातार  चला आ रहा है. गांव के मंदिरों में पूजा अर्चना कर आम की पट्टी का तोरण बांधने की परंपरा है. तोरण लेकर घूमने के बजाय आम की टहनी को लेकर कोटवार घूमता है. इसके अलावा साप्ताहिक बाजारों में आम की टहनी के साथ मुनादी करते हुए आमजनों को भी इसके जरिये निमंत्रण दिया जाता है.

कील गड़ाकर आपदा से बचाने का रिवाज



यू तो मेला अपनी ऐतिहासिकता के साथ बहुरंगी आदिवासी संस्कृति, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक सभ्यता एवं लोक परम्पराओं के निर्वहन के चलते अपना विशिष्ट स्थान रखता है. लेकिन बस्तर के इस मेले की बात ही निराली है. कोंडागांव जिले में 1330 से चली आ रही मेले की परम्परा आज भी वैसे ही है. मेले में दूर-दाराज से लोगों को निमत्रंण देकर बुलावा भेजा जाता है. इस परिपेक्ष में यहां मेले का अयोजन करने वाली मेला समिति की पूरी जिम्मेदारी होती है.
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कोंडागांव जिले में 1330 से चली आ रही मेले की परम्परा आज भी वैसे ही है.


मेले में आए लोगों को पूरी तरह से सुरक्षा देने की हालांकि आजकल पुलिस और जिला प्रशासन ने इसकी जिम्मेदारी ले रखी है, लेकिन सालों पुरानी इस परम्परा और रिति-रिवाज के अनुसार आज भी मेले की शुरूआत से समापन तक विभिन्न विधान मेला समिति के द्वारा नियमों से किए जाते है. चरण बद्ध तरीके से होने वाले परमपराओ में मेले के आगाज के पहले आपदा से बचने मेला स्थल में कील गड़ाया जाता है जिसे मांडो रस्म कहते है.

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चरण बद्ध तरीके से होने वाले परमपराओ में मेले के आगाज के पहले आपदा से बचने मेला स्थल में कील गड़ाया जाता है जिसे मांडो रस्म कहते है.


84 गांव के देवी देवता पहुंचते है मेले में

ग्राम देवी-देवताओ को पूरी श्रद्धा के साथ लाकर मेले की शुरुआत की जाती है. मेला आयोजन समिति के नरपति पटेल ने बताया की यहां होने वाले मेले में ग्राम देवी देवताओं की अनुमति प्राप्त करना, देवी पहुंचानी की रस्म अदा करने के साथ सभी ग्राम देवी-देवताओं को मेले में शामिल होने का निमंत्रण देना, यह धार्मिक प्रक्रिया मेला शुरू करने से पहले की जाती है. देवी को लाने के बाद सभी पुजारी द्वारा नगर के अधिकारी और जनप्रतिनिधिगणों की अगवानी की रस्म की जाती है. मेला स्थल की परिक्रमा दैवीय अनुष्ठान का एक प्रमुख अंग है.

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