न्याय के इस मंदिर में भगवान को भी मिलती है सज़ा, जानें कैसी है ये अनोखी प्रथा?

ये अनोखी प्रथा (Custom) सदियों से चली आ रही है. हर साल इस प्रथा का पालन भी बगैर रोकटोक के किया गया.

Vivek Shrivastava | News18 Chhattisgarh
Updated: September 3, 2019, 12:11 PM IST
न्याय के इस मंदिर में भगवान को भी मिलती है सज़ा, जानें कैसी है ये अनोखी प्रथा?
छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग अपनी अनोखी संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है. सांकेतिक फोटो.
Vivek Shrivastava | News18 Chhattisgarh
Updated: September 3, 2019, 12:11 PM IST
बस्तर, छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) का बस्तर (Bastar) संभाग अपनी अनोखी संस्कृति और परंपराओं (Culture and Tradition) के लिए जाना जाता है. ऐसी ही एक परंपरा है जिसमें अनोखी अदालत लगाई जाती है. इस अदालत में कठघरे में किसी इंसान नहीं बल्कि भगवान (God) को ही खड़ा कर दिया जाता है. इतना ही नहीं जुर्म (Crime) सिद्ध होने पर भगवान को सजा भी दी जाती है. इसे देव अदालत (God Court) के नाम से जाना जाता है. बस्तर में ये अनोखी प्रथा सदियों से चली आ रही है. हर साल इस प्रथा का पालन बेरोक-टोक किया जाता है. इस बार बस्तर संभाग के कमिश्नर सहित अन्य प्रशासनिक अमला भी देव अदालत में मौजूद था.

बस्तर संभाग के कोंडागांव (Kondagaon) जिले में देव अदालत लगाई जाती है. यहां रहने वाला आदिवासी समुदाय सदियों से इस प्रथा का पालन करता आ रहा है, जिसमें वो विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. आस्था और विश्वास पर टिका भगवान और इंसान का ये रिश्ता बेहद अहम है. इस आस्था और विश्वास में कमी होने पर भगवान को ही दैवीय न्यायालय के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है. न्याय के दरबार में देवी-देवताओं को भी सजा मिलती है.

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कोंडागांव में भंगाराम मंदिर परिसर में लगी देव अदालत.


यहां लगता है दरबार

कोंडागांव जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर सर्पिलाकार केशकाल घाट की वादियों में भंगाराम माई का मंदिर है. मंदिर के पुजारी सरजू राम कहते हैं कि इस सदियों पुराने मंदिर को देवी-देवताओं के न्यायालय के रूप में जाना जाता है. ऐसी प्रथा है कि भंगाराम की मान्यता के बिना क्षेत्र में स्थित नौ परगना में कोई भी भगवान कार्य नहीं कर सकते. साल में एक बार भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा को मंदिर प्रांगण में विशाल जातरा या यूं कहें कि मेला का आयोजन किया जा सकता है. इस साल भी भंगाराम माई के दरबार में देवी-देवताओं का विशाल मेला आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी तादाद में श्रद्धालु पहुंचे.

महिलाओं पर रोक, भगवान को सजा
पुजारी सरजू बताते हैं कि न्याय के इस दरबार में महिलाओं का आना वर्जित है. इस प्रथा में जिन देवी देवताओं की लोग उपासना करते हैं, यदि वो अपने कर्तव्यों का निर्वहन न करें तो उन्हें ग्रामीणों की शिकायत के आधार पर भंगाराम के मंदिर में सजा मिलती है. यहां भगवान को एक कठघरे में खड़ा किया जाता है. यहां भंगाराम न्यायाधीश के रूप में विराजमान होते हैं. यहां अपराधी को दंड और वादी के साथ न्याय किया जाता है.
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भंगाराम माई मंदिर परिसर


अलग-अलग होती है जेल
केशकाल के पूर्व विधायक कृष्ण कुमार ध्रुव बताते हैं कि मंदिर परिसर में अलग-अलग जेल होती है. भंगाराम माता मंदिर के ठीक सामने खाली जगह है, जहां साल भर ग्रामीण परेशान करने वाले देवी-देवताओं को लाकर रखते है. जिनका फैसला भादो माह में होने वाले जात्रा के दिन होता है. मंदिर कमेटी के पंच ने बताया कि पहले भगवान को अस्थायी जेल में रखा जाता है. फिर वहां से बड़ी जेल ले जाया जाता है. भगवान द्वारा गांव में होने वाली किसी प्रकार की व्याधि, परेशानी को दूर न कर पाने की स्थिति में देवी-देवताओं को दोषी माना जाता है. विदाई स्वरूप उक्त देवी-देवताओं के नाम से चिन्हित बकरी, मुर्गी, सोने और चांदी समेत अन्य वस्तुओं के साथ गांव के देवी-देवता लाट, बैरंग, डोली आदि को लेकर ग्रामीण साल में एक बार लगने वाले भंगाराम जातरा में पहुंचते हैं.

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सजा के तौर पर फेंकी गई सामग्री.


ये रखते हैं पक्ष, मिलती है ये सज़ा
पुजारी सरजू बताते हैं कि आरोपी पक्ष की ओर से दलील पेश करने सिरहा, पुजारी, गायता, माझी, पटेल सहित ग्राम प्रमुख उपस्थित होते हैं. जहां दोनों पक्षों की गंभीरतापूर्वक सुनवाई के पश्चात आरोप सिद्ध होने पर फैसला सुनाया जाता है. मंदिर में देवी-देवताओं को खुश करने के लिए बलि देने और भेंट चढ़ाने का विधान है. सजा के तौर पर दोष सिद्ध होने के पश्चात देवी-देवताओं के लाट, बैरंग आंगा, डोली आदि को गड्ढे में डाला जाता है.

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First published: September 3, 2019, 10:58 AM IST
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