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रेफर सेंटर बना कोंडागांव अस्पताल, सुविधा नहीं मिलने पर नवजातों के साथ भटकी मां

Vivek Shrivastava | News18 Chhattisgarh
Updated: February 12, 2020, 4:14 PM IST
रेफर सेंटर बना कोंडागांव अस्पताल, सुविधा नहीं मिलने पर नवजातों के साथ भटकी मां
कोंडागांव में एकमात्र सबसे बड़े अस्पताल में सुदूर अंचल में मरीज आते हैं, पर अस्पताल के स्टाफ मरीजों को दूसरे अस्पताल का रास्ता दिखाते हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के कोंडागांव (Kondagaon) में करोड़ों रुपयों की लागत से बना जिला अस्पताल इन दिनों रेफर सेंटर बन गया है.

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कोंडागांव. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के कोंडागांव (Kondagaon) में करोड़ों रुपयों की लागत से बना जिला अस्पताल इन दिनों रेफर सेंटर बन गया है. एक तरफ 100 बिस्तर का जिला अस्पताल है और दूसरी तरफ है सर्व सुविधा युक्त मदर चाईल्ड केयर, लेकिन दोनों का हाल बेहाल है. जिले के एकमात्र सबसे बड़े अस्पताल में सुदूर अंचल में मरीज आते हैं, पर अस्पताल के स्टाफ मरीजों को दूसरे अस्पताल का रास्ता दिखाते हैं. कोंडागांव जिला पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम का गृह जिला है. वहीं कलेक्टर हर सप्ताह जिला अस्पताल में बैठक लेकर व्यवस्था सुधारने का दावा करते हैं, लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं है.

ताजा मामला जिले के रांधना गांव से आई एक प्रसूता महिला से जुड़ा है, जिसे जिला अस्पताल में सुविधा नहीं मिली. रांधना गांव उपस्वास्थ्य केंद्र से एक प्रसूता को जिला अस्पताल रेफर किया गया. उपस्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों ने जिला अस्ताल लाकर छोड़ दिया. प्रसव पीड़ा से परेशान महिला की जांच के बाद अस्पताल के स्टाफ ने अस्पताल ने सुविधा नहीं होने की बात कहते हुए महिला के परिजनों को दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दी. प्रसव पीड़ा से तड़पती महिला को परिजन स्थानीय नर्सिंग होम ले गए, जहां महिला ने तीन शिशुओं को जन्म दिया.

एकमात्र सबसे बड़े अस्पताल में सुदूर अंचल में मरीज आते हैं, पर अस्पताल के स्टाफ मरीजों को दूसरे अस्पताल का रास्ता दिखाते हैं.
अस्पताल के बाहर खुले में बैठी नवजात व उनकी मां.


खुले आसमान के नीचे नवजात

जिला अस्पताल की खामियों के साथ ही अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही का नजारा  उस समय नजर आया जब दूसरे दिन महिला के पति और उसके परिजन तीन नवजात बच्चों को लेकर वापस जिला अस्पताल लेकर आये अस्पताल में मौजूद स्टाफ ने बच्चों को देखने की कोशिश नहीं की और सीधे दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दी. परिजन डॉक्टर के इंतजार में अपने नवजात बच्चों को लेकर अस्पताल के बाहर खुले आसमान के नीचे बैठे डॉक्टर का इंतजार कर रहे. प्रसूता के साथ आये उसके पति लालसाय मरकाम ने कहा की पहले ही निजी अस्पताल में प्रसव कराने से 20 हजार रुपये खर्च हो चुके हैं. अब फिर बच्चो को लेकर दूसरे अस्पताल ले जाने लायक पैसे नहीं है.

ग्रामीणों का एक मात्र सहारा है जिला अस्पताल
इस अस्पताल में सबसे ज्यादा ग्रामीण और संवेदनशील एरिया खासकर आदिवासी बाहुल्य के लोग बेहतर स्वास्थ्य सेवा के लिए आते हैं, पर अस्पताल पहुंचते ही उन्हें रेफर होने की सलाह दी जाती है. प्रदेश में सरकार बदल गई पर जिले के अस्पताल की हालत और व्यवस्था नहीं बदल पाई है. बहरहाल देखना होगा की कब सरकार हो या जिला प्रशासन इन ग्रामीणों की सुध लेकर जिला अस्पताल को वेंटीलेटर से निकल कर वास्तव में सर्व सुविधा युक्त बनाती है.ये भी पढ़ें:

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First published: February 12, 2020, 4:14 PM IST
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