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दोनों हाथों से दिव्यांग ये बच्ची बनना चाहती है डॉक्टर, करना चाहती है दूसरों की मदद

भावना साहू डॉक्टर बनना चाहती हैं, ताकि वो अपने जैसे बच्चों का इलाज कर सके.

भावना साहू डॉक्टर बनना चाहती हैं, ताकि वो अपने जैसे बच्चों का इलाज कर सके.

स्कूल के प्राचार्य जनक राम साहू का कहना है कि भावना सामान्य बच्चों की अपेक्षा ज्यादा प्रतिभाशाली है.

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शासन-प्रशासन दिव्यांगों के लिए योजना बनाकर उन्हें मदद देने का दावा जरूर करती है. पर जन्म से ही दोनों हाथों से दिव्यांग भावना साहू खाने से लेकर अपनी पढ़ाई अपने पैरों की मदद से करती है. कोण्डागांव के फरसगांव इलाके के सरस्वती शिशु मंदिर में सामान्य बच्चों के साथ भावन साहू कक्षा आठवीं में पढ़ते हुए अपना भविष्य गढ़ रही है. भावना पर कुदरत ने पूरी नेमत नहीं दिखाई. जन्म से ही दोनों हाथों से दिव्यांग बच्ची को वैसे तो उसे कई तरह की परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है. पर वो इन सब परेशानियों को झेलते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी और अब वो कक्षा आठवीं में पहुंच गई. स्कूल के प्राचार्य जनक राम साहू का कहना है कि भावना सामान्य बच्चों की अपेक्षा ज्यादा प्रतिभाशाली है.

डॉक्टर बनना चाहती हैं भावना:

भावना अपने पैरों का इस्तेमाल ऐसा कराती है जैसे वो पैर न होकर हाथ हो. भावना पैर से पेन पकड़ कर कॉपी में लिखती भी है और ड्रॉईंग भी बनती है. इतना ही नहीं वो पैरों को हाथ बनाकर खाना भी खा लेती है. इसे देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते है. अक्सर बच्चे आईएस ,आईपीएस बनना का ख्वाब देखते है. पर भावना साहू डॉक्टर बनना चाहती हैं, ताकि वो अपने जैसे बच्चों का इलाज कर सके.

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भावना पैर से पेन पकड़ कर कॉपी में लिखती भी है और ड्रॉईंग भी बनती है.


दिव्यांग होने के बावजूद है पढ़ाई का जज्बा:

भावना साहू के पिता मजदूरी कर परिवार का भरणपोषण करते है. दिव्यांग होने के बाद भी भावना में पढ़ने का जज्बा है. आर्थिक परेशानी उसकी पढ़ाई में बाधा बन रही थी. उसके पढ़ने की ललक देखकर उसकी फरसगांव में रहने वाली बुआ निर्मला साहू ने उसे सहारा दिया. निर्मला साहू ने कहा कि तत्कालीन कलेक्टर समीर विश्नोई ने भावना के इलाज का भरोसा दिलाया था. पर उनके जाने के बाद अब तक कोई सरकारी मदद नहीं मिली है. वहीं स्कूल के प्राचार्य जनक राम ने कहा कि स्कूल में भावना से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है. कोशिश है की भावना को आर्थिक मदद भी मिल जाए.


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