बागबाहरा नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए 'राइट टू रिकॉल', मचा सियासी घमासान

महासमुंद के बागबाहरा में नगर पालिका के अध्यक्ष पद के लिए होने वाले 'राइट टू रिकॉल' (वापस बुलाने का अधिकार) चुनाव ने यहां के चुनावी माहौल को और भी ज्यादा गर्म कर दिया है.

Manohar Singh Rajput | News18 Chhattisgarh
Updated: October 13, 2018, 10:24 AM IST
बागबाहरा नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए 'राइट टू रिकॉल', मचा सियासी घमासान
बागबाहरा नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए 'राइट टू रिकॉल', मचा सियासी घमासान
Manohar Singh Rajput
Manohar Singh Rajput | News18 Chhattisgarh
Updated: October 13, 2018, 10:24 AM IST
छत्तीसगढ़ में एक तरफ जहां विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है, वहीं दूसरी ओर महासमुंद के बागबाहरा में नगर पालिका के अध्यक्ष पद के लिए होने वाले 'राइट टू रिकॉल' (वापस बुलाने का अधिकार) चुनाव ने यहां के चुनावी माहौल को और भी ज्यादा गर्म कर दिया है. अध्यक्ष जहां अपनी कुर्सी को बचाने के लिए एक बार फिर दांव खेल रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी भी कुर्सी खाली कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है.

बागबाहरा नगर पालिका अध्यक्ष को वापस बुलाने के लिए बागबाहरा में एक बार फिर आगामी 14 अक्टूबर को मतदान होने जा रहा है. पालिका क्षेत्र में एक बार फिर होने जा रहे इस चुनाव में नगर पालिका अध्यक्ष स्वयं और रिकॉल के लिए आवेदन लगाने वाले 14 पार्षद चुनाव की रणभूमि में कूद चुके हैं.

दोनों ही दल मतदाताओं से अपने-अपने पक्ष में वोट करने के लिए संपर्क करते नजर आ रहे हैं. दरअसल, जनवरी 2015 में बागबाहरा नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष के लिए चुनकर आई कांग्रेस की बसंती बघेल अपने प्रतिद्वंद्वी बीजेपी के शंकर तांडी को करीब 2285 वोटों से हराकर अध्यक्ष बनी थी.

बसंती बघेल को जरा भी मालूम नहीं था कि उसका कार्यकाल पूरा होने के पहले ही उसे एक बार फिर से चुनाव का सामना करना पड़ेगा. कार्यकाल के प्रारंभ से ही 5 कांग्रेस, 5 बीजेपी और 5 निर्दलीय पार्षदों के साथ सामंजस्य नहीं बैठ पाने के कारण अध्यक्ष की परेशानी शुरू हो चुकी थी. तीन बार पीआईसी में फेरबदल के बाद भी अध्यक्ष की परेशानी कम नहीं हुई. 9 पार्षदों ने अध्यक्ष पर मनमानी का आरोप लगाते हुए और अध्यक्ष पति द्वारा पालिका के कार्यों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाते हुए कलेक्टर को सामूहिक इस्तीफा सौंपा था, लेकिन इस्तीफा मंजूर नहीं किया गया.

कुछ स्थानीय नेताओं की समझाइश के बाद पार्षदों और अध्यक्ष के बीच दिखावटी समझौता तो हो गया, लेकिन अंदर ही अंदर कड़वाहट बढ़ती गई और 26 जून 2018 को 15 में से 14 पार्षदों ने कलेक्टर को 'राईट टू रिकॉल' का आवेदन दिया, जिसके बाद 27 जून को जांच अधिकारी ने हस्ताक्षर मिलान किया. 29 जून को कलेक्टर ने 14 पार्षदों का बयान लिया और प्रकरण राज्य शासन को भेज दिया. राज्य शासन ने राज्य निर्वाचन आयोग को प्रकरण भेजा और राज्य निर्वाचन आयोग ने आवश्यक प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए 14 अक्टूबर को मतदान और 17 अक्टूबर को मतगणना की तिथि घोषित कर दी है.

इधर, प्रशासन की पूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्वाचन आयोग ने 14 अक्टूबर की तिथि घोषित कर अध्यक्ष के फैसले के लिए गेंद आम जनता के पाले में डाल दी है. वहीं 17 को परिणाम घोषित करने की संभावना है.

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