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कोरोना के Positive Effect, यहां घरों के आंगन में फिर दिखने लगी विलुप्त होती गौरैया

पर्यावरण प्रेमी भी मानते हैं कि पर्यावरण के संरक्षण के लिए पेड़, पौधे, पशु, पक्षी सबका होना बहुत जरूरी है.

पर्यावरण प्रेमी भी मानते हैं कि पर्यावरण के संरक्षण के लिए पेड़, पौधे, पशु, पक्षी सबका होना बहुत जरूरी है.

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के मुंगेली (Mungeli) जिले में विलुप्त होते गौरैया चिड़िया अब आसानी से दिखने लगे हैं.

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मुंगेली. छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के मुंगेली (Mungeli) जिले में विलुप्त होते गौरैया चिड़िया अब आसानी से दिखने लगे हैं. चिड़ियों की चीं-चीं, चूं-चूं का मधुर कलरव अब बहुत कम ही आंगन या घरों की छत पर सुनाई देता है. इसकी बड़ी वजह तेजी से इन गौरैया चिड़िया का विलुप्त होते जाना है. लेकिन लॉकडाउन में मुंगेली में एक बार फिर इन विलुप्त होते गौरेया चिड़ियों की संख्या में इजाफा देखने को मिल रहा है. ये पक्षी एक बार छतों औक आंगन पर दिखने लगी हैं.

मुंगेली नगर के मिश्रा दंपत्ति के घर पर इन चिड़ियों का अच्छा खासा बसेरा हो गया है. ये पक्षी इस परिवार के साथ काफी घुल-मिल भी गया है. प्रोफेसर डॉ. मुकेश मिश्रा और डॉ. ममता मिश्रा इन पक्षियों
को सहेजने का कार्य भी करते हैं. प्रोफेसर दंपति इन पक्षियों की देखभाल करते हैं और इन्हें दाना पानी भी देती हैं.

लॉकडाउन में बेजुबानों की मदद

मुंगेली का मिश्रा परिवार इन पक्षियों को अपने बच्चों की तरह ही संभाल रहा है. इससे इनकी संख्या भी बढ़ रही है. ये बेजुबान पक्षी भी अब इनके परिवार के सदस्यों की तरह ही रहते हैं. बच्ची अनुष्का तो दिन भर इन चिड़ियों के साथ ही खेलते रहती है. लॉकडाउन में इस बच्ची ने इन चिड़ियों को भी अपना दोस्त बना लिया है. डॉ. ममता मिश्रा बताती हैं कि पहले झुंड में रहने वाले ये पक्षी भी लॉकडाउन का पालन करते दिखाई देती है. दाना चुगने भी अलग-अलग करके आते हैं.  घर के आंगन में लगे पेड़ पर इनका बसेरा रहता है.

एक खूबसूरत तस्वीर

पर्यावरण प्रेमी भी मानते हैं कि पर्यावरण के संरक्षण के लिए पेड़, पौधे, पशु, पक्षी सबका होना बहुत जरूरी है. ऐसे में इन पंछियों का संरक्षण करने का ये कार्य बहुत ही सराहनीय है. वहीं इन पंछियों की के मधुर कलरव को सुनकर ऐसा लगता है कि आखिर कब वो दिन लौटकर वापस आएंगे जब एक बार फिर सहजता से घरों में इन चिड़ियों की आवाज सुनाई देगी. लेकिन तेजी से बदलते वातावरण में ऐसा सोचना कल्पना सा ही लगता है.

गौरतलब है कि गौरैया को छत्तीसगढ़ी में बामन चिरई भी कहा जाता है. ये बबूल, नींबू, करंज, अनार
और बांस के पेड़ में रहना पंसद करते हैं. लेकिन अब ये पेड़ पौधे ही नहीं दिखते. इनकी संख्या घटने की बड़ी वजह मोबाइल टावरों का रेडियेशन भी माना जाता है. साथ ही दाना पानी की समस्या भी है. खेतों में रासायनिक दवाओं का छिड़काव भी इन पर बुरा असर डालता है. प्रदेश का प्रमुख अचानकमार टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए योजनाएं तो हैं लेकिन विलुप्ति की कगार पर खड़े इन पक्षियों के संरक्षण के लिए फिलहाल कोई योजना नही दिखती है.

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