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शिक्षा की चाह में बढ़ते कदमों को रोकता लाल आतंक

जिला मुख्यालय नारायणपुर के ओरछा या अबूझमाड़ के स्‍कूलों में नक्‍सली हमलों के निशान साफ दिखाई पड़ते हैं। टूटे हुए स्कूल, जर्जर होती स्कूल की इमारतें, नदारद शिक्षक ये सभी आपकों यहां के स्‍कूलों में साफ दिखाई दे जाएगा। सर्व शिक्षा अभियान के तहत चलने वाले यहां के 135 स्कूलों को नक्सलियों ने बम से उड़ा दिया था।
जिला मुख्यालय नारायणपुर के ओरछा या अबूझमाड़ के स्‍कूलों में नक्‍सली हमलों के निशान साफ दिखाई पड़ते हैं। टूटे हुए स्कूल, जर्जर होती स्कूल की इमारतें, नदारद शिक्षक ये सभी आपकों यहां के स्‍कूलों में साफ दिखाई दे जाएगा। सर्व शिक्षा अभियान के तहत चलने वाले यहां के 135 स्कूलों को नक्सलियों ने बम से उड़ा दिया था।

जिला मुख्यालय नारायणपुर के ओरछा या अबूझमाड़ के स्‍कूलों में नक्‍सली हमलों के निशान साफ दिखाई पड़ते हैं। टूटे हुए स्कूल, जर्जर होती स्कूल की इमारतें, नदारद शिक्षक ये सभी आपकों यहां के स्‍कूलों में साफ दिखाई दे जाएगा। सर्व शिक्षा अभियान के तहत चलने वाले यहां के 135 स्कूलों को नक्सलियों ने बम से उड़ा दिया था।

  • News18
  • Last Updated: February 20, 2015, 3:09 PM IST
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जिला मुख्यालय नारायणपुर के ओरछा या अबूझमाड़ के स्‍कूलों में नक्‍सली हमलों के निशान साफ दिखाई पड़ते हैं। टूटे हुए स्कूल, जर्जर होती स्कूल की इमारतें, नदारद शिक्षक ये सभी आपकों यहां के स्‍कूलों में साफ दिखाई दे जाएगा। सर्व शिक्षा अभियान के तहत चलने वाले यहां के 135 स्कूलों को नक्सलियों ने बम से उड़ा दिया था।

आज भी हजारों छात्र-छात्राएं नक्सली आतंक के चलते शिक्षा से वंचित हैं। सैकड़ों आदिवासी बालाएं घरों से दूर आवासीय विद्यालय, आश्रमशालाएं, पोटा केबिन, कस्तूरबा गांधी आश्रमशाला एवं छात्रावासों में रहकर पढ़ रही हैं, लेकिन यहां भी इनका जीवन आसान नहीं है।

झलियामारी का दंश



अभी तक इलाके के स्‍कूल लाल आतंक के साये से मुक्त भी नहीं हुए थे कि मानवता को शर्मशार करने वाली घटना कांकेर झलियामारी आश्रमशाला में हुईं। 2013 के बलात्कार कांड का जब राज खुला तो पता चला कि आश्रमशाला के बच्चियों को सालों से शारीरिक शोषण का शिकार बनाया जा रहा था। इस कांड में 11 बच्च्यिां शारीरिक शोषण का शिकार हुई थीं। इन बच्चियों की अस्‍मत से खिलवाड़ करने वाला स्‍कूल का गार्ड और शिक्षक ही थे।
इस घटना के बाद से बस्तर के आदिवासी इलाकों के लोगों को खौफ से भर दिया था। स्थानीय लोगों ने अपनी बेटियों को स्‍कूल भेजने से मना करने का मन बना लिया था। नारायणपुर और अबूझमाड़, जहां पहले से ही शिक्षा नक्सलियों के निशाने पर थी। इस घटना के बाद शिक्षा के मामले में और पिछड़ गया। इस प्रकरण में राष्ट्रीय महिला आयोग के जांच रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में लोगों का विश्वास बहाल करने के लिए कुछ कदम उठाए।

सरकार ने लड़कियों को सड़क से सटे आश्रमशालाओं में भेजने का फरमान जारी कर दिया गया और अपने निर्देश में स्पष्ट रूप से कहा कि लड़कियों को वहां भेजने से पहले उनके लिए पर्याप्त सुविधाएं सुनिश्चित कर दी जाएं। इस फरमान के तहत आश्रमशालाओं में महिला गार्डों की पर्याप्त संख्या में नियुक्ति, पीने के पानी से लेकर टॉयलेट, सोने के लिए बेड, नियमित डॉक्‍टरी जांच और अन्‍य जरुरी सुविधाएं शामिल थीं। इसके बाद लड़कियों की आश्रमशालाओं को सड़क के किनारे बने स्कूलों में शिफ्ट कर दिया और सरकार ने अपनी कर्तव्यों से इतिश्री समझ ली।

अब भी हो रही है लापरवाही

इस सरकारी फरमान का अंजाम भी वही हुआ जो गरीबों के लिए चलाई जा अन्‍य सरकारी योजनाओं और फरमानों का होता है। ऐसा ही कुछ हाल कुरूसनार कन्या आश्रम का भी है। बाहर से ठीक-ठाक लगने वाली इस आश्रमशाला के अंदर प्रवेश करते ही यहां व्‍यवस्‍था की पोल खुलने लगती है। यहां पढ़ने वाली 131 बालिकाओं के लिए आज भी 50 से कम बिस्‍तर हैं। कहने के लिए यहां पर नल कनेक्शन, बोरिंग सब लगे हुए हैं लेकिन उचित रख-रखाव के अभाव में अक्सर ये खराब ही रहते हैं और बोर पूरी तरह सूख चुका है। इस कारण लड़कियों को कई बार तो पानी के लिए लड़कों के हॉस्टल की ओर मुंह करना पड़ता है, नहीं तो बाहर जाना पड़ता है।

सुरक्षा की चिंता

धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने से लड़कियां आश्रमशालाओं में काफी देर से एडमिशन लेती हैं। जितनी उम्र में शहरी लड़कियां दसवीं पास कर चुकी होती हैं, उतनी उम्र में यहां की लड़कियां पांचवी या छठी में पढ़ती हैं। आश्रम के हालात पर एक लड़की ने बताया कि उन्हें बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन उन्‍हें प्रशासन से पूरी उम्मीद है कि जल्द ही स्थितियां बदल जाएंगी। आश्रम अधीक्षका नाम न छापने की शर्त पर बताती हैं कि नई बिल्डिंग निर्माणाधीन है और जैसे ही निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा वे बच्चियों के साथ उसमें चले जाएंगे।

नारायणपुर का सबसे दुर्गम क्षेत्र अबूझमाढ़ का हेडक्वार्टर ओरछा है। झलियामारी कांड के बाद प्रशासन ने पहल की। पहले आठ और उसके बाद दो कन्या आश्रमशालाएं जो अबूझमाड़ में स्थित थीं, उन्‍हें ओरछा की शासकीय माध्यमिक शाला में शिफ्ट कर दिया। इनमें पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या 300 से ज्‍यादा है। चूंकि यहां भवन ज्‍यादा संख्‍या में नहीं हैं, इसलिए शुरुआत में यहां के हॉस्टलों में लड़कियों को रखा जाता है।

तीन महीने पहले मीडिया में आश्रमशालाएं महिला प्रहरी विहीन होने के सामाचार छपने के बाद जिला प्रशासन ने महिला गार्डों की नियुक्ति करने की पहल की और काफी जगहों पर नियुक्त भी कर दिया। अब आश्रमशालाओं में महिला सुप्रीन्टेंडेंट भी नजर आने लगी हैं, लेकिन लड़कियों को मिलने वाली सुविधाओं का हाल बेहाल है।

कागजों में तो सोलर बिजली से लेकर खाने पीने, साफ-सफाई के लिए जैसे साबुन टुथ पेस्ट, कपड़े सभी सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन यहां रहने वाली लड़कियों से पूछा जाए तो वे बताती हैं कि तीन लड़कियों आज भी एक ही बिस्‍तर पर सोना पड़ता है। लड़कियां ऐसी ढेरों समस्‍याएं उंगलियों पर गिनवा सकती हैं।

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक सरकार ने लड़कियों को पढ़ाने के लिए बीआरजीएफ, आईडीएपी के तहत स्पेशल कोचिंग तक की सुविधाएं प्रदान करती है। अंग्रेजी, विज्ञान और गणित के लिए अलग से विशेषज्ञ टीचर मुहैया कराए जाते हैं।

अबूझमाड़ की स्थिति भी बदतर

अबूझमाड़ के अंदरुनी क्षेत्र में पदस्थ शिक्षक पांडु बताते हैं कि ओरछा तक तो हालात फिर ठीक भी हैं, लेकिन जाटलूर, ढ़ोढ़रबेड़ा, पीड़ियाकोट जैसी जगहों में बच्चों को शिक्षित बहुत मुश्किल है। यहां नक्‍सलियों के साथ-साथ पुलिस वालों से भी डरना पड़ता है। अभी भी आधे से ज्यादा भवन बने नहीं हैं। बच्चे या तो पेड़ के नीचे पढ़ते हैं या ग्रामीणों ने जो भवन मुहैया कराया है, उसमें ही शिक्षा दी जा रही है। एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने आधे से ज्यादा आंगनबाड़ी बंद होने की भी बात बताई।

घोषणाओं पर ईमानदारी से पहल करने की जरुरत

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता पोटाई बताते हैं घोषणाओं के सब्जबाग तो दिखाए जाते हैं, लेकिन उन्‍हें पूरा नहीं किया जाता। जिला पंचायत सीईओ दीपक सोनी बताते हैं कि वे अब तक ओरछा के आश्रमशालाओं का तीन से ज्यादा बार जा कर जांच कर चुके हैं। जो कमियां रह गई हैं, उसे तत्काल निवारण करने के लिए आदेश दिए जा चुके हैं। हम लोगों ने सरकार के प्री फैब्रिकेटेड टेक्नोलॉजी युक्त स्ट्रक्चरस की सरकार के पास मांग रखी है और जैसे ही मांग मान ली जाती है तो हम इस क्षेत्र में काम शुरू कर देंगे।

वहीं जिला शिक्षा अधिकारी गायकवाड़ ने बताया कि स्थितियां बदल रही हैं, लेकिन समय लगेगा। भ्रष्टाचार की शिकायत आने पर कार्रवाई होती है। उन्‍होंने बताया कि कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा बल नहीं पहुंच पाते हैं, वहां थोड़ी दिक्‍कत आती है। साथ ही कुछ क्षेत्रों में शिक्षक भी लेकिन कुछेक ऐसे क्षेत्रों से होती है जहां सुरक्षाबल भी नहीं पहुंच सकते वहां कार्यवाही करने में दिक्कत जाती है। दूसरा, कुछ इलाकों में शिक्षक भी नहीं जाना चाहते हैं, ऐसे में शिक्षकों की कमी भी मुश्किल दूसरी बाद टीचर इस क्षेत्र में आना नहीं चाहते, ये भी एक परेशानी है।

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