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यहां मौत के 50 साल बाद भी किया जाता है अंतिम संस्‍कार

छत्तीसगढ़ के बस्तर में रहने वाली गोण्ड जनजाति अपने दिवंगत लोगों का अंतिम संस्कार पचास साल के बाद भी करती है। गोण्ड जनजाति का मानना है कि शरीर नश्वर है और इसे पत्थर के रूप में पहचानेंगे। गोण्ड जनजाति बहुल गांवों में ऐसे कई पत्थर दिखाई देते हैं। इन्हें गायता पखना कहा जाता है। इसी मान्यता को लेकर यहां दिवंगत लोगों के नाम से सालों बाद सामूहिक पत्थर गाड़ने की रस्म होती है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में रहने वाली गोण्ड जनजाति अपने दिवंगत लोगों का अंतिम संस्कार पचास साल के बाद भी करती है। गोण्ड जनजाति का मानना है कि शरीर नश्वर है और इसे पत्थर के रूप में पहचानेंगे। गोण्ड जनजाति बहुल गांवों में ऐसे कई पत्थर दिखाई देते हैं। इन्हें गायता पखना कहा जाता है। इसी मान्यता को लेकर यहां दिवंगत लोगों के नाम से सालों बाद सामूहिक पत्थर गाड़ने की रस्म होती है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में रहने वाली गोण्ड जनजाति अपने दिवंगत लोगों का अंतिम संस्कार पचास साल के बाद भी करती है। गोण्ड जनजाति का मानना है कि शरीर नश्वर है और इसे पत्थर के रूप में पहचानेंगे। गोण्ड जनजाति बहुल गांवों में ऐसे कई पत्थर दिखाई देते हैं। इन्हें गायता पखना कहा जाता है। इसी मान्यता को लेकर यहां दिवंगत लोगों के नाम से सालों बाद सामूहिक पत्थर गाड़ने की रस्म होती है।

  • News18
  • Last Updated: September 12, 2014, 4:28 PM IST
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छत्तीसगढ़ के बस्तर में रहने वाली गोण्ड जनजाति अपने दिवंगत लोगों का अंतिम संस्कार पचास साल के बाद भी करती है। गोण्ड जनजाति का मानना है कि शरीर नश्वर है और इसे पत्थर के रूप में पहचानेंगे। गोण्ड जनजाति बहुल गांवों में ऐसे कई पत्थर दिखाई देते हैं। इन्हें गायता पखना कहा जाता है। इसी मान्यता को लेकर यहां दिवंगत लोगों के नाम से सालों बाद सामूहिक पत्थर गाड़ने की रस्म होती है।

नईदुनिया की खबर के मुताबिक गोण्डी में इसे कल उरसना यानि पत्थर रखना हैं। बहुवचन में इसे कल्क उरसना कहते हैं। आसपास के गांवों के एक ही गोत्र के लोग कई सालों में एक बार अपने परिवार के दिवंगत लोगों का अंतिम संस्कार एक ही स्थान पर करते हैं। वे यहां पत्थर गाड़ते हैं।

मुंजमेटा पंचायत के मरकाबेड़ा गांव के निवासी एवं गोण्डवाना समाज की सलाहकार समिति के सदस्य बालसाय वड्डे कहते हैं कि शरीर नश्वर होता है। नई पीढ़ी अपने बुजुर्गों को पत्थरों के रूप में पहचानती है।बालसाय वड्डे का कहना है कि अमूमन एक पीढ़ी के बाद ये रस्म की जाती है। ये कभी पचास साल बाद होती है तो कभी तीस साल बाद। कहीं-कहीं बीस साल बाद भी ये रस्म होती है। उनके समाज में ये किसी दिवंगत का अंतिम संस्कार ही है।



मरकाबेड़ा गांव के ही रखाराम वड्डे बताते हैं कि कल्क उरसने का कार्यक्रम तीन से पांच दिनों तक चलता है। इसमें सगोत्रीय परिवार के सदस्य तो रहते ही हैं साथ ही विशेष रूप से दिवंगत के नाती को आमंत्रित किया जाता है। नाती ही पत्थर लाकर गाड़ता है। एक ही स्थान पर पत्थर रखे जाते हैं। पेशे से शिक्षक एवं कापसी निवासी मैनूराम पोटाई बताते हैं कि इस दौरान भोज चलता है। इसके लिए लोग खुद व्यवस्था लेकर आते हैं।
भोज नदी किनारे या कुंओं के आसपास होता है। भोज के लिए सूअर एवं बकरे भी कटते हैं लेकिन इनकी बलि आना पुजारी ही देता है। अनाज की व्यवस्था के लिए एक भण्डारी होता है और वह एकत्र अन्न को बांटता है। गांव के युवक-युवतियां भोजन पकाते हैं।गांव में नाच-गाना होता है और कृत्रिम बाजार लगाया जाता है। कोई व्यक्ति अपने दिवंगत बुजूर्ग के नाम से बकरा या मुर्गी लाता है तो बलि के बाद इसके सिर या पूंछ को गाड़े जाने वाले पत्थर के सामने रखा जाता है। इसके अलावा पत्थर के पास चावल-दाल आदि रखे जाते हैं।

गोत्र को मंडा यानि छत और इसकी शाखा को टोंडा कहा जाता है। एक ही गोत्र में विवाह नहीं होते हैं। मसलन वड्डे गोत्र में तेता, कोर्राम, गावड़े, कचलाम, उसेंडी, सलाम, नेताम, उइका, उइके, पोयाम आदि शाखाएं होती हैं। पट्टावी गोत्र में पोटाई, मंडावी, नुरूटी, दुग्गा, सोड़ी, करंगा, गोटा, ध्रुव, कोरोटी, कुंजाम, कौड़ो, दर्रो, नाग, तारम इत्यादि शाखाएं होती हैं। गोण्डवाना समाज के बालसाय वड्डे बताते हैं कि सभी गोत्रों एवं शाखाओं के चिन्ह होते हैं। गोत्र या शाखा का निशान बकरा है तो उसमें इस पशु को खाने की मनाही होती है।
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