Analysis: किसानों की नाराजगी और कांग्रेस की पंच लाइन से मुश्किल में BJP!

Demo Pic.
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पंच लाईन ''वक्त है बदलाव का'' भी बीजेपी को मुश्किल में डालती नजर आ रही है. जिस तरह से धान की बिक्री नहीं हो रही है, वह भी बीजेपी को मुश्किल में डालने वाला संकेत है.

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छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटों के लिए वोटों की गिनती 11 दिसंबर सुबह 8 बजे से शुरू हो रही है. इसके साथ ही अब सभी पार्टियां इस बात की सुगबुगाहट लेने में लगी हैं कि जीत किसकी होगी. बीजेपी, कांग्रेस के साथ महागंठबंधन वाली पार्टियों पर भी सबकी नजर है. कई सीटों पर वोटिंग का प्रतिशत पिछले साल से कम है. 2018 का ताज किसके सिर पर सजेगा यह तो दोपहर के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इस बार मतदान में कुछ खास ट्रेंन्डस नजर आए हैं, जो यह तय करेंगे कि किसके लिए जीत का रथ सजेगा.

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छत्तीसगढ़ में बस्तर जीत का दरवाजा माना जाता है. वहीं सरगुजा, बिलासपुर, दुर्ग और रायपुर सभांग की सीटों पर सबकी नजर है. बीजेपी के कई मंत्री इस बार जीत को लेकर आश्वस्त नजर नहीं आ रहे हैं. कांग्रेस ने जिन नए चेहरों पर दांव लगाया है, उन्हें लेकर कई संभावनाएं जागी हैं. वहीं उलट बीजेपी में नए प्रत्याशियों के साथ इस बार बागियों ने खेल खेला है. महागंठबंधन के प्रभाव को भी इनकार नहीं किया जा सकता है.



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हालांकि अगर हम सीधे तौर पर देखें तो बीजेपी और कांग्रेस के बीच प्रमुख मुकाबला है. बीजेपी की मानें तो चुनाव आयोग की सख्ती ने इस बार उन्हें परेशान किया. भाजपा प्रवक्ता श्रीचंद सुंदरानी का कहना है कि निर्वाचन आयोग ने इस बार ज्यादा सख्ती दिखाई. श्रीचंद के इस बयान को अगर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इस ज्यादा प्रचार नहीं करने का नुकसान पार्टी को हो सकता है.

इस बार कांग्रेस ने बीजेपी की पुरानी रणनीति पर काम किया. बूथ पर सबसे अधिक अलर्ट रहे. इससे कांग्रेस की मजबूती से इनकार नहीं किया जा सकता है. प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भूपेश बघेल की मानें तो इस बार जो मतदान का प्रतिशत रहा, वह उनकी पार्टी के लिए शुभसंकेत है. कांग्रेस अपनी कार्यकर्ताओं की बूथ पर सतर्कता को भी अहम मानती है.

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विश्लेषकों का कहना है कि कई जगह जातिवादी फैक्टर, कई जगह कांग्रेस का घोषणा पत्र का फैक्टर तो वहीं रमन का चेहरा भी मतदाताओं पर हावी रहा है. राजनीतिक विश्लेषक रविकांत कौशिक का कहना है कि कांग्रेस की पंच लाईन ''वक्त है बदलाव का'' भी बीजेपी को मुश्किल में डालती नजर आ रही है. जिस तरह से धान की बिक्री नहीं हो रही है, वह भी बीजेपी को मुश्किल में डालने वाला संकेत है. क्योंकि कहा जा रहा है कि किसान नई सरकार बनने का इंतजार कर रहे हैं. साफ है कि कांग्रेस ने वादा किया है कि उनकी सरकार बनने पर कर्ज माफ कर दिया जाएगा.

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राजनीतिक विश्लेषक रविकांत कौशिक कहते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि किसानों को साधने की सरकार की तमाम कोशिशों पर महंगाई और समर्थन मूल्य और बोनस में वादा खिलाफी ने पानी फेर दिया हो. वहीं 27 सीटों पर महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत काफी अधिक है. जानकार कहते हैं कि शराबबंदी और महंगाई का मुद्दा उन्हें वोट करने के लिए लाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. हालांकि शहरी क्षेत्रों में जो वोटिंग प्रतिशत गिरा है, इसे बोगस वोटिंग में रोक से भी जोड़कर देखा जा सकता है.

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जाहिर तौर पर 11 दिसबंर को ही सच का सामना सभी पार्टियां करेंगी. मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले तीन बार के चुनाव की अपेक्षा इस बार बीजेपी ज्यादा परेशान नजर आ रही है. वहीं कांग्रेस जरूर आश्वस्त दिख रही है.
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