बास्केटबॉल सनसनी नेहा कारवा: जिस ग्राउंड में मां झाड़ू-पोछा करती है, वहीं खेलकर बनी 'इंटरनेशनल खिलाड़ी'

बास्केटबॉल की इंटरनेशनल प्लेयर नेहा कारवा. फाइल फोटो.
बास्केटबॉल की इंटरनेशनल प्लेयर नेहा कारवा. फाइल फोटो.

इंटरनेशनल प्लेयर नेहा कारवा के चैंपियन बनने का कारवां उनकी मां सुरजो के उस सपने से शुरू हुआ, जो उन्होंने बास्केटबॉल के ग्राउंड में झाड़ू पोछा लगाते हुए दूसरी लड़कियों को खेलते देखा था.

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भिलाई. 'बुन लिए हैं ख्वाब तो उनको पूरा कीजिए..साथ जो मांगे कोई तो हाथ अपना दीजिए..' ये लाइनें मेरे दिमाग में उसी वक्त बुन गईं, जब मैं भिलाई (Bhilai) के सेक्टर-1 स्थित बास्केटबॉल स्टेडियम (Basketball Stadium) में कोच सरजीत चक्रवर्ती से बातें कर रहा था. एक 17 साल की इंटरनेशनल खिलाड़ी के बारे में सरजीत और मेरी बात हो रही थी. खिलाड़ी की ओर इशारा करते हुए सरजीत कहते हैं कि इसने अपनी मां के सपनों को अपना लक्ष्य बनाया और उसे पूरा करने के लिए ही शहर से इंटरनेशनल स्तर तक की खिलाड़ी का सफर अब तक तय कर लिया है.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (International Women's Day) पर छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में बास्केटबॉल (Basketball) सनसनी कही जाने वाली 17 साल की नेहा कारवा की कहानी हम आपको बता रहे हैं. दुर्ग (Durg) जिले के भिलाई (Bhilai) में महज सात साल की उम्र में गरीबी के आंगन से शुरू हुआ नेहा कारवा का सफर अब इंटरनेशन प्लेयर तक पहुंच गया है. भिलाई की बालिका बास्केटबॉल टीम से अपने खेल की शुरुआत करने वाली नेहा कारवा अपने वर्ग में अब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत की ओर से भी खेलती हैं. नेहा के साथी व कोच उन्हें चैंपियन के नाम से भी बुलाते हैं.

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अपने पिता हेमराज और मां सुरजा के साथ बैठी नेहा कारवा. फाइल फोटो.




गरीबी से बेहद करीबी नाता
इंटरनेशनल प्लेयर नेहा कारवा के चैंपियन बनने का कारवां उनकी मां सुरजो के उस सपने से शुरू हुआ, जो उन्होंने बास्केटबॉल के ग्राउंड में झाड़ू पोछा लगाते हुए दूसरी लड़कियों को खेलते देखा था. बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली नेहा की मां भिलाई स्टील प्लांट (Bhilai Steel Plant) द्वारा सेक्टर-1 में संचालित बास्केटबॉल ग्राउंड व वहां के कोच सरजीत चक्रवर्ती के घर झाड़ू-पोछा करने जाती हैं. सुरजो बताती हैं कि दूसरे बच्चों को खेलते देख उनको भी लगता था कि उनकी बेटी नेहा खेले और बड़ी खिलाड़ी बने. नेहा के पिता हेमराज कारवा रिक्शा चलाते हैं. इसी से घर का गुजारा चलता है.

कोच ने थामा हाथ
करीब 10 साल पहले सुरजो ने अपनी इच्छा बास्केटबॉल कोच सरजीत चक्रवर्ती से जाहिर की. सरजीत बताते हैं कि सुरजो के कहने पर उन्होंने तब अपने सीनियर कोच व बास्केटबॉल के द्रोणाचार्य कहे जाने वाले राजेश पटेल से बात की. राजेश और सरजीत ने मिलकर नेहा को करीब 7 साल की उम्र में दूसरे बच्चों के साथ ही प्रशिक्षण देना शुरू किया. 15 साल की उम्र तक नेहा का खेल राष्ट्रीय स्तर तक पहचान बना चुका था. छत्तीसगढ़ के लिए अंडर-15 में खेलते हुए ही साल 2017 में नेहा का चयन इंडिया कैंप में हो गया.

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नेहा कारवा. फाइल फोटो.


टॉप-5 खिलाड़ियों में शामिल, 2014 में जीता पहला मेडल
सरजीत चक्रवर्ती बताते हैं कि नेहा सात साल की उम्र से बास्केटबॉल का प्रशिक्षण ले रही हैं. अंडर-15 के बाद अब वो अंडर-17 में देश व राज्य व भिलाई स्टील प्लांट की टीमों से खेलती हैं. अपने वर्ग में वे देश टॉप-5 बास्केटबॉल बालिका खिलाड़ियों में शामिल हैं. स्टेट में इनकी रैंकिंग नंबर 1 है. नेहा ने नेशनल चैंपियनशिप में करियर का पहला मेडेल वर्ष 2014 में जीता था. तब छत्तीसगढ़ की टीम उपविजेता थी. नेहा को बेस्ट प्लेयर का मेडेल दिया गया था. इतना ही नहीं अक्टूबर 2019 में पटना में आयोजित जूनियर बास्केटबॉल प्रतियोगिता में नेहा को प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट चुना गया. हाल ही में हुई साउथ एशियन चैंपियनशिप में वे भारतीय टीम का हिस्सा रही.

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सांकेतिक फोटो.


ड्राइव में मजबूत
छत्तीसगढ़ महिला बास्केटबॉल टीम के कोच सरजीज चक्रवर्ती ने बताया कि ड्राइव कर बास्केट करना नेहा का मजबूत पक्ष है. 45 एरिया से बास्केट में उसे थोड़ी समस्या है, जिसपर मेहनत कर रही है. 17 साल की उम्र तक नेहा को राष्ट्रीय प्रतियोगिता में तीन गोल्ड व तीन सिल्वर मेडल मिल चुके हैं. जबकि राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में 15 से ज्यादा पदक वो हासिल कर चुकी है. उसके साथी खिलाड़ी उसे छत्तीसगढ़ की बास्केटबॉल सनसनी भी कहते हैं.

बनना है इंटरनेशनल कोच
नेहा कारवा ने बताचीत में हैं- मेरा सपना बास्केटबॉल इंटरनेशनल कोच बनने का है. ताकि मैं अपने जैसे ही गरीब वर्ग के खिलाड़ियों को नि:शुल्क प्रशिक्षण दे सकूं, जैसा कि मेरे गुरुओं ने मुझे दिया है. फिलहाल मेरा फोकस बेहतर खेल व इसकी बदौलत आय होना भी है. क्योंकि मेरी आय से ही मैं अपने परिवार की आर्थिक मदद कर सकती हूं. रोजाना 8 से 10 घंटा बास्केटबॉल कोट में प्रैक्टिस कर बिताती हूं. ताकि खेल की बारीकियों को सीख सकूं.

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