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Bastar Files 2: नक्सलियों के सामने मां जान बख्श देने के लिए गिड़गिड़ाती रहीं और मैं देखता रहा

Bastar Files 2: नक्सलियों के सामने मां जान बख्श देने के लिए गिड़गिड़ाती रहीं और मैं देखता रहा

बस्तर के बासागुड़ा गांव के कई लोग सलवा जुडूम के राहत शिविर में बस गए थे.

बस्तर के बासागुड़ा गांव के कई लोग सलवा जुडूम के राहत शिविर में बस गए थे.

Bastar Files Salawa Judum Untold Story: बस्तर में नक्सल हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए सरकार के संरक्षण में शुरू हुआ सलवा जुडूम कैसे जंगली इलाकों में रहने वाले आदिवासी, ग्रामीणों की तबाही व बेबसी का कारण बन गया. क्यों महीनों तक बेटा चाहकर भी अपनी मां से नहीं मिल सका? बेटे की जिंदगी बचाने मां को नक्सलियों के सामने क्यों गिड़गिड़ना पड़ा. इन तमाम सवालों का जवाब सलवा जुडूम के प्रभावितों से बातचीत पर आधारित News 18 की सीरिज की इस दूसरी किश्त में आप जान सकेंगे.

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रायपुर. बीजापुर से बासागुड़ा सफर के बीच में ही मुकेश ने मुझे बता दिया था कि सलवा जुडूम से उसका गहरा नाता है. लेकिन अपनी कहानी उसने कभी फुरसत में बताने का वादा किया था. राजेन्द्र झाड़ी के बताने पर मेरे मन में मुकेश का सलवा जुडूम कनेक्शन जानने की इच्छा हुई. मुकेश ने टालने की कोशिश की, लेकिन मैंने जिद की. मुकेश ने बताया कि उसका गांव भी बासागुड़ा ही है. इसके बाद वो महारपारा की ओर बढ़ा. वहां इमली के चार-पांच पेड़ और झाड़ियों से ढंका एक मलबानुमे खंडहर को एकटक देखने लगा. मुझे समझने में देर नहीं लगी कि ये उसका ही घर रहा होगा.

मुकेश ने कहा- मेरे पापा का देहांत साल 1993 में ही हो गया था. मैं, मेरा बड़ा भाई मां के साथ इसी घर में रहते थे. बात अक्टूबर-नवंबर 2005 की है. मैं तब कक्षा 8वीं में था, जब दिवाली की छुट्टी में अपने गांव मां के पास आया था. तब तक सलवा जुडूम की कोई बैठक गांव में नहीं हुई थी, लेकिन उसके नाम की वजह से ग्रामीणों में दहशत साफ महसूस की जा सकती थी. सड़क किनारे लगे गांवों में जुडूम पहुंच चुका था. जो ग्रामीण जुडूम की बैठकों में शामिल नहीं हो रहे, उनके साथ मारपीट की जा रही है और जो लोग शामिल होते हैं, उनकी पिटाई नक्सली करते हैं. आलम यह था खेलने, मछलियां पकड़ने के लिए पहले बेझिझक आस-पास के गांवों में घूमने वाला मैं और मेरे दोस्तों पर घर से 500 मीटर दूर नदी तक जाने की भी पाबंदी लगा दी गई.

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बासागुड़ा में अब भी कई घर विरान हैं.

नक्सलियों के सामने मम्मी को गिड़गिड़ाते देखा
मम्मी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता थीं. कक्षा दसवीं में पढ़ने के लिए बड़े भाई को जगदलपुर भेज दिया. बड़े भाई के दोस्त गांव के ही टिक्कू सुन्नम भी किसी काम से बाहर गए थे. गांव के ही किसी सदस्य ने नक्सलियों को बता दिया कि दोनों लड़के पुलिस में भर्ती होने के लिए गए हैं. नक्सलियों ने जनअदालत लगाकर दोनों को बुलवाया. भाई जगदलपुर में थे तो उनकी जगह मम्मी गईं. टिक्कू भी अपने परिवार वालों के साथ जनअदालत में गए. नक्सलियों ने सबके सामने टिक्कू को इतना मारा कि वे बुरी तरह घायल हो गए और चल सकने की हालत में भी नहीं बचे.

ये सब देख मम्मी डर गईं. उन्हें लगा कि भाई के साथ ही ऐसे ही मारपीट की जाएगी. दहशत में मम्मी नक्सलियों के सामने गिड़गिड़ाने लगीं. उन्हें बताया कि मेरा बेटा सिर्फ पढ़ने के लिए गया, वो पुलिस में भर्ती नहीं होगा. काफी मिन्नतों के बाद चेतावनी देकर नक्सलियों ने मम्मी को वापस गांव भेजा. मैं भी साथ था. कुछ दिन बाद दिवाली की छुट्टियां खत्म हो गईं और मैं वापस दंतेवाड़ा आदर्श विद्यालय आ गया, जहां छात्रावास में रहकर पढ़ता था.

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Tags: Bastar news, Chhattisgarh news, Naxal violence

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