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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 50 फीसद से ज्यादा आरक्षण को बताया असंवैधानिक

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 50 फीसद से ज्यादा आरक्षण को बताया असंवैधानिक

कोर्ट ने कहा 50 फीसदी के भीतर ही आरक्षण देने है गाइडलाइन.

कोर्ट ने कहा 50 फीसदी के भीतर ही आरक्षण देने है गाइडलाइन.

हाईकोर्ट के फैसले के बाद बाहर निकले आरक्षण के जिन्न पर सियासी बोल तेज हो गए हैं. कोर्ट के फैसले के बाद सत्ताधारी दल कांग्रेस तात्कालिक बीजेपी सरकार को ही इसके लिए जिम्मेदार मान रही है. कांग्रेस के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला कहते हैं कि बीजेपी सरकार की लापरवाही की वजह से आज ऐसी स्थिति हुई है.

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रायपुर. छत्तीसगढ़ में एक बार फिर आरक्षण का जिन्न बाहर आ गया है. इस बार आरक्षण का जिन्न अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि घटाने के लिए आया है. जी हां पूर्ववर्ती सरकार ने साल 2012 में आरक्षण की सीमा को 50 से बढ़ाकर 58 फीसदी कर दिया था जिसे हाइकोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है.

छत्तीसगढ़ की पूर्ववर्ती बीजेपी की सरकार ने साल 2012 में आरक्षण की सीमा को 50 से बढ़ाकर 58 फीसदी कर दिया था जिसे लेकर गुरू घासीदास साहित्य समिति, डॉ पंकज साहू सहित अन्य ने कोर्ट में इस निर्णय को चुनौती दी थी. जिस पर करीब 10 सालों तक चली लंबी सुनावाई के बाद 19 सिंतबर 2022 दिन सोमवार को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अरूप कुमार गोस्वामी और जस्टिस पीपी साहू के डिविजन बैंच ने तात्कालिक सरकार के आरणक्ष को 50 से बढ़ाकर 58 करने के निर्णय को असंवैधानिक करार दिया.

बता दें कि तत्कालिक रमन सिंह की सरकार ने अनुसूचित जनजाति एसटी के आरक्षण को 20 से बढ़ाकर 32, अनुसूचित जाति एसटी के आरक्षण को 16 से घटाकर 12 फीसदी और ओबीसी के आरक्षण को 14 फीसदी यथावथ रखा था जिससे छत्तीसगढ़ में आरक्षण की सीमा 50 से बढ़कर 58 फीसदी हो गई थी. मगर सोमवार को हाईकोर्ट के निर्णय के बाद आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है और इस पर सियासत भी जमकर हो रही है.

आरक्षण के जिन्न पर सियासी बोल
हाईकोर्ट के फैसले के बाद बाहर निकले आरक्षण के जिन्न पर सियासी बोल तेज हो गए हैं. कोर्ट के फैसले के बाद सत्ताधारी दल कांग्रेस तात्कालिक बीजेपी सरकार को ही इसके लिए जिम्मेदार मान रही है. कांग्रेस के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला कहते हैं कि बीजेपी सरकार की लापरवाही की वजह से आज ऐसी स्थिति हुई है. साथ ही यह भी कहते हैं कि तात्कालिक सरकार को आरक्षण बढ़ाने के आधार को पुख्ता तरीके से कोर्ट में रखना था, वहीं तात्कालिक मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने इस मामले में कांग्रेस की सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया है मीडिया से बात करते हुए पूर्व सीएम ने कहा कि कांग्रेस सरकार इस लड़ाई को ठीक से नहीं लड़ी. उन्हें सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को बुलाकार मजबूती से डिफेंड करना था. मगर सरकार ने ऐसा नहीं किया जिससे आज यह निर्णय आया है.

ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण का क्या होगा?
साल 2018 में छत्तीसगढ़ में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य की कांग्रेस सरकार ने ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 14 से 27 फीसदी करने का निर्णय लिया था. हालांकि सरकार के इस फैसले के खिलाफ सरकार के ही उपक्रमों में शामिल में कबीर शोध पीठ के अध्यक्ष कुणाल शुक्ला कोर्ट गए थे. अब आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तक रखने को लेकर नए निर्णय के बाद यह सवाल उठने लगा हैं कि आखिरकार ओबीसी के नए आरक्षण को क्या होगा. इस पर वरिष्ठ विधिक जानकार नरेश चंद्र गुप्ता कहते हैं कि कोर्ट के निर्णय के बाद अब इस निर्णय का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है. क्योंकि कोर्ट ने जब 58 फीसदी आरक्षण को ही असंवैधीक करार दिया है तो ओबीसी को बढ़े हुए आरणक्ष का लाभ मिलने का कोई सवाल ही नहीं उठता.

खुला है सुप्रीम कोर्ट का विकल्प
आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट के डिविजन बैंच के निर्णय के खिलाफ राज्य सरकार चाहे तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है. मगर विधिक जानकारों की माने तो हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन को ही नजीर मानकर फैसला दिया है, तो ऐसे में इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ही जाना शायद संभव नहीं होगा. मगर इस पर अंतिम निर्णय राज्य सरकार ही लेगी.

Tags: Court, Raipur news, Reservation

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