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'मैंने खुद से खुद को पैदा किया', पढ़ें- एक परेशान लड़के के खूबसूरत लड़की बनने की कहानी

लड़का से लड़की बनी विद्या राजपूत ने अपने काम से समाज में अलग पहचान बनाई है.

लड़का से लड़की बनी विद्या राजपूत ने अपने काम से समाज में अलग पहचान बनाई है.

छत्तीसगढ़ के कोंडगांव में राजपूत परिवार में 1 मई 1977 को एक लड़के का जन्म हुआ. घर में खुशियां मनाई गईं. परवरिश भी वैसे ही शुरू हुई, जैसे कि एक लड़के की जाती है, लेकिन उस लड़के ने जब से होश संभाला खुद को वो मानने से इनकार कर दिया, जो घर और समाज वाले उसे मानते थे. लोग उसे लड़का कहते थे, लेकिन उसने खुद को लड़की ही माना. कुछ साल तक काफी परेशान रहा. फिर उसने कुछ ऐसा किया, जिससे अब उसकी समाज में अलग पहचान है.

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रायपुर. छत्तीसगढ़ सरकार के साल 2022 के कैलेंडर में सितंबर महीने के कवर पेज की चर्चा हर ओर हो रही है. न्याय व स्वावलंबन का छत्तीसगढ़ मॉडल की थीम पर छपे इस शासकीय कैलेंडर के सितंबर 2022 के कवर पेज पर 12 पुलिस कर्मी दिखाई दे रहे हैं. दरअसल ये पुलिसकर्मी ट्रांसजेंडर हैं, जिनकी भर्ती साल 2021 में पुलिस विभाग में हुई है. छत्तीसगढ़ पुलिस का पहली बार हिस्सा बने ट्रांसजेंडर के समूह का नेतृत्व करती हैं विद्या राजपूत. मितवा समिति के माध्यम से ट्रांसजेंडर के सम्मान और हक की लड़ाई लड़ने वाली विद्या की चर्चा तब छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश में हुई थी, जब उन्होंने पुलिस भर्ती में अगुआई की थी.

तृतीय लिंग कल्याण बोर्ड, छत्तीसगढ़ शासन की सदस्य विद्या राजपूत कहती हैं- “पहली बार छत्तीसगढ़ के शासकीय कैलेंडर में ट्रांसजेंडर पुलिस की तस्वीर छपी है. खाकी वर्दी में जनसेवा के लिए तैयार ट्रांस जेंडर पुलिस ग्रुप में 12 लोग तस्वीर में दिखाई दे रहे हैं. हमारी कम्युनिटी के लिए गर्व की बात है कि हमें राज्य के शासकीय कैलेंडर में स्थान मिला है. कैलेंडर में जब-जब लोग हमें देखेंगे, तब-तब समाज में सकारात्मक सोच सामने आएगी.”  दरअसल खुद की पहचान बनाने के लिए विद्या राजपूत ने घर-परिवार, समाज से लेकर देश तक काफी लंबा संघर्ष किया है.

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छत्तीसगढ़ शासन का साल 2022 के कैलेंडर के सितंबर महीने का कवर पेज.

अब सिर्फ बात नहीं होती है
विद्या राजपूत न्यूज 18 से बातचीत में कहती हैं- ‘तब सुकून मिलता है, जब समाज में जेंडर इक्वेलिटी के लिए कुछ काम भी हो रहे हैं, सिर्फ बात ही नहीं होती है. एलजीबीटीक्यू अब खुलकर सामने भी आने लगे हैं. सरकारी विभाग में नौकरी के साथ ही सामुदायिक भवन, मकान, जैसे कुछ शासकीय लाभ भी मिलने लगे हैं, लेकिन अब भी बराबरी के लिए बहुत कुछ करना है, कर रहे हैं.’

विद्या कहती हैं- ‘मां की कोख से मैंने जन्म भले ही 1 मई 1977 को लिया, लेकिन खुद के धरती पर होने का अहसास नहीं कर पाई. मुझे खुद के होने का अहसास तब हुआ, जब मैंने खुद से खुद को पैदा किया. मैंने उस जिंदगी को जीना शुरू किया, जिसे मैं अपने शरीर में महसूस करती थी. मां की कोख से तो मैं लड़का पैदा हुई, जिसका नाम विकास राजपूत था. वो विकास जो 10 साल की उम्र से ही खुद की उस पहचान से इनकार करने लगा था, जो परिवार और समाज वालों की नजर में उसकी थी.’

मैंने खुद को लड़की मान लिया
छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के फरसगांव में जन्मी विद्या कहती हैं- “मेरे घर और समाज वालों की नजर में मेरी चाल लोगों को खटकती थी. घर वाले टोकते थे, मोहल्ले वाले चिढ़ाते थे. लेकिन अंदर ही अंदर मैंने खुद को लड़की मान ही लिया था. ऐसा नहीं कि मैंने परिवार वालों से बात करने की कोशिश नहीं की. कई दफे बात की, लेकिन कोई माना नहीं. एक बार के लिए मन में आया कि क्यों न जिंदगी को ही खत्म कर लूं. काफी उलझनों के बाद मैंने ठान लिया कि मैं अपना सेक्स चेंज करवाऊंगी, आत्मा से लड़की हूं और अब शरीर से भी लड़की ही रहूंगी.”

पहले पैसे कमाए, फिर ऑपरेशन करवाया
विद्या बताती हैं कि सेक्स चेंज के ऑपरेशन के लिए काफी पैसे लगते. बचपन में ही पिता की मौत के बाद से परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तो मैंने सोचा पहले पैसा कमा लूं. आगे की पढ़ाई के लिए रायपुर आ गई. यहीं कुछ सालों तक अलग-अलग फर्मों में नौकरी की. पैसे इकट्ठा किए. इस दौरान सेक्स चेंज करने से जुड़ी जानकारियां जुटाती रही. फिर साल 2007 से मैंने सेक्स चेंज की प्रक्रिया शुरू करवाई. 2020 तक अलग-अलग चरणों में चार ऑपरेशन हुए.

मैंने अपने शरीर को पाया
विद्या कहती हैं- ‘जब मैं उस (सेक्स चेंज) ऑपरेशन में थी तब मेरे साथ कोई नहीं था. बहुत दर्द महसूस कर रही थी, लेकिन उस दर्द के ऊपर एक खुशी थी कि मैंने अपने शरीर को पाया. अब तक मैं दूसरे के शरीर में सफर कर रही थी, अब मैंने अपना चोला बदला है, मैंने लड़के का लिबास उतारकर लड़कियों का लिबास पहना, जो मुझे बचपन से पसंद था. उस ऑपरेशन के बाद मैं अपने आप से मिली. 2007 में रायपुर में कुछ लड़कों ने मेरी एक्टिविटी पर कमेंट किया, मैंने भी उन्हें जवाब दिया. उन्होंने मिलकर मुझसे मारपीट की. मेरी मां सरोज सिंह को बहुत तकलीफ हुई. मुझे लेकर उनकी चिंता इतनी बढ़ी कि वो मानसिक रोगी हो गईं. 2009 में वो हम सबका साथ छोड़ दुनिया से चली गईं.

मैं खुशनसीब हूं, अलग हूं
विद्या बातचीत में कहती हैं- ‘मैंने जिंदगी में काफी स्ट्रगल किया, समाज से परिवार से लोहा लिया. तब मुझे मेरी जिंदगी मिली है. मैं अलग हूं, मैं खुशनसीब हूं, क्योंकि मैं वो हूं, जो पुरुष और स्त्री दोनों की जिंदगी जी है. शुरू में परिवार वालों ने मेरा साथ कभी नहीं दिया, लेकिन अब मेरी बहन और उसके बच्चे खुलकर मेरे साथ हैं, वो कहते हैं कि हमें तुम पर गर्व है.’

अब प्यार और सम्मान दोनों मिलता है
विद्या राजपूत साल 2009 से एक सामुदायिक आधारित संगठन “मितवा समिति” चला रही हैं. पिछले कुछ सालों से शासकीय और गैर शासकीय संस्थाओं के लिए आमंत्रित प्रशिक्षक के रूप में भी काम कर रही हैं. ट्रांसजेंडर समुदाय से संबंधित कार्यक्रम के लिए NACO, HIV / AIDS के साथ संबद्ध विद्या की अब समाज में अलग पहचान के साथ ही कई सम्मान मिले हैं. विद्या नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल डिफेंस, भारत सरकार के ड्रग एब्यूज प्रिवेंशन प्रोग्राम में मास्टर ट्रेनर हैं. राज्य सरकार द्वारा पंडित रविशंकर शुक्ल सम्मान 2021,अलायंस इंडिया से राष्ट्रीय नेतृत्व पुरस्कार 2018, शाइनिंग स्टार्स, अनाम प्रेम, मुंबई महाराष्ट्र द्वारा पुरस्कार 2017 से विद्या को सम्मानित किया जा चुका है.

Tags: Raipur news, Transgender

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