सरकार के नियम बदलने से बदलेंगे दाखिले का अकाल झेल रहे इंजीनियरिंग कॉलेजों के हालात?

छत्तीसगढ़ में पिछले तीन सालों में इंजीनियरिंग की 40 फिसदी सीटें पर भी दाखिले नहीं हुए हैं.

निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: May 15, 2019, 4:49 PM IST
सरकार के नियम बदलने से बदलेंगे दाखिले का अकाल झेल रहे इंजीनियरिंग कॉलेजों के हालात?
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निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: May 15, 2019, 4:49 PM IST
छत्तीसगढ़ में पिछले पांच सालों से इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले का एक तरह से अकाल है. पिछले तीन सालों में तो 40 फिसदी सीटें पर भी दाखिले नहीं हुए हैं. ऐसे में निजी इंजीनियरिंग कॉलेज राज्य सरकार से दाखिले के नियम बदलने की मांग कर रहे हैं. इसके लिए बकायदा लिखित में आवेदन भी दिया गया है. निजी इंजीनियरिंग कॉलेज संचालकों को उम्मीद है कि लोकसभा चुनाव के लिए आचार संहिता समाप्त होने के बाद सरकार उनकी मांग मानेगी और कॉलेजों की स्थिति में सुधार होगा.

सरकार मांग मानकर नियम बदलेगी तो इससे दाखिले के हालात कितने बदलेंगे, इसे जानने की कोशिश करें, इससे पहले जान लेते हैं कि आखिर इंजीनियरिंग में दाखिले के किस नियम को बदलने की मांग छत्तीसगढ़ के निजी इंजीनियरिंग कॉलेज संचालक कर रहे हैं? इसके अलावा पिछले पांच सालों में छत्तीसगढ़ में दाखिले की स्थिति क्या है?



दरअसल कॉलेज संचालक इंजीनियंरिंग के बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग (बीई) कोर्स में दाखिले के लिए प्री इंजीनियरिंग टेस्ट (पीईटी) की बाध्यता तीन चरणों की काउंसलिंग प्रक्रिया के बाद समाप्त करने की मांग कर रहे हैं. कॉलेज संचालकों की मांग है कि दाखिले के लिए डायरेक्टोरेट ऑफ टेक्निकल एजुकेशन (डीटीई) द्वारा काउंसलिंग की प्रक्रिया पूरी कर लेने के बाद जो सीटें बचती हैं, उन सीटों पर कक्षा 12वीं पास विद्यार्थियों को सीधे दाखिले की अनुमति दे दी जाये. हालांकि इसके लिए 12वीं पास विद्यार्थियों की जो न्यूनतम योग्यता है, उसमें कोई बदलाव नहीं करने का प्रस्ताव भी दिया गया है.

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क्या है नियम?
अब तक दाखिले के जो नियम हैं, उसके अनुसार बीई में दाखिले के लिए विद्यार्थियों को कक्षा 12वीं की परीक्षा फिजिक्स, कैमेस्ट्री और मैथ्स में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक से पास करनी अनिवार्य है. इसके अलावा इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए आयोजित पीईटी या जेईई (ज्वाइंट एंट्रेस्ट टेस्ट) में शामिल होने की भी अनिवार्यता है. प्री टेस्ट की मेरिट के आधार पर काउंसलिंग में कॉलेज वाइज सीटें एलॉट की जाती हैं. डीटीई के ज्वाइंट डायरेक्टर डॉ. अजय कुमार गर्ग ने बताया कि इस संबंध में आवेदन मिले हैं. शासन स्तर पर इसको लेकर निर्णय होना है.

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क्यों बदलवाना चाहते हैं नियम?
छत्तीसगढ़ के एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज (एपीक) के पूर्व अध्यक्ष और संजय रूंगटा कॉलेज समूह के चैयरमैन संजय रूंगटा न्यूज 18 से बातचीत में कहते हैं कि प्रदेश में इंजीनियरिंग में दाखिले की जो स्थिति है, उसमें सुधार के लिए कुछ नियमों में बदलाव जरूरी है. आंध्र प्रदेश सहित दूसरे प्रदेशों में 12वीं पास विद्यार्थियों को सीधे दाखिले के नियम हैं. हमने उन्हीं प्रदेशों का उदाहरण देकर नियम में बदलाव की मांग की है.

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एपीक के अध्यक्ष शरद शुक्ला कहते हैं कि अब तक सरकार द्वारा पीईटी को लेकर जो मार्केटिंग की जानी चाहिए थीं, वो नहीं हुई है. ऐसे में ग्रामीण व दूरस्थ इलाकों में कई ऐसे बच्चे रहते हैं, जो बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग तो करना चाहते हैं, लेकिन प्री टेस्ट नहीं देने के कारण उन्हें मौका नहीं मिलता है. पिछले कुछ सालों से बड़ी संख्या में सीटें भी खाली रहती हैं. इसको ध्यान में रखकर ही हमने सरकार से लिखित में मांग की है. उम्मीद है कि सरकार हमारी मांगों को मानेगी.

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कितने बदलेंगे हालात?
छत्तीसगढ़ में टॉप इंजीनियरिंग कॉलेजों में शुमार भिलाई इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटी), दुर्ग के प्राचार्य डॉ. अरुण अरोरा का मानना है कि जिस नियम को बदलने की मांग की जा रही है, उसका बहुत ज्यादा हालात नहीं बदलेंगे. क्योंकि प्रदेश में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या औसतन 100 से भी कम होती है, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना चाह रहे हों और उन्होंने पीईटी और जेईई दोनों ही न दिये हों. पिछली बार जेईई में कटअफ 35 से कम कर शून्य कर दिया गया था. इसका कोई ज्यादा लाभ नहीं मिला.

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क्वालिटी पर फोकस हो, क्वांटिटी पर नहीं
दुर्ग यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति और शिक्षाविद डॉ. नरेन्द्र प्रताप दीक्षित कहते हैं कि दाखिले के नियम को सरल करने से शैक्षणिक स्तर पर इंजीनियरिंग के हालात में सुधार होता नहीं दिखता. हां इस दाखिले के नियम को सरल कर कॉलेजों की आर्थिक स्थिति में सुधार जरूर हो सकता है. इंजीनियरिंग के हालात में सुधार के लिए क्वालिटी एजुकेशन पर फोकस करने की जरूरत है. यदि योग्य विद्यार्थी पढ़ाई करेंगे तो वे उस क्षेत्र में सफल भी होंगे. साथ ही हालात सुधारने के लिए जॉब ऑपरच्यूनिटी बढ़ने की भी जरूरत है. वर्तमान स्थिति में देखा जा रहा है कि स्टूडेंट की क्वालिटी की जगह क्वांटिटी पर अधिक फोकस किया जा रहा है, जिसका परिणाम हम सभी के सामने है.
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