छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव: 2018 के अखाड़े में क्या टूटेंगे ये मिथक?

छत्तीसगढ़ की राजनीति में कुछ अजीबोगरीब मिथक भी प्रचलित हैं. ये सारे मिथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद साल 2003 में हुए पहले चुनाव के बाद प्रचलित हुए हैं.

निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: December 11, 2018, 2:46 AM IST
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव: 2018 के अखाड़े में क्या टूटेंगे ये मिथक?
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निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: December 11, 2018, 2:46 AM IST
छत्तीसगढ़ की राजनीति में कुछ अजीबोगरीब मिथक भी प्रचलित हैं. ये सारे मिथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद साल 2003 में हुए पहले चुनाव के बाद प्रचलित हुए हैं. मसलन जो नेता प्रतिपक्ष होते हैं, वे उसके बाद के चुनाव में नहीं जीत पाते हैं. यही मिथक विधानसभा अध्यक्ष को लेकर भी है. इतना ही नहीं, पंचायत मंत्री और महिला एवं बाल विकास मंत्री के भी दूसरी बार चुनाव नहीं जीतने के किस्से प्रचलित हैं.

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छत्तीसगढ़ में दो चरणों में 12 और 20 नवंबर को हुए मतदान के बाद अब सबको इंतजार 11 दिसंबर को आने वाले चुनाव परिणाम का है. ऐसे में इस बार इन मिथकों के टूटने या न टूटने को लेकर भी चर्चाएं हैं. सबसे अधिक चर्चा नेता प्रतिपक्ष को लेकर है. क्योंकि इस बार कांग्रेस में सीएम के प्रबल दावेदार माने जाने वाले ​टीएस सिंहदेव 2013 चुनाव के बाद नेता प्रतिपक्ष थे.​

पीसीसी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे रामदयाल उइके ने चुनाव के दौरान ही भाजपा में प्रवेश कर लिया. इसके बाद पीसीसी चीफ भूपेश बघेल ने यह कहकर नई बहस छेड़ दी कि उइके जिस पार्टी में रहते हैं, उसकी सरकार नहीं बनती. उइके जब भाजपा के विधायक थे, तब मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी. राज्य निर्माण के बाद 2000 में उइके कांग्रेस में शामिल हो गए और अजीत जोगी के लिए मरवाही सीट छोड़ दी. जोगी ने उन्हें पाली तानाखार से कांग्रेस का टिकट दिया.

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नेता और सीटों को लेकर ये मिथक
रामदयाल उइके लगातार तीन बार से पाली तानखार सीट से विधायक रहे, लेकिन सरकार भाजपा की है. कोरबा सीट के बारे में भी कहा जाता है कि वहां जिस पार्टी का विधायक होता है, उसकी सरकार नहीं होती. कोरबा से पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस के जयसिंह अग्रवाल विधायक हैं, लेकिन सरकार भाजपा की बनी.
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विधानसभा अध्यक्ष को लेकर ये मिथक
राज्य बनने के बाद जब कांग्रेस की सरकार बनी थी, तब पं. राजेंद्र प्रसाद शुक्ल विधानसभा अध्यक्ष बनाए गए थे. 2003 में जब पहली बार चुनाव हुए तब कांग्रेस की सरकार चली गई, लेकिन शुक्ल को जीत मिली थी. राज्य बनने के बाद चुनाव प्रक्रिया से बनी पहली सरकार में प्रेम प्रकाश पांडेय विधानसभा अध्यक्ष थे. 2008 के चुनाव में उन्हें हार मिली. इसके बाद 2008 से 2013 की सरकार में धरमलाल कौशिक विधानसभा अध्यक्ष थे. 2013 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 2013 से 18 की सरकार में गौरीशंकर अग्रवाल विधानसभा अध्यक्ष थे. इस चुनाव में अपनी कसडोल सीट से ही मैदान में हैं.

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नेता प्रतिपक्ष को लेकर ये मिथक
राज्य अलग होने के बाद विधायकों की संख्या के आधार पर कांग्रेस की सरकार बनी. भाजपा ने आदिवासी नेता नंदकुमार साय को नेता प्रतिपक्ष बनाया. 2003 में राज्य विधानसभा चुनाव में साय मरवाही सीट से अजीत जोगी के खिलाफ उतरे लेकिन हार गए. 2003 में कांग्रेस ने महेंद्र कर्मा को नेता प्रतिपक्ष बनाया. 2008 के चुनाव में कर्मा भाजपा के भीमा मंडावी से हार गए. 2008 में रविंद्र चौबे नेता प्रतिपक्ष बनाए गए. 2013 के चुनाव में उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा.

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पंचायत मंत्री को लेकर ये मिथक 
अजीत जोगी की सरकार में अमितेष शुक्ल को पंचायत मंत्री बनाया गया. अमितेष अगला चुनाव हार गए. पहली बार जब भाजपा सरकार बनी तो अजय चंद्राकर पंचायत मंत्री बने. उन्हें भी 2008 में हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद रामविचार नेताम पंचायत मंत्री बनाए गए. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने विधानसभा चुनाव से सालभर पहले 2012 में नेताम और हेमचंद यादव के प्रभार बदल दिए थे. हेमचंद को पंचायत मंत्री बनाया गया था. 2013 में नेताम और यादव दोनों ही चुनाव हार गए.

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इन सीटों पर दूसरी बार कोई नहीं जीता
-2013 के चुनाव तक अभनपुर में धनेंद्र साहू और चंद्रशेखर साहू पांच बार के प्रतिद्वंद्वी रहे. हर बार ये बदले गए. इस चुनाव में भी दोनों आमने सामने हैं.
-जांजगीर-चांपा में एक बार कांग्रेस के मोतीलाल देवांगन जीतते हैं तो एक बार भाजपा के नारायण चंदेल. इस बार भी दोनों नेता आमने सामने हैं.
-बिलासपुर की बिल्हा सीट पर भी सियाराम कौशिक और धरमलाल कौशिक एक-एक बार विधायक बनते हैं. इस बार सियाराम कौशिक कांग्रेस का साथ छोड़ अजीत जोगी की पार्टी से मैदान में हैं.

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