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डॉ.गणेश खरे: कोरोना ने डूबा दिया साहित्य के आकाश का एक दिव्य सितारा

डॉ. गणेश खरे.

डॉ. गणेश खरे.

छत्तीसगढ़ प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार डा.गणेश खरे (85) का 26 दिसम्बर 2020 को कोरोना से रायपुर के एक निजी चिकित्सालय में ...अधिक पढ़ें

छत्तीसगढ़ प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार डा.गणेश खरे (85) का  26 दिसम्बर 2020 को कोरोना से रायपुर के एक निजी चिकित्सालय में मृत्यु हो गई. यह खबर सुनकर मन बड़ा दुखी हुआ. डॉ.खरे साहित्य के एक कर्मवीर, एकांत-साधक थे. उनके निधन से राजनांदगांव सहित छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की अपूरणींय क्षति हुई है. उन्होंने आजीवन साहित्य-साधना की. सहज, सरल, सदा विनम्र किन्तु गंभीर व्यक्तित्व के धनी थे. उनकी प्रतिभा के आभा मंडल से नई पीढ़ी को ऊर्जा मिलती थी. वे उनके लिए प्रेरणा स्त्रोत बने रहे. उच्च शिक्षा में उनका सकारात्मक योगदान रहा. अनेक विश्वविद्यालयों में उनकी किताबें पाठ्यक्रम में शामिल की गई.

तीन बड़ी साहित्यिक हस्तियां
महाविद्यालय में अध्यापकीय सेवा के दौरान उन्हें देश के सुविख्यात साहित्यकार सरस्वती के संपादक एवं निबंधकार डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, सुप्रसिद्ध प्रगतिशील कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के साथ काम करने का अवसर मिला. मानस मनीषी और ‘तुलसी-दर्शन’ (हिंदी के प्रथम शोध-प्रबंध) के उदभट विद्वान डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र के भी आप निकट थे. राजनांदगांव में साहित्य की ये तीनों विभूति त्रय थे. इनकी देश-प्रदेश की बड़ी साहित्यिक हस्तियों में गिनती थी. दिग्विजय महाविद्यालय-राजनांदगांव में देश के बड़े-बड़े साहित्यकारों का आवागमन बना रहता था. साहित्यिक आयोजन भी होते रहते थे. फलत: नगर में भी साहित्य का अच्छा माहौल रहा है.

ताजा हो जाती हैं यादें
राजनंदगांव में दिग्विजय कालेज के पीछे रानी सागर और बूढ़ा सागर के बीच बना त्रिवेणी-परिसर उनकी स्मृतियों को ताजा कर देता है. उन दिनों डॉ. गणेश खरे इसी कालेज में हिंदी के व्याख्याता थे. अनेक वर्षों तक मध्य प्रदेश साहित्य परिषद-भोपाल के द्वारा उक्त तीनों साहित्य रत्नों के व्यक्तित्व और कृतित्वों पर केन्द्रित दो दिवसीय गरिमापूर्ण साहित्यिक आयोजन होते थे. इन आयोजनों में डॉ.गणेश खरे को विशेष दायित्व मिलता था. इसमें राष्ट्रीय, प्रदेश स्तरीय एवं स्थानीय साहित्यकारों को भी आमंत्रित किया जाता था. छ्त्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद ऐसे आयोजनों पर मानों विराम ही लग गया.

एक साहित्यिक जीवन-यात्रा
डॉ.गणेश खरे का जन्म 15 जनवरी सन 1937 को मध्य प्रदेश के केवलारी,जिला-दमोह(बुन्देलखंड) में हुआ था. आपने सागर यूनिवर्सिटी से एमए,हिंदी साहित्य पर गोल्ड मेडल अर्जित किया था. डॉ.नंददुलारे बाजपेयी पर थीसिस लिखकर पीएचडी से विभूषित हुए, एलएलबी भी किया. दिग्विजय महाविद्यालय-राजनांदगांव में हिंदी के व्याख्याता थे. विगत पांच दशकों से यही उनकी कर्मभूमि थी. आपने  34  वर्षों तक स्नातक एवं 30 वर्षों से अधिक स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन किया. दो दर्जन से अधिक पी.एच.डी.शोध का मार्ग निर्देशन किया. 1997 में शासकीय महाविद्यालय के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए.  डॉ.खरे ने अपने जीवनकाल में  14 उपन्यास, 11 समीक्षात्मक साहित्य ग्रंथ, हिन्दी व्याकरण और भाषा की 06 पुस्तकें, 03 नाटक और 45 एकांकी, 06 काव्य संकलन, 05 लघु कहानी लिखा. उनकी 07 किताबों का प्रकाशन शेष हे.

ऐतिहासिक उपन्यास
डॉ.खरे ने वर्ष 1956-57 से लिखना प्रारंभ किया था.  प्रसाद के प्रगीत, आधुनिक प्रगीत काव्य, युग कवि प्रसाद, आधुनिक काव्य प्रवृत्तियां, हिंदी के प्रमुख निबंधकार, मुक्तिबोध व्यक्ति और पात्र, भारतीय और पाश्चात्य समीक्षा आदि उनके समीक्षा ग्रंथ हैं. आपने सुप्रसिद्ध स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, जननेता और छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से विख्यात, माटी के महान सपूत त्यागमूर्ति ठा.प्यारेलाल की जीवनी पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास ‘क्रान्तिदूत’ लिखा और चर्चित हुए. ‘क्रान्तिदूत’ के संबंध में डॉ.धनंजय ने  लिखा है-‘’रचना विधान में सपाट है लेकिन इसमें घटनाओं की अन्तर्वाही शक्तियों को बड़ी कुशलता से चित्रित किया गया है. वस्तुत: जिस इतिहास द्दष्टि की स्थापना इस उपन्यास के माध्यम से डॉ.खरे ने करना चाहा है,उसमें वे पूरी तरह से सफल हैं.
’’आपका ‘बालार्जुन’ एक उच्च कोटि का ऐतिहासिक उपन्यास है जो आचार्य हजारीप्रसाद द्वेवेदी की ‘बाणभट्ट’ की आत्म-कथात्मक शैली में है. इसमें उन्होने लिखा है कि वर्तमान मध्यप्रदेश के दक्षिणी पूर्वी अंचल कोसल या दक्षिणी कोसल कहा जाता था.तब उसमें छत्तीसगढ़ के रायगढ़, बिलासपुर, अंबिकापुर दुर्ग एवं राजनंदगांव जिलों के साथ-साथ उडीसा का पश्चिमी भाग (संबलपुर जिला–प्राककोसल) भी सम्मिलित था. श्रीपुर इसी विशाल भू-भाग की राजधानी थी.

माता कौशल्या और छत्तीसगढ़
डा.खरे आगे लिखते हैं कि श्रीराम की मां कौसल्या के पिताश्री राजा भानूमंत इसी अंचल के शासक थे. इसी भू-भाग के मूर्धन्य श्रृंगी ऋषि ने राजा दशरथ के पुत्र-यज्ञ में प्रमुख पुरोहित का कार्य संपादित किया था. यही बलमदेही (मूल नाम वाल्मिकी का आश्रम) था. महाधनुर्धर अर्जुन ने अपने एक वर्ष के वनवासकाल की अवधि इसी श्रीपुर में ही व्यतीत की थी और यहाँ की राजकुमारी चित्रांगदा से परिणय किया था.

बालार्जुन का कार्यकाल: छत्तीसगढ़ का स्वर्णयुग
महात्मा बुद्ध ने भी तीन माह तक श्रीपुर में रहकर यहाँ की जनता को प्रबोधित किया था. महान बोधिसत्व, रसायनविद तथा प्रकांड पंडित दार्शनिक नागार्जुन की जनम स्थली होने का गौरव भी श्रीपुर को प्राप्त है, छठवीं-सातवीं शताब्दी में उत्तराधिपति सम्राट हर्षवर्धन तथा पुलकेशिन द्वितीय के समसामयिक पांडूवंशी बालार्जुन के शासनकाल में श्रीपुर का वैभव अपने चरम शीर्ष पर था. चीनी यात्री ह्वेनसांग भी बालार्जुन के कार्यकाल में तीन माह तक श्रीपुर में रहे थे. उन्होंने यहाँ की तत्कालीन व्यवस्था और वैभव के संस्मरण अपने यात्रा विवरण में प्रस्तुत किया है.

हर्ष तथा पुलकेशिन द्वितीय-जैसी दो महान शक्तियों के बीच लगातार 60 वर्षो (595 से  655 ई.तक) तक बालार्जुन का एक वृहत भू-भाग पर शासन उसके शौर्य, पराक्रम, प्रशासकीय क्षमता, दूरदर्शिता, का स्वत:प्रमाण है.इस उपन्यास में उसी के जीवन तथा कृतित्व के विविध पक्षों के माध्यम से वस्तुत:छत्तीसगढ़ के स्वर्णयुग के बहुआयामों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है.

‘जाजल्यदेव कीर्ति’ उपन्यास
डॉ.गणेश खरे के ऐतिहासिक उपन्यासों की कड़ी में ‘जाजल्यदेव कीर्ति’ उपन्यास भी विशिष्ठ है. सोमवंशीय सम्राट महाशिव गुप्त बालार्जुन (6वीं शताब्दी) के बाद जाजल्यदेव प्रथम ने ही पहली बार दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक गरिमा एवं आध्यत्मिक ऊर्जा का संवर्धन किया है. इस उपन्यास में उनकी ही कीर्ति है. इसकी  ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संबंध में लेखक ने लिखा है कि भारत के विभिन्न प्रदेशों पर कलचुरी वंश के राजाओं का शासन 550 ई.से प्रारंभ हुआ था. पहले माहिष्मती, फिर त्रिपुरी ततपश्चात रतनपुर शाखा के द्वारा उनका राज्यकाल  1750  ई. अर्थात लगभग 1200  वर्षों तक निरंतर चलता रहा. दक्षिण कोसल में उनका शासन एक हजार ई. के लगभग प्रारंभ हुआ, पहले तुममाण  और रतनपुर में ततपश्चात  15वीं शताब्दी से खलारी और रायपुर में भी पीढ़ी दर पीढ़ी यह शासन चलता रहा. 1750 ई. के बाद मराठों ने आक्रमण कर इस वंश का शासन समाप्त कर दिया. इस तरह केवल दक्षिण कोसल में इस वंश के राजाओं ने  750 वर्षों तक शासन किया है.

रतनपुर में प्राप्त शिलालेख
इतने लंबे समय तक किसी एक ही वंश के राजाओं द्वारा एक ही अंचल में राज्य करना विश्व इतिहास की यह पहली घटना है. यह दूसरी बात है कि रतनपुर के कलचुरियों के राज्य की सीमायें कभी बढती और कभी सिकुडती रहीं पर उनकी प्रमुख राजधानी रतनपुर में ही रही. जाजल्यदेव ने अपने शासनकाल में जाजल्यपुर (जांजगीर) नामक नया नगर बसाया. वहाँ अत्यंत भव्य विष्णु मंदिर बनवाया. पाली जैसे अनेक मन्दिरों का पुनरूद्धार किया. शस्त्र और शास्त्र के के प्रचार–प्रसार के विद्यापीठ प्रारंभ किये, साहित्य और ललित कलाओं के विकास में योगदान दिया. उसने अपने राजदरबार में विद्वानों, कवियों और दूर-दूर से आने वाले ब्राह्मणों को भी आश्रय दिया. उसके राज्य में राम-राज्य जैसा वातावरण था. उसके इन्हीं सारे कार्यों को ध्यान में रखते हुए एक शिलालेख(रतनपुर में प्राप्त)तैयार किया गया था,जिसमें लिखा गया था कि “सारी पृथ्वी में क्या ऐसा राजा आपने कभी देखा या सुना है.’’

अन्य उपन्यास, लोक-गीत, खंड काव्य    
डॉ. खरे ने सन 1983 में ‘सर्वप्रथम सतनाम’ खंड काव्य लिखा था जिसकी विद्वानों ने बड़ी प्रशंसा की थी. उसके 31 वर्ष बाद ‘महात्मा घासीदास ’उपन्यास लिखा गया. महात्मा गुरू घासीदास छत्तीसगढ़ के पूज्य संत रहे हैं. उनका उपदेश पूरी मानवता के लिए है. उनके अन्य उपन्यास हैं-जशपुर, दुर्लभ की खोज, एक हाथ की ताली, यथावत, सृजन-पथ, शेष-अशेष आदि. हिंदी भाषा से संबंधित उनकी कृतियाँ है-व्यावहारिक हिंदी, सामान्य हिंदी-ज्ञान, हिंदी भाषा मानक हिन्दी आदि. सतनाम(खंड-काव्य), हाथ व्यर्थ वे, भूलन वन ये सभी काव्य संग्रह हैं. आप प्रारंभ में बुन्देलखंडी लोक गीतों के रचयिता रहे हैं. आपने सभी साहित्य की विधाओं में रचनाएं की हैं. अन्य ग्रन्थों में विश्व की भावी संस्कृति के प्रणेता-स्वामी सत्यानन्द सरस्वती, पर्यटन का स्वर:छत्तीसगढ़, नव साक्षर साहित्य के अंतर्गत 40 से अधिक पुस्तकें हैं. इनमें से अनेक राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हैं.

उत्तर मुक्तिबोध (संकलन,संपादन)
राजनंदगांव के साहित्यकारों का एक काव्य–संकलन ‘उत्तर मुक्तिबोध’ का सन 2015 उन्होंने प्रकाशन एवं संपादन किया था जिसमें गीत, नव-गीत, कविताएँ, मुक्तक, गजल, दोहे, व्यंग्य ,कहानियाँ ,लघु कथाएँ सब का समावेश किया गया था. कुल तेरह रचनाकारों की रचनाओं को स्थान दिया गया. इनमें शत्रुघन सिंह राजपूत के नव-गीत एवं व्यंग्य कविता प्रकाशित की गई. इस संकलन के ‘‘दो शब्द’’ में डॉ. खरे ने  लिखा है-मुझे मुक्तिबोध सहित उनके यहाँ के समवर्ती सभी साहित्यकारों की लगभग सारी कृतियों को पढने का अवसर मिला है, प्राय:सभी पर पी.एच.डी.के शोध कार्य भी सम्पन्न कराए हैं अत; उन्होंने अपना यह दायित्व समझा कि इस नगर में मुक्तिबोध के बाद के इन चालीस वर्षो में किस प्रकार का साहित्य-लेखन हो रहा है, उसका भी एक द्दश्य प्रस्तुत किया जाये और यह उसी  श्रंखला की एक कड़ी है.

अभिमत
विद्यार्थी  जीवन से ही इस लेखक का संपर्क डॉ.गणेश खरे से रहा है. समय-समय पर उनका मार्गदर्शन भी मिलता रहा है. सन 2008 में इस लेखक (शत्रुघन सिंह राजपूत) के बाल-काव्य संकलन पर उनका अभिमत आशीर्वाद के रूप में मिला है उसकी कुछ पंक्तियाँ हैं- ‘शत्रुघन सिंह राजपूत छत्तीसगढ़ी भाषा में ‘दूरद्रष्टा’के नाम से विगत एक दशक से भी अधिक समय से लिखते आ रहे मूलत:एक व्यंगकार–पत्रकार है. अपने कबीर चंवरा स्तंभ में उन्होंने बड़े-बड़ों का मुंजरा लिया है नियमित स्तंभ लेखन में एक यांत्रिकता आ जाती है और कभी-कभी लेखन की विवशता एक बोझ भी बन जाती है पर ये विसंगतियां उनकी इन रचनाओं में विरलता से ही मिलती है.’’
(लेखक साहित्याकार और लेखक हैं, ये उनके निजी विचार हैं.)

Tags: Chhattisgarh news, Raipur news

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