इन Political Families के ईर्द-गिर्द घूमती है छत्तीसगढ़ की राजनीति, रखते है खास रसूख

राजनीतिक परिवारों का हमेशा से ही सूबे की राजनीति में एक अलग रूतबा रखा है. यहां एक ही परिवार की कई पीढ़ियां राजनीति में है और उन्होने आवाम के बीच अपना एक अलग ओहदा भी कायम किया है.

News18 Chhattisgarh
Updated: December 1, 2018, 12:11 PM IST
इन Political Families के ईर्द-गिर्द घूमती है छत्तीसगढ़ की राजनीति, रखते है खास रसूख
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Updated: December 1, 2018, 12:11 PM IST
छत्तीसगढ़ की राजनीति की एक दिलचस्प बात है यहां के राजनीतिक परिवार. राजनीतिक परिवारों का हमेशा से ही सूबे की राजनीति में एक अलग रूतबा रखा है. यहां एक ही परिवार की कई पीढ़ियां राजनीति में है और उन्होने आवाम  के बीच अपना एक अलग ओहदा भी कायम किया है. कुछ परिवारों ने विरासत में मिली इस सिसायत को बखूबी निभाया तो वहीं कुछ के हाथों के सियासत निगल गई है. छत्तीसगढ़ की राजनीति में राजनीतिक परिवारों का रसूख लगातार बढ़ता ही रहा है. छत्तीसगढ़ की राजनीति में वंशवाद का आरोप लगाता ही रहा है. ये आरोप पहले कांग्रेस पर लगा लेकिन अब भाजपा भी इसके लपेटे में आ गई है. आलाम तो ये है कि छोटे दलों में भी परिवारवाद चला आ रहा है. तो आइए जानते है इन राजनीतिक परिवारों के बारे में...

शुक्ल परिवार

छत्तीसगढ़ की राजनीति में शुक्ल परिवार का नाम काफी बड़ा है. पंडित रविशंकर शुक्ल मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रहे. उनके बाद उनके बड़े बेटे पंडित श्यामाचरण शुक्ल ने तीन बार मुख्यमंत्री की कमान संभाली, जबकि छोटे बेटे पं. विद्याचरण शुक्ल केंद्र में भी लगातार मंत्री रहे. श्यामाचरण शुक्ल के बेटे अमितेष शुक्ल राजिम से विधायक और फिर पंचायत मंत्री बने. इस क्षेत्र में इनकी राजनीतिक सक्रिय कायम है.

सिंहदेव परिवार

चंडीकेश्वर शरण सिंहदेव 1952 में पहली बार विधायक बने थे. बाद में उनकी पत्नी देवेंद्र कुमारी विधायक और मंत्री बनीं. उनके बेटे यूएस सिंहदेव भी सक्रिय रहे. अंबिकापुर सीट से लगातार दो बार टीएस सिंहदेव विधायक बने. फिलहाल वे छत्तीसगढ़ में कांग्रेस केनेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. टीएस सिंहदेव इस बार भी अम्बिकापुर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ रहे है. हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह उनके मौसा हैं. उनकी बहन आशादेवी वहां मंत्री रही हैं.

वोरा परिवार

मोतीलाल वोरा मध्यप्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे. मोतीलाल वोरा का परिवार भी सूबे के अहम परिवारों में से एक है. वोरा को हमेशा से ही गांधी परिवार के करीबी माना जाता रहा है. मोतीलाल बोरा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में लंबे समय तक कोषाध्यक्ष रहे. उनके बेटे अरूण वोरा दुर्ग शहर से विधायक हैं.
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जोगी परिवार

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पहले कलेक्टर थे. प्रशासनिक सेवा छोड़ वे राजनीति में आए. जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बना तब वे पहले मुख्यमंत्री बने. कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होने अपनी अलग पार्टी बना ली. उनकी पत्नी डॉ. रेणु जोगी, बेटा अमित जोगी और अब ऋचा जोगी भी राजनीति में आ गई हैं. देखा जाए तो पूरा परिवार राजनीति में सक्रिय है.

कर्मा परिवार

बस्तर टाइगर के नाम से स्व. महेंद्र कर्मा मशहूर थे. उनके बाद उनकी पत्नी देवती कर्मा विधायक बनी. इस बार के विधानसभा चुनाव में देवती कर्मा दंतेवाड़ा से कांग्रेस की प्रत्याशी हैं. बड़े बेटे दीपक कर्मा नगर पंचायत अध्यक्ष हैं, जबकि छोटे बेटे छविंद्र मां भी राजनीति में सक्रिय है.

कश्यप परिवार

स्व. बलिराम कश्यप दादा के नाम से प्रसिद्ध थे. उन्होने भाजपा की राजनीति का नेतृत्व भोपाल से लेकर दिल्ली तक किया. बस्तर में बीजेपी को स्थापित करने का श्रेय उन्ही को जाता है. उनके बेटे केदार कश्यप नारायणपुर से विधायक और केबिनेच मंत्री भी है तो उनके बड़े बेटे दिनेश कश्यप सांसद है. इस बार के विधानसभा चुनाव में भी केदार कश्यप नारायणपुर से बीजेपी प्रत्याशी बनाए गए है.

सिंह परिवार

छत्तीसगढ़ में लगातार तीन बार से मुख्यमंत्री बने डॉ. रमन सिंह भले ही राजनीतिक परिवार से नहीं आते. लेकिन अब उनका परिवार भी राजनीति में सक्रिय ही है. डॉ. रमन सिंह इस बार भी राजनांदगांव से बीजेपी के प्रत्याशी है. उनके बेटे अभिषेक सिंह राजनांदगांव से सांसद है. उनकी बेटी स्मिता के भी राजनीति में प्रवेश करने की खबरें आ रही थी.

जूदेव परिवार

जशपुर में जूदेव परिवार का एक अलग रूतबा है. आदिवासियों के पैर धोकर घर वापसी कराने के आंदोलन के लिए दिलीप सिंह जूदेव देशभर में मशहूर हुए. दिलीप सिंह जूदेव का परिवार रायगढ़-जशपुर इलाके में प्रभाव रखता है. दिलीप सिंह जूदेव लोकसभा और राज्यसभा में सांसद रहे. उनके बेटे यूद्धवीर सिंह जुदेव चंद्रपुर से विधायक हैं. तो वहीं रणविजय सिंह जूदेव राज्यसभा सदस्य हैं.

महंत परिवार

पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत फिलहाल कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के सदस्य. इनके पिता बिसाहूदास महंत मध्यप्रदेश में मंत्री रहें.

अग्रवाल परिवार

लखीराम अग्रवाल को छत्तीसगढ़ भाजपा का पितृ पुरुष माना जाता है. उनके बाद अब उनके बेटे अमर अग्रवाल राजनीति में सक्रिय हैं. वे तीन बार से मंत्री हैं. अमर बिलासपुर के साथ अपने पैतृक क्षेत्र खरसिया में प्रभाव रखते हैं. इस बार के विधानसभा चुनाव में भी वे बिलासपुर से बीजेपी उम्मीदवार हैं.

चौबे परिवार

पूर्व नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे भी राजनीतिक परिवार से नाता रखते है. चौबे के पिता देवीप्रसाद चौबे, उनकी मां कुमारी चौबे और बड़े भाई प्रदीप चौबे भी विधायक रहें. रविंद्र चौबे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मंत्री रहें. वे नेता प्रतिपक्ष भी रहे और अभी भी राजनीति में सक्रिय है.

इनका भी रहा छत्तीसगढ़ की राजनीति में रूबाब

- कोंटा के कांग्रेस विधायक कवासी लखमा के बेटे हरिश भी राजनीति में सक्रिय है.

- पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम के भाई से लेकर पत्नी और बेटी तक चुनावी मैदान में रहे.

- चार बार सांसद रहे मानकू राम सोढ़ी का परिवार भी राजनीति में सक्रिय रहा. उनके बेटे शंकर सोढ़ी मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहे.

- दुर्ग में छत्तीसगढ़ की राजनीति के बड़े चेहरे रहे वासुदेव चंद्राकर की पुत्री प्रतिमा चंद्राकर कांग्रेस की विधायक रहीं.

- बिंद्रानवागढ़ में भाजपा के बलराम पुजारी विधायक थे, अब उनके बेटे डमरूधर पुजारी उनकी विरासत संभाल रहे है.

- बालोद में कांग्रस की राजनीति झुमुकलाल भेड़िया चलाते रहे. उनकी पत्नी, भतीजे उनकी परंपरा आगे बढ़ा रहे है.

- सतनामी राजनीति की शुरूआत मिनीमाता से होती है. उनके पति बाबा अगमदास सांसद रहे. मिनीमाता भी सांसद रहीं. अगमदास की दूसरी पत्नी कौशल माता के बेटे विजय और रूद्र गुरू अब कांग्रेस की राजनीति में हैं और विधायक रह चुके है.

- गुंडरदेही सीट पर दयाराम साहू भाजपा के विधायक थे। पिछली बार उनकी टिकट काटकर उनकी पत्नी रमशीला को टिकट दी गई.

- धर्मजयगढ़ में चनेशराम राठिया कांग्रेस की सरकार में मंत्री रहे, अब उनके बेटे लालजी राठिया विधायक है.

- बिन्द्रानवागढ़ से बलराम पुजारी विधायक थे. उनके बेटे डमरूधर पुजारी भी विधायक बनें.

- अरविंद नेताम इंदिरा गांधी सरकार में मंत्री रहें. पत्नी छबीला भी सांसद रहीं. भाई शिव नेताम दिग्विजय सरकार में मंत्री रहें. बेटी डॉक्टर प्रीति नेताम राजनीति में आई लेकिन असफल रहीं.

- स्वर्गीय मनकुराम सोढ़ी मंत्री, फिर सांसद रहें. बेटे शंकर सोढ़ी पहले दिग्विजय फिर अजीत जोगी सरकार में मंत्री रहें. 2003 में शंकर का टिकट कटा और सोढ़ी परिवार के राजनीतिक कैरियर में एक तरीके से ब्रेक लग गया.

- खैरागढ़ से विधायक और राजनांदगांव से सांसद रहे देवव्रत सिंह की दादी पद्मावती देवी मंत्री रहीं. पिता रविन्द्र बहादुर और मां रश्मि सिंह विधायक रहीं. कांग्रेस छोड़ चुके देवव्रत सिंह इसबार खैरागढ़ से जेसीसीजे के प्रत्याशी है.
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