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'नक्‍सलगढ़' में बसे इस गांव तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देता है विकास

लाल आतंक और पुलिसिया खौफ में जी रहे इन गावों के आदिवासियों की ख्वाहिश सिर्फ इतनी है कि वे सुकून से जी सकें.

    छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेश में विकास के तमाम दावे करती है. सरकार का दावा है कि हर क्षेत्र में विकास पोषित हो रहा है, लेकिन न्यूज 18 हिंदी पर आज हम लाल आतंक के साये में बसे गांवों की स्याह हकीकत बताने जा रहे हैं. घोर माओवाद (नक्‍सल) प्रभावित ​बीजापुर जिले में बसा एक गांव है मेटापाल. कुछ लोग इसे रेड कॉरिडोर या लालगढ़ भी कहते हैं.

    बीजापुर मुख्यालय से हम रेड कॉरिडोर कहे जाने वाले इलाके मेटापाल के लिए निकले तो पाया कि बीजापुर से 25 किलोमीटर दूर गंगालुर तक फोर्स हर चप्पे पर मुस्तैद रहती है. इसके बाद गंगालुर से मेटापाल के बीच से एक नदी गुजरती है. इस नदी का नाम बड़ी नदी है. ये नदी लोकतंत्र और लालतंत्र के बीच एक तरह से लाइन आॅफ कंट्रोल का काम करती है.

    नदी पर पुल नहीं होने से बारिश के दिनों में नदी पार गांवों का संपर्क टूट जाता है. घनघोर जंगल को माओवादी महफूज समझते हैं और बारिश में गांवों को अपना ठिकाना बना लेते हैं. गंगालुर से नदी पार कर करीब 15 किलोमीटर घनघोर जंगल और कच्चे रास्तों से होते हुए हमारी टीम मेटापाल पहुंची.

    सरकारी दस्तावेजों में मेटापाल और आसपास के गांवों का नाम दर्ज है, लेकिन गांव में अपनी पहचान का कोई प्रमाण नहीं है. न तो गांव में कोई बोर्ड लगा है और न ही माइल स्टोन है, जिससे उसकी पहचान का पता चल सके. बहरहाल यहां पहुंचते ही सारे सरकारी दावे हवा हवाई हो जाते हैं.

    मेटापाल गांव में कुपोषण का शिकार बच्चा.


    कुपोषित हैं ज्यादातर बच्‍चे
    आजादी के 70 दशक बाद भी यहां मूलभूत सुविधाएं भी सरकार नहीं पहुंचा पाई है. इस गांव के ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. पर्याप्त भोजन व पोषक आहार नहीं मिलने के कारण बच्चों को दूसरी बीमारियां भी हो जाती हैं. गांव की महिलाएं भी एनिमिया और दूसरी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हैं.

    नाले के पानी से मिलता है जीवन
    गांव में पानी की व्यवस्था नहीं है. इसलिए ग्रामीण करीब आधा किलोमीटर दूर नदी और नाला जाते हैं. नदी व नाले का गंदा पानी पीने के साथ ही बर्तन, कपड़ा धोने और दूसरी जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यहां के लोग पानी से होने वाली बीमारियों से भी ग्रसित हैं.

    स्कूल के लिए 15 किलोमीटर तक का सफर
    गांव में एक भी स्कूल नहीं है. इसलिए ज्यादातर बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं. कुछ बच्चों का दाखिला दूरे के सरकारी स्कूल में कराया गया है, लेकिन इसके लिए उन्हें 10 से 15 किलोमीटर पैदल सफर तय करना पड़ता है. सरकार के आवासीय विद्यालयों में भी कुछ बच्चों का दाखिला कराया गया है, लेकिन ज्यादातर समय वे गांव में ही रहते हैं.

    बीमारी का इलाज माने झाड़-फूंक
    गांव में स्वास्थ्य सुविधा का कोई इंतजाम नहीं है. शहरी इलाका भी दूर है और आवाजाही के लिए कोई साधन नहीं है. इसलिए इस गांव के आदिवासी बीमारी के इलाज के लिए झाड़ फूंक पर ही निर्भर रहते हैं. ग्रामीणों ने बताया कि गंभीर बीमारी के चलते इनकी मौत भी हो जाती है.

    इसलिए कहा जाता है रेड कॉरिडोर
    माओवाद समस्या से घोर प्रभावित मेटापाल और आसपास के गांव को रेड कॉरिडोर भी कहा जाता है. गांव में माओवादियों का शहीद स्मारक उनकी उपस्थिति का प्रमाण देता है. यही कारण भी है कि आदिवासी सुरक्षा बलों के निशाने पर रहते हैं. दबी जुबान कुछ लोगों ने बताया कि माओवादी भी खुद को सेफ रखने आदिवासियों को आगे कर देते हैं. क्षेत्र में वारदातों को अंजाम देने के बाद माओवादी इन्हीं इलाकों में आकर छूप जाते हैं.

    दिन में नहीं रहता कोई मर्द
    मेटापाल व आस पास के गांव में दिन में कोई भी मर्द नहीं रहता. इसके पीछे का कारण रोजगार के लिए जाना नहीं खौफ होता है. ग्रामीणों का आरोप है कि सुरक्षा बल के जवान आते हैं और उन्हें जबरिया पकड़ कर ले जाते हैं. इसलिए वे दिन में गांव से बाहर ही र​हते हैं. ग्रामीणों के मुताबिक सुरक्षा बलों के भय के कारण वे दिन में शिकार करने का हवाला देकर गांव छोड़ देते हैं.

    बातचीत के लिए पांच घंटे इंतजार
    हमारी टीम मेटापाल गांव सुबह करीब साढ़े 11 बजे ही पहुंच गई थी. गांव में हमें कोई मर्द नहीं मिला. गांव में सिर्फ महिलाएं और कुछ बच्चे ही नजर आए. ज्यादातर लोगों को हिंदी बोलनी नहीं आती थी. ऐसे में हम शाम तक गांव में किसी ऐसे व्यक्ति का इंतजार करते रहे जो हमसे बात कर सके. इस बीच हमें आभास हो चुका था कि हमपर कुछ लोग नजर रखे हुए हैं. करीब पांच घंटे कुछ लोग आए, हमसे पहचान पूछने लगे. वे कौन थे, ये हमारे लिए सवाल ही बना रहा. उनके जाने के कुछ देर बाद ही गांव के कुछ मर्द आए और हमसे बात करने के लिए तैयार हुए.

    रात में लकड़ी के अलाव और टॉर्च ही रोशनी का सहारा
    गांव में बिजली की कोई व्यवस्था नहीं है. इसलिए रात होते ही लकड़ी के अलाव और छोटे से टॉर्च के सहारे ही रात कटती है. खाना पकाने से लेकर अन्य जरूरी काम टॉर्च के सहारे ही होता है. हमारी टीम ने एक रात इसी गांव में गुजारी. अंधेरे में हल्की सी आहट भी ग्रामीणों के चेहरे पर भय ला देती है. उन्हें जितना डर माओवादियों का रहता है. उतना ही खौफ वे पुलिस से खाते हैं.

    आखिर क्यों करते हैं विकास का विरोध
    ग्रामीणों ने बताया कि वे किसी भी चुनाव में हिस्सा नहीं लेते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि भारत की नागरिकता के प्रमाण के लिए उनके पास आधार कार्ड, वोटर कार्ड या अन्य कोई दूसरा पहचान पत्र नहीं है. आवासीय विद्यालयों में पढ़ने वाले कुछ बच्चों का आधार कार्ड जरूर बना है, लेकिन वो विद्यालय में ही रखा रहता है. वे किसी चुनाव में भी हिस्सा नहीं लेते हैं. न ही सरकार की किसी योजना का लाभ लेना चाहते हैं. क्षेत्र में विकास भी नहीं चाहते हैं. आखिर वे विकास क्यों नहीं चाहते इसके जवाब में वे कुछ नहीं बोलते.

    फोर्स पर मारपीट का आरोप, माओवादियों के नाम पर मौन
    ग्रामीण पुलिस व सुरक्षा बल के जवानों पर जबरिया मारपीट का आरोप लगाते हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि सुरक्षा बल के जवान उन्हें माओवादी, नक्सली बताकर परेशान करते हैं. उनके साथ मारपीट करते हैं. समान भी लूटकर ले जाते हैं. माओवादियों को लेकर सवाल करने पर वे कुछ भी कहने से बचते हैं और मौन ही रहते हैं. हालांकि आदिवासियों की खामोशी और भय से सहमे चेहरे देखकर इसका जवाब मिल जाता है.

    50 से ज्‍यादा गांव के यही हालात
    बीजापुर जिले में गमपुर, सावानार, गोंगला, मर्रेवाड़ा, हिरोली, डुमिरपालनार चोकनपाल सहित 50 से अधिक गांव और कस्बे हैं, जिनके हालात मेटापाल जैसे ही हैं. बीजापुर के इस गांव में सरकार पीने के शुद्ध पानी तक का इंतजाम नहीं कर पाई है. सड़क, बिजली, अस्पताल और स्कूल इन गांव के लोगों के लिए दिन में देखे सपने जैसा है. लाल आतंक और पुलिसिया खौफ में जी रहे इन गावों के आदिवासियों की ख्वाहिश सिर्फ इतनी है कि वे सुकून से जी सकें.

    मारपीट को लेकर कोई शिकायत नहीं मिली है. शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी.
    -मोहित गर्ग, एसपी, बीजापुर


    ग्रामीण इलाकों में भी विकास कार्य तेजी से किए जा रहे हैं. पोटा केबिन व आवासीय विद्यालय में आदिवासी बच्चों को पढ़ाया जा रहा है. कुछ इलाकों में घोर नक्सल समस्या है. वहां के लिए रोड बनाने के लिए प्रस्ताव पास है. फोर्स की उपलब्धता के आधार पर रोड बनाने का काम शुरू होगा. रोड बनते ही दूसरी समस्याएं भी दूर होंगी.
    -डॉ. अयाज तंबोली, कलेक्टर, बीजापुर

    Tags: Bijapur news, Chhattisgarh news

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