क्या आसान है घर में रहना: कहानी उन महिलाओं की, जो वर्षों से गुजार रहीं 'लॉकडाउन' में जिंदगी

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घरेलू महिलाओं पर अक्सर धारा 144 तो लगी ही रहती है, जहां वो अक्सर आस-पड़ोस की गतिविधियों की जानकारी खिड़की से झांककर या बालकनी से ही ले लेती हैं.

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मुख्यमार्ग से सटा गांव का पुराना मैदान और उसके सामने अस्पताल. उस मैदान में करीब सात से अधिक अधेड़ लोगों की लाशे हैं. एक अजीब सी दहशत के बीच मैं वहां पहुंचती हूं. पत्रकारों का हुजूम है. इनमें से ज्यादातर जाने पहचाने अपने साथी ही हैं. कोलाहल भी है, लेकिन जो अपने भीतर ढेर सारा सन्नाटा समेटे हुए है. मुझसे एक साथी रिपोर्टर कहता है कोरोना से मर गए शायद. पता चलता है कि इन लाशों को उठाकर सामने अस्पताल ले जाया गया है. मैं इंतजार करती हूं. सब रिपोर्टर उनके पीछे भागते हैं.

मैं भी किसी तरह से अस्पताल से निकलने की कोशिश करती हूं. रास्ता नहीं मिलता तो पीछे से निकलने की कोशिश करती हूं. जहां ऑपरेशन के बाद फेंके गए ख़ून से सने कॉटन सुइयां और टूटी खिड़कियों के कांच पड़े हैं. मैं अब इस डर से सिहर जाती हूं. घर कैसे जाऊं. इन संक्रमित लाशों से कहीं मैं तो कोरोना से संक्रमित नहीं. क्या ये वैसी ही महामारी हो गई जो पुराने समय मे गांव के गांव चट कर जाती थी. दिल के भीतर गहराता डर और मैं पसीना-पसीना होकर उठ बैठी. देखा तो मां बगल में सोई पड़ी थी और सुबह के पांच बजे थे.

ये क्या हो गया है मुझे मैंने सोचा. किसी तरह से जब खुद को शांत किया तो ध्यान आया कि यह जरूर था कि पिछले 10 से 12  दिनों में देखा गया ये सबसे भयावह सपना था, लेकिन जब से वॉर्क फ्रॉम होम कर रही हूं. दिन भर अकेले कमरे में पड़े मुझे कुछ अजीब सपने आने लगे हैं. अधूरी महत्वाकांक्षाएं अजीब सा खालीपन, डर घबराहट सब बहुत सामान्य हो रहा है. ये सपनों में भी दिख रहे थे. क्या कोरोना ने मुंझे इतना डरा दिया या फिर दिन भर घर में खुद के साथ रहना बाहर नहीं निकल पाना इसकी एक वजह है. फिर ख्याल आया कि यदि ये दिन भर घर में बंद रहने का असर है तो फिर उन लोगों का क्या जो घरेलू महिलाएं हैं?



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..सूरज निकलने के बाद कब डूब जाता है
सोचा उनसे बात किया जाए. मैंने रायपुर में अपनी मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में रहने वाली सुमन भाभी से पूछा. उन्हें सपना बताया. भाभी हंसी और कहती हैं. सोचिए आप तो दस दिन में ऐसे भूतहा सपने देखने लगी. जबकि अब तक आपकी जिंदगी मस्त आजाद पंछी की तरह चल रही थी. मुझे तो शादी को छह साल हो गए. आपके भैया को पत्नी का नौकरी करना पसंद नहीं था. बच्चा होने के बाद उसकी देखभाल में सारा दिन कैसे निकलता था पता ही नहीं चलता था कि कब इसी फ्लैट के बाहर सूरज निकलने के बाद डूब जाता है.

कई बार सब्जी लेने बाहर निकल जाती हूं, लेकिन अक्सर आपके भैया सब्जियां लेकर आ जाते हैं तो वो भी नहीं हो पाता. हां जब महीने का सामान लाने बाजार जाती हूं तो लगता है बाहर की दुनिया कितनी चकाचक है और मेरी हमउम्र की किसी नौकरी पेशा महिला को देखूं तो लगता है कि अपने पैसा से खरीदी करके स्कूटी चालू करके घर लौटने का ठसन अलग ही होता होगा न. ये लॉकडाउन को लेकर कितना हल्ला कर रहें हैं सब, लेकिन मुझे बहुत नया नहीं लग रहा. एक अजीब सी उन्मुक्त हंसी और बेहद शांत तरीके से जिसमें महीन दु:ख भी था. उन्होंने कहा जब से शादी हुई है, तब से अपना लॉकडाउन ही चल रहा है. बस इसका प्रचार नहीं है. क्या आसान है घर में रहना?

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पढ़ी-लिखी बहू चाहिए, जो घर पर रहे
तभी ऊपर के फ्लैट में रहने वाली सोनम मिलती है. सोनम की करीब तीन साल पहले शादी हुई है. वो मायके आई है. सोनम ने मुझे देखते ही शरारत से कहा क्यों दीदी दिन कट जाता है आपका घर पर. सुबह की शिफ्ट में जो निकलती थीं तो अधिकतर शाम के बाद ही दर्शन होते थे. मैंने हंसते हुए कहा अच्छा ये बता तुझे कैसा लग रहा है इस लॉकडाउन से. उसने मेरे चेहरे पर खामोशी से नजर दौड़ाई और कहा दीदी आपको पता है पिछले दो साल से मैं अक्सर यहां आ जाती हूं. क्योंकि जहां मेरी शादी हुई है, वहां जरा पिछड़े खयाल के लोग हैं. पैसा बहुत है. सुविधाएं भी बहुत हैं. लेकिन उन्हें बेहद पढ़ी लिखी बहू चाहिए थी, लेकिन बस वो घर पर रहे. बताने के लिए ये चाहिए कि पढ़ी लिखी बहू आई है.

इन तीन सालों में मेरा ससुराल में सारा दिन घर के भीतर ही गुजर जाता है. व्यापारी परिवार है.
दिन भर आते जाते लोगों की खातिरदारी के बाद पता ही नहीं चलता कि कब बिस्तर पर आते रात के 11 बज जाते हैं.
वो तो गनीमत है कि लॉकडाउन की घोषणा के पहले यहां आ गई थी. अब पुरानी किताबें निकाली है. पीएससी की पुरानी. जमकर तैयारी करनी है. एक बात तो ठान ली है कि यदि कोई एग्जाम न निकाला तो फिर जीवन भर लॉकडाउन जैसे में ही निकालना पड़ेगा. मज़ेदार बात यह है कि घर पर अब कोई इन दिनों आता नहीं तो किताबें छिपाने की झंझट नहीं रहती.

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नौकरी का करोगी क्या?
मैंने उसके पति का जिक्र करते हुए पूछ लिया- विशाल क्या कहते हैं सोनम. वो क्या कहेंगे दीदी. एक ही गाना तुम नौकरी करके करोगी क्या जब घर पर ही इतना पैसा है. एक बार आप मेरी रिपोर्ट बनाना. तभी सुमन भाभी ने कहा जब तक बच्चा नहीं हो जाता न तब तक कुछ न कुछ कर ले तो ठीक है. नहीं तो बच्चे के बाद ये सब इच्छा उसके बड़े करने में दबा लेना पड़ता है. जब बच्चे स्कूल जाने लगते हैं तब फिर सूनेपन में पुराने अरमान कुलबुलाने लगते हैं.

दिन का रात में बदलना
तीसरे फ्लोर पर ही रहनेवाली रुचि भाभी सीढ़ी पर आ गई थी. क्या हो रहा है. लॉकडाउन में भी चैन नहीं है क्या रिपोर्टर साहिबा को. सुमन भाभी ने कहा अरे ये पूछ रही हैं सबसे लॉकडाउन में क्या महसूस कर रही हैं. हमनें कहा हमारा तो रोज ही लॉकडाउन है. इतने में रुचि भाभी ने कहा आपको पता है. हमारी शादी को दस साल हो गए. हमें याद नहीं हम कब सिर्फ प्योर अपनी मर्जी की सब्जी बनाये हैं. हमें इतना फर्क भी नहीं पड़ रहा है. क्योंकि सुबह चार—पांच बजे उठना. फिर बच्चे को उठाकर नहलाना धुलना. उसके लिए टिफिन बनाना. उसके बाद उसे स्कूल बस तक छोड़ने जाना. आपके भैया के लिए टिफिन बनाना. फिर झाड़ू पोछा बर्तन कपड़े फिर शाम की तैयारी. ये थके होते हैं तो होमवर्क भी हमें ही देखना पड़ता है. समझ ही नहीं आता दिन कैसे रात में बदल जाता है.

घर में रहने वाली औरतों के लिए बहुत हव्वा नहीं है, ये लॉकडाउन.
पूजा भाभी आप बताओ मैं सहीं कह रही की नहीं. अब तक इस चर्चा में शामिल होकर भी घर के भीतर से ही सब सुन रही पूजा भाभी ने कहा- आपको पता है दीदी. हम पिछले कई सालों से एक ही तरह के छोंक से उकता गए हैं.  जैसे आप उकता गई हैं न. इन 8-10 दिनों में. सुबह उठो. वही पति के लिए चाय बनाओ. बच्चों को तैयार करो. वही सब्जी का छौंक. बाई के आने के बाद उसके काम पर नजर रखो  नहीं तो ये लोग कितना काम चलाऊ काम करती हैं. फिर रात को ये सोचो की नया क्या बनाऊं. इन सबके बीच हमेशा बच्चों से यही जवाब मम्मी आज फिर वही सब्जी. ये 21 दिन 21 दिन का मार हल्ला हो रहा है. कई बार तो सिवाय सब्जी भाजी खरीदने के अलावा मैं तो महीनों घर से बाहर नहीं निकल पाती.

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बाहर निकलती तो पता चलता
पूजा भाभी कहती हैं- ऊपर से इनके पापा कहते हैं न कई बार की तुम्हे क्या पता. बाहर निकली होती तो पता चलता. तब लगता है कि मां बाप ने शादी के बदले पढ़ाई लिखाई फिर नौकरी पर ध्यान दिया होता तो जिंदगानी कुछ और होती. कई बार पुराने सपने याद आते हैं. कई बार गुस्सा. अपमान कोफ्त सब आता है. घर में घुसे घुसे निराशा भी होती है. ये सब तो 21 दिन में आजाद हो जाएंगे.

जिम्मेदारियां वायरस से ज्यादा डरावनी हैं
मैं अब नीचे आ चुकी थी, लेकिन उनकी आवाज अब भी सुनाई दे रही थी. शायद सालों से वो इसी तरह अपने अपने घरों के दरवाजे पर खड़ी होकर बात करती हैं. कभीं किसी ने उनसे गुजारिश नहीं कि होगी उनसे पहले न ही एक मीटर की दूरी का फासला रखने की अनिवार्यता, लेकिन अक्सर ये फासला बना रहता है. क्योंकि कोई किचन में कुकर चढ़ाकर रखा होता है तो किसी ने गैस पर दूध उबलने रखा होता है. किसी को और कोई काम इस तरह की आपसी बातचीत के बीच ही संभालना होता है. शायद ये जिम्मेदारियां कोरोना वायरस के डर से भी अधिक डरावनी होती हैं. इसलिए वो अमूमन इस फ़ासले को नापकर एक दूसरे के घर मे बैठकर या समूह में बैठकर बातें नहीं करतीं. ऐसा शायद उनके घर के पुरुष करने भी न दें रोज. क्योंकि इससे पूरी बिलडिंग और समाज मे एक संक्रमण का खतरा हो सकता है. आजादी का संक्रमण. सदियों से इस बिरादरी पर एक अनजाने षड्यंत्र के तहत लादी गई जिममेदारियों से बेतकल्लुफ होने का संक्रमण.

सही है घरेलू महिलाओं पर अक्सर धारा 144 तो लगी ही रहती है,
जहां वो अक्सर आस पड़ोस की गतिविधियों की जानकारी खिड़की से झांककर या बालकनी से ही ले लेती हैं या उन्हें इंतजार रहता है कि कब पति या बच्चे कॉलोनी से टहल कर आएं और खिड़की बालकनी और पास पड़ोस और काम वाली बाई से मिली जानकारी को वो एक सूत्र में पीरो पाएं. ये तो मेरे फ्लैट की कुछ महिलाओं की कहानी थी, लेकिन सोचती हूं कि पूरी कॉलोनी, शहर, गांव राज्य, देश में ऐसी कितनी महिलाएं, लड़कियां हैं, जो जिंदगीभर लॉकडाउन ही झेलती हैं.

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