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मदन सिंह चौहान: टिन का पीपा बजाकर करते थे रियाज़, कला ऐसी की पद्मश्री से होंगे सम्मानित

Devwrat Bhagat | News18 Chhattisgarh
Updated: January 27, 2020, 1:37 PM IST
मदन सिंह चौहान: टिन का पीपा बजाकर करते थे रियाज़, कला ऐसी की पद्मश्री से होंगे सम्मानित
संगीतज्ञ मदन सिंह चैहान.

सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि उनकी यह उपलब्धि पूरे छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) को गौरवान्वित करने वाली है.

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रायपुर. गणतंत्र दिवस (Republic Day) की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई. देश की 118 हस्तियों को पद्मश्री सम्मान (Padma Shri award 2020) से नवाजा जाएगा. इसमें से एक नाम संगीतज्ञ मदन सिंह चैहान (Madan Singh Chouhan) का भी है. मदन सिंह चौहान को ‘गुरूजी‘ के नाम से भी जाने जाते हैं. कला के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान की घोषणा होने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (CM Bhupesh Baghel) ने उनको बधाई और अपनी शुभकामनाएं दी हैं. सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि गुरुजी छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध संगीत शिक्षक, गजल गायक और सूफी गायक हैं. उन्होंने अपना पूरा जीवन संगीत साधना के लिए समर्पित कर दिया. उन्होंने कहा कि उनकी यह उपलब्धि पूरे छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) को गौरवान्वित करने वाली है.

मालूम हो कि 25 जनवरी को केंन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा पद्म पुरस्कारों की घोषणा की गई है. गुरूजी के नाम से प्रसिद्ध मदन सिंह चौहान का जन्म 15 अक्टूबर 1947 को हुआ. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद इस साल मार्च-अप्रैल में राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले समारोह में मदन सिंह चौहान को पद्मश्री सम्मान से अलंकृत करेंगे. तो वहीं गणतंत्र दिवस के दिन मुक्ता काशी मंच में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में सीएम भूपेश बघेल ने मदन सिंह चैहान गुरूजी को सम्मानित भी किया.

 



इस साल सिर्फ एक सूफी गायक

छत्तीसगढ़ से पद्म पुरस्कारों में इस साल सिर्फ एक ही नाम सूफी गायक मदन चौहान का है. कभी टीने के पीपे को बजाकर रियाज़ करने वाले मदन पिछले कई सालों से कला की सेवा करते आ रहे हैं, लेकिन 74 साल की उम्र में उन्हे पद्मश्री सम्मान मिला है. इसकी कसक उन्हें आज भी है. न्यूज़ 18 से हुई बातचीत में मदन चौहान का कहते है कि उन्होंने सम्मान मिलने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, लेकिन देर आए दुरूस्त आए.

संगीतज्ञ मदन सिंह चौहान का कहना है कि काफी अरसे के बाद सम्मान मिला है. देरी हुई, लेकिन इसके लिए कुछ कहना नहीं चाहूंगा. सूफी में सब्र सीखने को मिलता है. गुरूजी कहते हैं कि ढोलक से मैंने शुरुआत की. फिर तबले में 30 साल गुजारी मैंने. वे कहते हैं कि सूफी संगीत की रूहानियत कभी कम नहीं हो सकती.

 

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First published: January 27, 2020, 1:31 PM IST
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