कर्ज से परेशान किसान से की आत्महत्या, प्रशासन नहीं है मानने को तैयार

मृतक किसान सुरेश सिंह की पत्नी भागमती का कहना है कि सुरेश पर किसान क्रेडिट कार्ड का 1 लाख 40 हजार रुपया बकाया था, जिसे वह चुका नहीं पा रहा था. बैंक से लगातार ऋण अदायगी के लिए नोटिस आने के सुरेश परेशान था, जिसके कारण उसने आत्महत्या कर ली

Raghwendra Sahu
Updated: June 14, 2018, 10:36 AM IST
कर्ज से परेशान किसान से की आत्महत्या, प्रशासन नहीं है मानने को तैयार
मृतक किसान के परिजन
Raghwendra Sahu
Updated: June 14, 2018, 10:36 AM IST
प्रदेश के मरवाही क्षेत्र के पिपरिया गांव के किसान सुरेश सिंह मरावी ने 7 जून को कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी, लेकिन प्रशासन ने किसान की मौत को कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या नहीं मानकर कुछ और कारण माना है. प्रशासन का मानना है कि किसान सुरेश सिंह को कर्जा नहीं था और उसके खाते मे 1 लाख 80 हजार रुपए होने का दावा किया, लेकिन इस मामले में प्रशासन की पोल खुल गई.

दरअसल, प्रशासन ने 8 जून को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ देते हुए मृतक किसान के खाते में 1 लाख 79 हजार 5 सौ 47 रुपए जमा कराए गए, जिन्हें आधार बनाकर प्रशासन किसान की मौत का कारण बदल रहा है और किसान की आत्महत्या कर्ज से परेशान होने से नहीं होकर अन्य कारण बता रहा है. इस मामल में मरवाही विधायक अमित जोगी ने प्रशासन पर लापरवाही के गंभीर आरोप भी लगाए हैं.

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मामले में मृतक किसान सुरेश सिंह की पत्नी भागमती का कहना है कि सुरेश पर किसान क्रेडिट कार्ड का 1 लाख 40 हजार रुपया बकाया था, जिसे वह चुका नहीं पा रहा था. बैंक से लगातार ऋण अदायगी के लिए नोटिस आने के सुरेश परेशान था, जिसके कारण उसने आत्महत्या कर ली.

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मरवाही विधायक अमित जोगी ने पूरे मामले में प्रशासन को दोषी ठहराया है. विधायक का कहन है कि मरवाही सूखा ग्रस्त क्षेत्र घोषित किया गया था और सूखा ग्रस्त किसानों को नियमानुसार ऋण अदायगी के लिए लिए बैंक से नोटिस नहीं दिया जा सकता, लेकिन इसके बावजूद किसान को बैंक की तरफ से नोटिस मिल रहे थे. विधायक अमित जोगी का कहना है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह ने सूखाग्रस्त क्षेत्र के लोगों को 210 दिन रोजगार दिलाने का दावा किया है, जबकि सुरेश सिंह मरावी और उसकी पत्नी को पूरे साल में मात्र 4-4 दिन ही रोजगार गारंटी के तहत काम मिला था.

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मृतक के खाते में जो रुपए प्रशासन ने उसकी मौत के बाद डाले अगर वो रुपए पहले डाल दिए गए होते तो शायद किसान को आत्महत्या की नौबत ही नहीं आती. छत्तीसगढ़ में लगातार किसानों द्वारा किए जा आत्महत्या को प्रशासन और सरकार इसी तरह दबाने का प्रयास करती है. जाहिर है किसानों के साथ हो रहे इस तरह के अन्याय से अन्नदाताओं के मन में आक्रोश है.

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