लाइव टीवी

जोगी, रमन और अब भूपेश, हर 'सरकार' के कैसे 'चहेते' बन जाते हैं आईपीएस कल्लूरी

निलेश त्रिपाठी | News18Hindi
Updated: February 23, 2019, 10:18 AM IST
जोगी, रमन और अब भूपेश, हर 'सरकार' के कैसे 'चहेते' बन जाते हैं आईपीएस कल्लूरी
शिवराम प्रसाद कल्लूरी.

भारत सरकार द्वारा साल 2006 में वीरता के लिए पुलिस मेडल से नवाजे गए छत्तीसगढ़ के आईपीएस अफसर शिवराम प्रसाद कल्लूरी को 'सरकार का चहेता' कहा जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 23, 2019, 10:18 AM IST
  • Share this:
भारतीय पुलिस सेवा के 1994 बैच के अफसर शिवराम प्रसाद कल्लूरी को साल 2006 में भारत सरकार द्वारा वीरता के लिए पुलिस मेडल से नवाजे गया. छत्तीसगढ़ के इस अफसर को 'सरकार का चहेता' कहा जाता है. छत्तीसगढ़ में 15 साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस की भूपेश सरकार ने बहुचर्चित कथित 36 हजार करोड़ रुपए के नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला मामले की नए सिरे से जांच के लिए बनाई गई है. एसआईटी का प्रभार शिवराम प्रसाद कल्लूरी को दी गई है. विवादित अफसर कल्लूरी को इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेवारी देने का हर वर्ग विरोध कर रहा है.

विपक्ष में रहते हुए बस्तर में कल्लूरी की नियुक्ति का खुलकर विरोध करने वाले प्रदेश कांग्रेस कमेटी के भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बनने के बाद उसी अफसर को महत्वपूर्ण जिम्मेवारी क्यों दे देते हैं, इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं. इसके बारे में आगे जानेंगे, लेकिन उससे पहले जानते हैं कि शिवराम प्रसाद कल्लूरी कैसे और किन वजहों से हर सरकार के चहेते बन जाते हैं.

तब अजीत जोगी 'डैडी' थे
मध्य प्रदेश से अलग होकर साल 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बना और अजीत जोगी ने मुख्यमंत्री की कमान संभाली. उस समय राज्य के कई अफ़सर व सामाजिक​ और राजनीतिक वर्ग में कल्लूरी को लेकर खूब चर्चा होती थी. क्योंकि आईपीएस शिवराम प्रसाद कूल्लरी सार्वजनिक तौर पर अजीत जोगी को 'डैडी' कहकर बुलाते थे. दरअसल सार्वजनिक तौर पर शिवराम प्रसाद कल्लूरी उसी समय चर्चा में भी आए.

ajit-jogi
अजीत जोगी. फाइल फोटो.
कल्लूरी अजीत जोगी के सबसे खास और सरकार के करीबी अफसरों में मानें जानें लगे. बिलासपुर जिले में पुलिस अधीक्षक रहते हुए उन पर आरोप लगे कि वो मुख्यमंत्री अजीत जोगी की कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के लिए भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं पर दबाव बना रहे हैं. चर्चा हुई कि इसके लिए बिलासपुर के होटलों में कमरा बुक कर भाजपा कार्यकर्ताओं को बुलाया जाता था और उनपर कांग्रेस में शामिल होने का दबाव बनाया जाता था.
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह. फाइल फोटो.
..तो इसलिए रमन सरकार के करीबी बने
शिवराम प्रसाद कल्लूरी राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार सरगुजा पोस्टिंग के बाद चर्चा में आए. यहां उन्हें 'नायक' और 'खलनायक' दोनों ही रूप में देखा जाने लगा. कल्लूरी ने सरगुजा में जाति और धर्म में बंटे नक्सलियों के संगठन में सेंध लगाने में सफलता ​हासिल की. वहां एक के बाद एक कई मुठभेड़ हुई. नक्सली मारे जाने लगे या पकड़े जाने लगे. कहा जाता है कि सरगुजा में जो नक्सली बच गए, उन्होंने हमेशा के लिए झारखंड और बिहार का रुख कर लिया. बताया जाता है कि इसी दौरान कल्लूरी रमन सरकार के खास अफसरों में शामिल हो गए. फिर 2006 में भारत सरकार ने वीरता के लिए उन्हें पुलिस मेडल से नवाजा.

विवाद, कल्लूरी और विवाद
अजीत जोगी को 'डैडी' कहने से चर्चा में आए कल्लूरी सरगुजा में पदस्थ रहते ही विवादों से घिर गए. यही वह दौर था, जब आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली धीरज जायसवाल को कथित तौर पर एक थाने का प्रभारी बनाने की ख़बरें सुर्खियां बनीं. इसी दौरान आरोप लगा कि कल्लूरी ने रमेश नगेशिया नामक कथित नक्सली को समर्पण के नाम पर थाने बुलाया और फिर उसे फ़र्जी मुठभेड़ में मार डाला. नगेशिया की पत्नी लेधा के साथ कल्लूरी और दूसरे पुलिसकर्मियों द्वारा कथित बलात्कार का मुक़दमा हाई कोर्ट तक पहुंचा. लेकिन बाद में यह मुक़दमा वापस ले लिया गया.

इसके बाद भी कल्लूरी रमन सिंह सरकार की पसंद बने रहे और उन्हें नक्सल ऑपरेशन के डीआईजी के तौर पर दंतेवाड़ा में नियुक्त किया गया, लेकिन 6 अप्रैल 2010 को ताड़मेटला में नक्सलियों ने सर्चिंग कर लौट रही सीआरपीएफ की टीम पर हमला कर दिया और 76 जवानों को मार डाला. इसके बाद बस्तर में पुलिस की मौजूदगी को लेकर सवाल खड़े होने लगे.

आदिवासियों के जलाए गए घर. फाइल फोटो.
जला दिए गए 252 घर
कल्लूरी ने बस्तर में नई रणनीति बनाकर काम करना शुरू किया. गांव-गांव में अपने समर्थकों का जाल और सलवा जुड़ूम के पुराने लोगों को अपने साथ जोड़कर कल्लूरी ने काम किया. दावा किया गया कि नक्सलियों पर काफी हद तक अंकुश लगा दिया गया है, लेकिन उसी समय ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुरम में सुरक्षाबलों द्वारा तीन महिलाओं की हत्या, बलात्कार और 252 घरों को जलाए जाने की घटना ने फिर से कल्लूरी की मुश्किलें बढ़ा दीं. हालांकि कल्लूरी ने इस घटना को नक्सलियों द्वारा अंजाम दिए जाने का दावा किया, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर की गई जांच के बाद सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में सुरक्षाबलों को ही इसके लिए ज़िम्मेवार ठहराया.

इसके बाद ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुरम के आदिवासियों के लिए राहत सामग्री लेकर पहुंचे स्वामी अग्निवेश पर जब दोरनापाल में सलवा जुड़ूम समर्थकों ने हमला बोला तो कल्लूरी फिर निशाने पर आ गए. इसके बाद आख़िरकार कल्लूरी का तबादला कर दिया गया. पुलिस मुख्यालय में आईजी बना दिया गया.

1900 नक्सलियों के सरेंडर का रिकॉर्ड
शुरू से ही रमन सरकार के पसंद रहे शिवराम प्रसाद कल्लूरी को साल 2014 में एक बार फिर बस्तर की कमान सौंपी गई. इस बार उन्हें बस्तर का आईजी बनाया गया. आईजी बनने के बाद मैदानी स्तर पर बस्तर को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया. आत्मसमर्पण और मुठभेड़ों का सिलसिला एक बार फिर शुरू हुआ. इस दौरान कल्लूरी ने बस्तर में सामाजिक संगठनों का समूह बनाकर एक अलग सेल तैयार कर नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. बताया जाता है कि प्लानिंग मास्टर कहे जाने वाले कल्लूरी ने नक्सलियों के खिलाफ ऐसे लोगों का समूह तैयार किया, जो आपराधिक किस्म के थे. इसे कांटे से कांटा निकालने की रणनीति के तौर पर देखा गया. इस दौरान सरकारी आंकड़ों में करीब 1900 नक्सलियों ने सरेंडर किया. हालांकि इस पर भी सवाल खड़े किए गए और आरोप लगा कि फर्जी सरेंडर कराए गए हैं.

इस दौरान पत्रकारों, वकीलों पर हमले, पत्रकारों की गिरफ्तारियां, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ मुकदमे दर्ज किए गए. दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफसर डॉ. नंदिनी सुंदर, जेएनयू की अर्चना प्रसाद सहित दूसरों के ख़िलाफ़ हत्या का मामला सुकमा के थाने में दर्ज कराया गया. इसी दौरान सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया के घर पर हमला हुआ. सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की रिपोर्ट के बाद पुलिसकर्मियों का सड़क पर उतर कर सामाजिक कार्यकर्ताओं का पुतला दहन, अजा-जजा आयोग को नोटिस, हाई कोर्ट में एक के बाद एक पुलिस मुठभेड़ों को फ़र्ज़ी ठहराते हुए मामलों में कल्लूरी घिरते गए. पीसीसी अध्यक्ष भूपेश बघेल सहि​त तमाम मानवाधिकार संगठन, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कल्लूरी की बस्तर नियुक्ति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

तमाम विवादों के बाद तब की रमन सरकार ने फरवरी 2017 में शिवराम प्रसाद कल्लूरी को बस्तर से हटा दिया. कल्लूरी लंबी छुट्टी पर चले गए. इसके बाद प्रदेश में नई सरकार बनने तक पुलिस मुख्यालय में ही अटैच रहे. इस दौरान उन्होंने अपने दिल का इलाज भी करवाया.

घोड़ों पर लगाम लगाना जानती है भूपेश सरकार?
प्रदेश में नई सरकार बनने के बाद कल्लूरी को ईओडब्ल्यू और एसीबी का आईजी बनाया गया. साथ ही नान घोटाला मामले की नए सिरे से जांच के लिए बनी एसआईटी का प्रभारी भी बना दिया गया. भूपेश सरकार के इस फैसले का हर वर्ग ने विरोध किया. देश के रिटायर्ड अफसरों व मानवाधिकार संगठन के कार्यकर्ता, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह के 125 से अधिक लोगों के अलावा 16 सांसदों ने कल्लूरी की नियुक्ति के खिलाफ सरकार को अलग अलग पत्र लिखे. बस्तर में सक्रिय पत्रकार कमल शुक्ला ने अनशन किया. इसके अलावा विपक्ष ने भी नियुक्ति पर सवाल खड़े किए.

इन सबके बीच भूपेश सरकार अपने निर्णय पर बनी रही. सार्वजनिक तौर पर खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि रमन सरकार में बेलगाम अफसरशाही थी. हम ऐसे घुड़सवार हैं, जिन्हें घोड़ा दौड़ाना भी आता है और उसपर लगाम लगाना भी आता है. बहरहाल कल्लूरी के नेतृत्व में नान घोटाले की जांच कर रही एसआईटी को मामले से जुड़े अहम दस्तावेज मिलने के दावे किए जा रहे हैं. नान घोटाला मामले में ही ईओडब्ल्यू ने आईपीएस अफसर और डीजी मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. मामले के तार कई हाई प्रोफाइल लोगों के जुड़े होने का दावा भी किया जा रहा है.

ये भी पढ़ें: भूपेश सरकार का कर्ज माफ-बिजली बिल हाफ का वादा पूरा, आदिवासियों के लिए लिया ये अहम फैसला 

ये भी पढ़ें: अंतागढ़ टेप कांड मामले में पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर जांच नहीं करेगी एसआईटी: HC  
क क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पाससब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए रायपुर से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: February 23, 2019, 8:29 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर